Wednesday, September 21, 2016

Karma Yoga, Geeta Gyan in Hindi

भागवत गीता ज्ञान के उपदेश, कर्मयोग क्या है? Karma Yoga in Hindi. Bhagavad Geeta Updesh, Gita Gyan, Selfless Service, Detachment in Fruits of Action, Karm Yog.

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कर्मयोग

वह एक शेयर ट्रेडिंग फर्म थी। मार्केट वोलेटिलिटी के समय ब्रोकरेज की कमाई बढ़ जाती है, तो ऐसे समय में उस फर्म के ओनर तालियाँ पीट-पीट कर हँसते और ठहाके लगाते नज़र आते थे। उनके किसी कस्टमर का फ़ोन आता जिसका पैसा डूबने वाला हो, जो घबराया हुआ हो, तब भी उनकी ख़ुशी देखते ही बनती थी...वही ठहाकों वाली हंसी। बहुत अजीब से एक्सप्रेशन्स होते थे उनके चेहरे के। मेरे लिए यह बहुत हैरान करने वाली बात होती थी। वैज्ञानिक तकनीकी विकास और ग्लोबलाइजेशन के नाम पर हमने लाइफ साइकिल को बहुत ज्यादा कॉम्पलीकेटेड बना दिया है। ऐसे में किसी एक का नुकसान किसी एक का फायदा होगा, यह तो होता ही है। कुछ मिलता है हमें तो ख़ुश होना भी स्वाभाविक है। लेकिन किसी और के दुःख में हम एकदम असंवेदनशील ठहाकों की गुंजाईश कैसे खोज पाते हैं?

खैर! यह कईयों के लिए बहुत छोटी सी बात होगी...क्योंकि असंवेदनशीलता इस कदर व्याप्त है कि इन्हीं ठहाकों के बीच मौत भी खरीदी और बेची जाती है। इन्हीं ठहाकों के बीच खाने-पीने की चीजों में मिलावट कर पूरी मानव जाति को जहर परोसा दिया जाता है और इन्हीं ठहाकों के बीच जिन्दा शरीरों का अपहरण कर ज़िन्दगी जहन्नुम बना दी जाती है।...तो फिर जो कानूनन हो रहा है उसमें ठहाके लगाना क्या गलत? लेकिन कानून के दायरे में भी अक्सर ही हमारा फल किसी के लिए दुष्फल हो रहा होता है। इसलिए भी फल में अत्यधिक आसक्ति को त्यागना संवेदनशीलता और समानुभूति का ही पर्याय है। बाकी कोशिश यह की जानी चाहिए कि हर समय बाहर से प्रभावित हमारी ख़ुशी घटते-घटते एक दिन भीतर से छलकने और झलकने लगे। ख़ुश होना, हँसना, मुस्कुराना बहुत ख़ुशी की बात है। बस इसकी कीमत क्या है इस पर थोड़ा ध्यान रहे। कीमत केवल वह नहीं जो आपकी जेब से जाने वाली है, कीमत वह भी जो किसी और के आंसू बनने वाली हो। इसलिए सबसे पहले तो हम ऐसे कर्म का चुनाव करें जिसमें किसी और का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नुकसान न्यूनतम हो (अगर समाज सेवा का कर्म चुन सकें तो सबसे बेहतर है) और उसके बाद यह जरुरी है कि फल में हमारी आसक्ति कम से कम हो। हमारा पूरा ध्यान बस कर्म करने पर हो। यही कर्मयोग है। यही वास्तविक आनंद का हेतु है।

By Monika Jain ‘पंछी’

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गीता ज्ञान

(लेखन/कविता के क्षेत्र में अच्छी खासी महाभारत चल रही है। सिर्फ युद्ध शुरू करने के लिए नहीं, युद्ध रोकने के लिए भी गीता ज्ञान की जरुरत पड़ती है।)

हे लेखक!

क्यों व्यर्थ झगड़ा करते हो? किससे व्यर्थ लड़ते हो? कौन तुम्हें हरा सकता है? आत्मा न हारती है, न जीतती है। आत्मा तो लिखती भी नहीं। जो लिखा गया अच्छा था। जो लिखा जा रहा है अच्छा है। जो लिखा जाएगा वह भी अच्छा होगा। भूत-भविष्य की चिंता छोड़ो, वर्तमान चल रहा है।

तुम्हारा क्या गया जो तुम लड़ते हो? तुम क्या लाये थे जो तुम झगड़ते हो? तुमने क्या लिखा था जो तुमने खो दिया? तुम न कोई कविता लेकर आये थे, न कोई लेख लेकर जाओगे। तुमने शब्द यहीं से लिए, तुमने विचार यहीं से लिए। जो लिखा वह यहीं पर दिया। खाली हाथ आये थे खाली हाथ चले जाओगे। जो शब्द/विचार आज तुम्हारे हैं कल किसी और के होंगे, परसों किसी और के। तुम इन्हें अपना समझकर मग्न हो रहे हो बस यही तुम्हारे दु:खों का कारण है।

लिखते समय दृष्टा बनों फिर खुद को लेखक नहीं पाओगे। लड़ते समय भी दृष्टा और साक्षी बनों...फिर लड़ नहीं पाओगे। ये शब्द और विचार न तुम्हारे हैं, न तुम इन शब्दों और विचारों के। तुम इन शब्दों और विचारों को ईश्वर/शून्य को अर्पित करो। यही सबसे उत्तम है। यही आनंद का रहस्य है।

तुम्हारा कृष्ण!

By Monika Jain ‘पंछी’

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