Wednesday, September 7, 2016

Theory of Relativity in Hindi

आइंस्टीन का सापेक्षता सिद्धांत, विरोधाभास. Theory of Relativity in Hindi. Albert Einstein. Paradox, Contradiction, Limitation of Languages, Duality, Dualism.

सापेक्षता का सिद्धांत

साइंस स्ट्रीम नहीं रहा आगे तो आइंस्टीन का सापेक्षता का सिद्धांत तो कभी पढ़ना और समझना नहीं हुआ डिटेल में। हालाँकि कभी पढ़ना और अच्छे से समझना चाहूंगी। लेकिन जिस सापेक्षता को मन काफी समय से सूक्ष्म रूप से समझ रहा है वहां एक ही समय में दो विरोधाभासी कथनों से भी बिल्कुल सहमत हुआ जा सकता है।

जैसे : मृत्यु एक शाश्वत सच है और मृत्यु एक शाश्वत झूठ भी है।
जैसे : सरल होना सबसे जटिल है और सरल होना ही सबसे सरल है।
जैसे : पूर्ण स्वीकार का क्षण ही पूर्ण निस्तार का क्षण बनता है।
जैसे : सबसे मैत्री (पूर्ण स्वीकार) किसी से मैत्री (पूर्ण निस्तार) नहीं होती।
जैसे : धर्म (तथाकथित) संहारक है और धर्म (विशुद्ध) ही संरक्षक है। और संरक्षक वाला धर्म राजनीति क्या दुनिया की हर एक नीति को सकारात्मक दिशा में लाने के लिए जरुरी है।

तो कहना बस ये था कि आप सापेक्षता को समझिये, भाषा की सीमाओं को समझिये, शब्दों के अलग-अलग सन्दर्भों में अर्थ को समझिये...फिर आधे से अधिक विवाद तो पल भर में खत्म हो जायेंगे। 
 
कुछ भी लिखा हुआ सामान्यीकरण नहीं होता, सापेक्ष ही होता है। कितनी भी सावधानी बरत लो तब भी पूर्ण सत्य कभी लिखा/कहा या सोचा जा ही नहीं सकता। एक ही बिंदु को देखने के अनन्त कोण होते हैं। इसलिए किसी भी समय शब्दों के रूप में हमारे मन, वचन या लेखन में आया कोई भी विचार एक ही समय में सत्य और असत्य दोनों ही सिद्ध हो जाता है। सारे पॉइंट ऑफ़ व्यूज से मैं जब भी अपने लिखे को जांचने की कोशिश करती हूँ तो उसे असत्य ही पाती हूँ। इसलिए कभी-कभी लिखते-लिखते रुक जाती हूँ और कभी-कभी लिखकर मिटा देती हूँ।...और भीतर कहीं गहराई में मैं सब कुछ की तरह ही लिखना भी छोड़ना चाहती हूँ। यह कोई पलायन नहीं...यह विरोधाभास और द्वन्द्वों जनित इस समस्त जीवन से मुक्ति की ही तड़प होती है जो दुनिया के हर एक प्राणी के भीतर दबी रहती है। मुख्य रूप से कर्मयोग का सिद्धांत समाधान रूप में यही से निकलता है। बाकी बात बस इतनी सी है कि सापेक्षता के दृष्टिकोण से सभी का लिखने का तरीका यही रहेगा। जरुरत बस समझ और जागरूकता के बढ़ाने की है तब आवश्यक क्या है और अनावश्यक क्या है यह अपने आप स्पष्ट होता जाएगा।

प्रश्न : ‘लिखना भी छोड़ना चाहती हूँ, सब कुछ की तरह!’ कर्मयोग का सिद्धांत यहाँ से कैसे निकलता है?

उत्तर : समाधान रूप में कई तरीके बताये गए हैं जैसे ज्ञान योग, भक्ति योग, क्रिया योग, कर्मयोग ...हालांकि ये विभाजन सुविधा के लिए हैं। ओवरलैप करता है बहुत कुछ। इसमें से कर्मयोग निष्काम कर्म के बारे में कहता है। हर किसी के लिए सन्यास संभव नहीं, यह व्यवहारिक भी नहीं...ऐसे में जागरूक होकर कर्म करें, परिणाम में आसक्ति यथासंभव न रखें। हम सचेत रहें तो अनावश्यक कर्म वैसे भी छूट ही जायेंगे।

प्रश्न : आपने बहुत अच्छा समझाया है। आपका शब्द शिल्प प्रेरणास्पद है। कुछ बातें जोड़ना चाहूंगी। प्रथम तो क्वांटम फीजिक्स से वापिस न्यूटोनियन फिजिक्स पर आते हैं, जहाँ सरफिशियल मूवमेंट के लिए जिस प्रकार घर्षण एक आवश्यक किन्तु विरोधी बल है, मतलब घर्षण नहीं हो तो मूवमेंट नहीं होगा, हालाँकि घर्षण गति की डायरेक्शन के खिलाफ काम करता है। उसी प्रकार यदि किसी लिखे हुए या कहे हुए का उल्टा अर्थ (जो लिखने वाला या कहने वाला भाव देना चाहता है, उसका उल्टा) लोग निकालें तो यह कोई विसंगति नहीं है, सामान्य बात है। क्योंकि यदि लिखे हुए या कहे हुए के अनेक अर्थ न निकलें तो लेखन ही क्या हुआ? भावों को रूपांतरित करने के लिए भाषा का अविष्कार हुआ है। ज़ाहिर है कि घर्षण उसमें भी होगा। नहीं होगा तो फिर भाषा नहीं हमें टैलिपैथी की तकनीक खोजनी होगी।
फिर मौन किसी का समाधान हो सकता हो, इसमें संदेह है। ओशो ने हजारो घण्टे स्पीचेज़ दी है। इसी कोशिश में कि भाषा का जितना अधिक विस्तार कर पाएं उतना बेहतर है, और रिलेटिव ही कहा है। किन्तु अर्थ का अनर्थ न हो, इसलिए भाषा की वृहदता का उपयोग कर अपने भाव को स्पष्ठ करने के पूर्ण प्रयास किए हैं। सप्रेम :)

उत्तर : शुक्रिया। :) कई अर्थ निकलते हैं यह स्वाभाविक है। लेकिन घर्षण को अत्यधिक से कम करते जाना तो हमारे ही हाथ में है। ओशो की बातों के कितने अनर्थ होते हैं इस बारे में आप ध्यान दीजियेगा। ओशो खुद बहुत विवादस्पद रहे हैं। खैर! यह चर्चा का विषय नहीं। लेकिन फ़िलहाल तक मैं जिस निष्कर्ष पर पहुंची हूँ वहां पर मौन अंतिम मंजिल भी लगती है और उस मंजिल तक पहुँचने की जीवन यात्रा में हर समस्या का समाधान भी मौन (ध्यान) (थोड़ा विस्तृत अर्थ में है यहाँ) से ही निकलता है। बाकी मैं कितना भी संक्षेप में लिखूं पर लिखते समय अपनी ओर से जितना मेरे लिए संभव है सतर्क रहती हूँ। फायदा किसी को हो न हो यह नहीं पता लेकिन काउंट करने लायक नुकसान नहीं होगा इसकी जिम्मेदारी मैं समझती हूँ। हालाँकि सकारात्मक परिवर्तन सम्बन्धी प्रतिक्रियाएं ही मिली है अब तक ज्यादातर और आगे भी यही कोशिश रहेगी। लेकिन लिखना छोड़ने की चाह या बहुत अधिक चर्चा में न पड़ने की चाह व्यक्तिगत अनुभूतियों से ही निकलती है। जैसे आप अपने जॉब से संतुष्ट नहीं है। ऐसे ही दुनिया में किसी भी कार्य से स्थायी संतुष्टि नहीं मिल सकती। मन जिस स्थायी सुख की खोज में रहता है वह मन के मिट जाने में ही निहित होता है और वही सबसे मुश्किल होता है।

प्रश्न : मन जिस स्थाई सुख की खोज में रहता है वह मन के मिट जाने में ही निहित है, कैसे? और ये सम्भव कैसे हो?

उत्तर : इच्छाएं ही दुःख का कारण है। इसलिए इच्छाओं का अंत ही समाधान। यह कैसे संभव है इस पर तो ढेर सारे महापुरुष लिख गए हैं। कई हमारे स्वयं के अनुभव होते हैं। दूसरों के अनुभव शुरूआती तौर पर सहायक हो सकते हैं, लेकिन वास्तविकता यही है कि कोई भी पहले से लिखे गए नियम आदि समाधान नहीं दे सकते। समाधान हमें खुद ही खोजना पड़ता है और हर व्यक्ति का समाधान उसके अनुरूप अलग होता है। आपने अभी रूचि लेना शुरू किया है। धीरे-धीरे आप महसूस करने लगेंगी यह बात। :)

प्रश्न : ज्यादा समझदार होना , अपने ओथेन्टिकल जीवन से दूर ले जाता है मुझे। जीवन एक यात्रा है...इसका कोई भी उद्देश्य नहीं, मुक्ति की चाहत रखना बेवकूफी है। वैसे 'theory of relativity' को समझ कर बहुत सारी सच्चाइयां समझी जा सकती है। (बाकि ,आपके बातों से सहमत हूँ।)

उत्तर : मुक्ति की चाह कोई इरादतन या कहीं से प्रभावित चाह नहीं होती। यह एक सहज इच्छा है जिसका ही प्रतिबिम्ब है दुनिया की तमाम इच्छाएं। बाकी ओथेन्टिकल क्या है और क्या नहीं यह भी विवादस्पद ही है। यह भी व्यक्ति दर व्यक्ति अलग होता जाएगा।

By Monika Jain ‘पंछी’

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