Friday, October 21, 2016

Essay on Diwali in Hindi

दिवाली पर निबंध, दीपावली लेख. Essay on Diwali in Hindi for Kids. Deepavali ka Tyohar Nibandh, Festival of Lights Article. Deepawali Paragraph, Anuched, Speech.

Essay on Diwali in Hindi

जीवंतता कभी बुझ न पाए

दीपक जलकर रोशन करता है अँधेरे...तो जब अंधकार पर प्रकाश की विजय का, असत्य पर सत्य की विजय का, बुराई पर अच्छाई की विजय का, अन्याय पर न्याय की विजय का और मूर्छा पर होश की विजय का उत्सव मनाने की बात आती है तो प्रतीक दीपक से बेहतर और क्या हो सकता है? हमारे सारे उत्सव भी तो प्रतीक ही हैं। ये उत्सव क्यों बनाये गए? इन प्रतीकों की जरुरत क्यों पड़ी?...ताकि हमारी विस्मृति बनी रहे कि हमारा मार्ग क्या है। हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है। भारत में तो हर दिन कोई न कोई उत्सव होता ही है। हमारे उल्लास, उत्साह और हर्ष को बनाये रखने के लिए और किसी मार्ग विशेष पर चलने की प्रेरणा के स्त्रोत के रूप में ही उत्सवों का प्रचलन शुरू हुआ होगा। लेकिन वर्तमान के सन्दर्भ में ये उत्सव अपने उद्देश्य को पूरा कर पाने में कितने सफल हैं, इसका संज्ञान लेना भी बहुत जरुरी है।

जरुरी है त्योहारों का वैज्ञानिक-अध्यात्मिक पक्ष भी प्रकट किया जाए। सामाजिक पारिवारिक सौहार्द वाली बात ठीक है लेकिन केवल कंडीशनिंग और मिथकों के आधार पर कुछ भी करते जाना आस्तिकता को पुष्ट नहीं करता। बल्कि धर्म और अधर्म की जो सबसे उपयुक्त और सदा प्रासंगिक रहने वाली परिभाषा है वह है ही यही कि जो भी कार्य होश या जागरूकता में किया जाए वह धर्म है और जो भी कार्य बेहोशी में किया जाए वह अधर्म।

लेकिन कंडीशनिंग का हाल यहाँ ऐसा है कि दिवाली के पटाखों को लेकर (आजकल तो जन्माष्टमी और छठ पूजा पर भी छूटने लगे हैं) कोई व्यक्ति बात शुरू न करे उससे पहले ही यहाँ हिंदुत्व ख़तरे में आ जाता है। मानों हिंदुत्व का अस्तित्व केवल पटाखों पर ही टिका है। इसी ख़तरे के तहत ‘बाकी धर्मों का भी यही हाल है’ यह बोलना जरुरी है यहाँ।...और ये कंडीशनिंग ऐसी है कि आने वाले समय में बच्चे दीपावली पर निबंध में लिखा करेंगे : आज के दिन अयोध्या वासियों ने श्री राम का स्वागत पटाखे छोड़कर किया था। केवल संस्कृति और परंपरा के नाम पर हम उत्सवों में होने वाली बेबुनयादी और गैरजिम्मेदार चीजों को स्वीकृति नहीं दे सकते। किसी एक का उत्सव दूसरे की पीड़ा न बन जाए इसका ख़याल रखना भी तो जरुरी है न?...और समय के साथ-साथ गैरजरूरी चीजों और दूषित परम्पराओं से छुटकारा भी।

वैसे सबके पास अपने-अपने कारण है दिवाली मनाने के, इसलिए दिवाली किसी वर्ग विशेष का त्यौहार बनकर रहा ही नहीं। किसी के लिए राम की विजय और उनके अयोध्या वापस लौटने का उल्लास है, तो किसी के पास महावीर के निर्वाण प्राप्त करने का। किसी के पास फसल कटकर घर आने का उत्साह है तो किसी के पास गौतम बुद्ध के स्वागत का। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध चाहे जितने भी पंथ या संप्रदाय हो दिवाली एक ऐसा त्यौहार है जो सीमाओं और वर्गों में बंधकर कभी रहा ही नहीं।...और फिर रौशनी को बाँटा भी कहाँ जा सकता है? उस पर तो सबका पूरा-पूरा अधिकार है

दिवाली सूक्ष्म सफाई अभियान के भी अपने वैज्ञानिक पहलु हैं। वर्षा के बाद बढ़ जाने वाली सीलन, नमी, फफूंद आदि से इस सफाई के द्वारा निजात पायी जाती है। घर के हर कोने, छोटी से छोटी हर चीज को दिवाली के बहाने साल में एक बार संभाल लिया जाता है। अतिरक्त और अनुपयोगी सामान निकाल दिया जाता है। सर्दी के कपड़ों को धूप दिखाकर आने वाली सर्दी की तैयारी कर ली जाती है। वैसे मनुष्य कितना परिग्रही है इसका अहसास दिवाली सफाई अभियान में हो ही जाता है। अपने परिग्रह को कम करने का भी यह एक अच्छा अवसर है।

दिवाली यही याद दिलाने आती है हर साल कि हमारे भीतर की जीवंतता कभी बुझ न पाए।...और इस जीवंतता की रौशनी में हमारी दृष्टि स्पष्ट बने। अज्ञान के बादल जिन्होंने ढक रखा है हमारे मन को, उन्हें हम छितरा दें। आशा है यह दिवाली हमारे मन के अंधेरों को जीतने में सहायक बनेगी। इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ : Happy Diwali. :)

By Monika Jain ‘पंछी’