Friday, November 4, 2016

Love Memories in Hindi

यादें, प्यार के किस्से, प्रेम कहानी. Love Memories in Hindi. Remembrance of Old Days, End of College Life, Nostalgia, Memorable Short Stories, Tales, Memoirs. 

Love Memories in Hindi

यादों के झरोखों से

(1)

वो गर्मियों की एक अँधेरी रात थी। हर रोज की तरह उस दिन भी हम उसी सुनसान रास्ते पर घूमने निकले थे, जिस पर चलते-चलते हर रोज हमारे कदम एक मंदिर तक आकर रुक जाते थे। उन दिनों कभी-कभी मंदिर जाना अच्छा लगता था। वहां बहुत चहल-पहल रहती थी। मंदिर में दर्शन के बाद वहीँ बाहर बने चबूतरे पर हम कुछ देर बैठते और फिर वैसे ही लम्बी सैर कर अपने-अपने ठिकाने लौट आते।

उस दिन रास्ते में चलते-चलते अचानक सामने एक बाइक आकर रुकी जिस पर चार लड़के सवार थे। हममें से कोई उन्हें नहीं पहचानता था। पर उन्हें देखकर लग रहा था कि वे नशे में धुत्त हैं। वे चारों बाइक से नीचे उतरे और उनमें से एक तुम्हें मारने लगा। अचानक हुए इस घटनाक्रम से घबराई मैं तुम्हारा नाम पुकारते हुए तुम्हारी ओर आने लगी तो दूसरे लड़के ने मेरा हाथ पकड़ लिया और तीसरे ने चाक़ू भी निकाल लिया। मेरा हाथ पकड़कर खड़े लड़के ने अचानक मेरी आँखों में गौर से देखा तो डर के मारे मेरे मुंह से बस एक ही शब्द निकला, ‘मम्मी!’ पता नहीं उसे अचानक क्या हुआ और उसने एकदम मेरा हाथ छोड़ दिया और अपने सारे दोस्तों को इकट्ठा किया और वे सब उस बाइक पर सवार होकर उसी रफ़्तार से चले गए जैसे आये थे। उस समय तो दिमाग इस अजीब से वाकये को लेकर सुन्न हो गया था और हम घर लौट आये थे। लेकिन अगले ही दिन सब कुछ सामान्य भी हो गया और हमारा घूमना बदस्तूर जारी रहा। :)

(2)

उदास लम्हों में...इधर-उधर की बातें, किस्से, तस्वीरें, आवाजें और कोलाहल सब जब छितर जाता है तो हर बार दूर खड़े सिर्फ तुम ही नज़र आते हो। कॉलेज का वह आखिरी दिन जब तुम्हारा साथ और यादों का वह शहर लगभग छूट रहा था तब आँसू मेरी आँखों में भी थे और तुम्हारी में भी। पहली बार तुम्हें अपने सामने रोते देखा था और तब मेरी रुलाई और भी जोरों से फूट पड़ी थी। भीगी पलकों के साथ एअरपोर्ट पर दूर जाते तुम...मोड़ आते ही पलट कर देखा था तुमने...तब हाथ खुद-ब-खुद ही 'ऑल द बेस्ट' कहने को ऊपर उठ गया था। पूरे छह महीने के बाद उसी शहर में जब तुम वापस आये...तब तुमसे मिलने आई मैं...इंतजार का एक-एक पल इतना उत्साह से भरा था कि पांच मिनट में पांच बार उठकर दूर तक नज़रें तुम्हें ढूंढने लगती थी...और फिर करीब आधे घंटे बाद तुम्हारे नज़र आते ही धड़कनों के थम जाने और ख़ुशी की एक लहर रोम-रोम में दौड़ पड़ने का वह अहसास आज भी कहीं किसी कोने में जिंदा है शायद। कुछ देर बाद वहां आई मेरी सखी जो सारे किस्से से बेख़बर है, उसकी उपस्थिति में जानबूझकर सामने खड़े लगातार रूमानी आँखों से मुझे देखते तुम...पलकें ऊपर उठाना भी मुश्किल कर दिया था तुमने। नहीं याद इस तरह से कब फिर शर्माई होऊँगी। -_-

(3)

त्योहारों के तार यादों से जुड़े होते हैं...उन यादों से भी जिनका इस दिन से कोई सम्बन्ध होता ही नहीं। वरना क्यों अचानक याद आता मुझे वह आसमानी और नारंगी रंगों पर बनी सफ़ेद बंधेज वाला दुपट्टा, जो तुम्हें इतना पसंद था कि सालों तक तुम्हें उसके रंग याद रहे और एक दिन अचानक तुमने पूछा, ‘क्या अब भी पहनती हो वह दुपट्टा?’ मैं कैसे बताती तुम्हें कि जैसे सांझ से विदा हो जाते हैं उसके रंग...कुछ ऐसे ही विदा हो गए मेरे जीवन से एक और सिमट कर दूसरी ओर लहराते वो खूब लम्बे-लम्बे दुपट्टे!

By Monika Jain ‘पंछी’