Wednesday, March 30, 2016

Essay on Nonviolence in Hindi

Essay on Nonviolence in Hindi. Ahimsa Paramo Dharma Paragraph, Ahinsa par Nibandh, Non Violence Day Article, Fearlessness Speech, Abhay Daan Anuched. अहिंसा परमो धर्मः पर निबंध, अभयदान दिवस, जीव दया.
 
जीना सबको ही भाता है
 
हर किसी का जीवन हिंसा पर ही खड़ा है. हिंसा के बिना किसी जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती. लेकिन अनावश्यक हिंसा को तो रोका जा ही सकता है. बचपन में फूलों की सुन्दरता से आकर्षित होकर मैं कभी-कभी फूल तोड़ लेती थी, पर फूल को तोड़ते ही उसकी सुन्दरता जाने कहाँ गायब हो जाती थी और हर बार फूल तोड़ने पर पछतावा ही होता था. धीरे-धीरे कब फूलों का जीवन पौधों पर ही अच्छा लगने लगा, पता भी न चला...और अब फूल नहीं तोड़े जाते. किसी पूजा-पाठ करने वाले के लिए भी नहीं.
 
क्योंकि अगर किसी का यह विश्वास भी है कि सृष्टि की रचना ईश्वर/अल्लाह ने की है, तब भी सृष्टि का रचयिता अपने ही नाम पर अपनी ही रचनाओं की मृत्य से ख़ुश कैसे हो सकता है? किसी निर्दोष या मासूम की हत्या से तो बिल्कुल भी नहीं. हम सभी किसी न किसी मात्रा में हिंसक हैं...कोई कम तो कोई ज्यादा. इसलिए यह तो समझ आता है कि किसी की कटु आलोचना का अधिकार हमें नहीं है. लेकिन हम मिलकर इस दुनिया को जितना संभव हो, सबके लिए सुंदर और जीने योग्य तो बना ही सकते हैं. क्योंकि जीना भला किसे नहीं पसंद? और इतना नहीं कर सकते तब भी इतना तो कर ही सकते हैं कि जो काम गलत है, सिर्फ हमारे स्वार्थ और मनोरंजन के लिए है, धर्म और ईश्वर जैसी अमूर्त चीजों के नाम पर उन्हें मढ़कर उनका महिमामंडन तो न करें.
 
कुछ बच्चे और कुछ बड़े भी कई बार इसी फिराक में रहते हैं कि कब कोई नन्हा कीड़ा-मकोड़ा दिखे और कब उस पर अपना हाथ साफ़ करें. और तो और मारकर ऐसे ख़ुश होते हैं जैसे किसी शेर-चीते को फतह कर आये हों, लेकिन जब वास्तव में शेर या चीता सामने आएगा तो ऐसी घिग्गी बंधेगी कि मुंह से आवाज़ भी नहीं निकलने वाली...तो हिंसा वस्तुत: हमारी कायरता/भय ही है और अहिंसा वीरता...जिसका जन्म सिर्फ निर्भयता से ही हो सकता है. सिर्फ निर्भय ही अभय दे सकता है. इसलिए ही वर्धमान जो अदृश्य जीवों को भी अभयदान देते थे महावीर कहलाये.
 
कुछ दिन पहले किसी अथीति के स्वागत और मनोरंजन के लिए एक कबूतर को रॉकेट के साथ बांधकर उड़ाया गया. हवा में ही कबूतर के चिथड़े उड़ गए. कबूतर से भोला और शांत पक्षी तो ढूंढे नहीं मिलेगा. कई बार बहुत करीब से कबूतर, चिड़िया, चींटी आदि को मरते देखा है. हर बार यही पाया कि मृत्यु की पीड़ा और जीने की इच्छा प्रजातियों में विभेद नहीं करती. मनुष्य जरुर अपने प्रयासों से इस पीड़ा से ऊपर उठ सकता है, और सिर्फ उसी दिन मनुष्य अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ सिद्ध होता है. बाकी एक मनुष्य और पशु में क्या अंतर है? विकास के नाम पर हम कितनी भी ऊंची इमारते बना लें, समूचे विश्व को डिजिटल कर दें लेकिन ये सब करके हम किसी पे कोई अहसान तो नहीं कर रहे. हाँ अपनी जन्मदात्री प्रकृति का दोहन और अन्य प्राणियों से उनके अधिकार जरुर छीन रहे हैं. एक जानवर सिर्फ हमारे मनोरंजन या धर्म की भेंट चढ़ जाए यह स्वीकार्य नहीं है. जैसी संवेदनाएं हम इंसानों में होती है वैसी ही इन पशु पक्षियों में भी. जिस तरह हमारी जीजिविषा है, वैसी ही इन जीवों की भी. जैसा दर्द हमें होता है, वैसा ही इन्हें भी होता है. और जिस दिन हम इतना सा समझ जाएँ उस दिन अहिंसा धीरे-धीरे स्वत: ही जीवन में उतरने लगेगी, उसके लिए फिर अलग से प्रयास की जरुरत नहीं रहेगी.
 
कुछ दिन पहले कुछ बच्चों के साथ छत पर बैठी थी, तभी अचानक कोई मकोड़ा आया और किसी के पैर के नीचे आकर घायल हो गया. मेरे मुंह से बरबस निकला, 'अरे! मकोड़ा मर गया'. वह बच्ची बोली, 'इसे क्या जरुरत थी बीच में आने की.' तब मैंने कहा, 'वह मासूम है. उसे क्या पता कि कहाँ उसकी जान को खतरा है. इसलिए ख़याल तो हमें ही रखना होगा.' वह दिन है और आज का दिन अब जिसे भी मकोड़ा दिखता है वह बोलता/बोलती है, 'मासूम आ गया, मासूम आ गया' और यह कहते हुए पास आने पर सब उसे बचाने की जुगत में लग जाते हैं या सेफ प्लेस पर छोड़कर आ जाते हैं. वे सारे बच्चे माँसाहारी है. उनका यह कार्य प्रेरित हो सकता है. लेकिन वास्तव में अहिंसा हमारा स्वभाव ही है. हम बस उसे भुलाये बैठे हैं.

By Monika Jain ‘पंछी’
 
How is this article about nonviolence or ahimsa?
 

Essay on Science and Religion in Hindi

Essay on Science and Religion Coexist in Hindi. Dharam aur Vigyan Nibandh, Spirituality Article, Conflicts Quotes, Complementary Relationship Paragraph, God Dharma Speech. धर्म और विज्ञान पर निबंध.

(1)
 
जड़ से चैतन्य की ओर
 
चीजों को विज्ञान की भाषा में ही समझना और समझाना बेहद जरुरी है. और युग के अनुरूप अनावश्यक बातों से छुटकारा भी जरुरी है. अनावश्यक अलंकरण और चमत्कृत करना भ्रम पैदा करता है और यहीं से जन्म लेते हैं अन्धविश्वास और अन्धानुकरण.
 
धर्म शब्द को भी बड़ा विचित्र रूप से देखा जाता है. और जितना इसे आस्तिक चमत्कृत रूप से देखते हैं, उतना ही नास्तिक घृणित रूप से. जबकि शब्द बेचारा दूसरे शब्दों की तरह से ही सीधा सा है. बस स्वार्थ के लिए इसका महिमामंडन कर दिया गया है. फ़िलहाल मुझे तो यही समझ में आया है कि धर्म का मार्ग अपने मूल स्वभाव या प्रकृति को पाने का मार्ग है. यह चेतना के विकास का मार्ग है. और यह विकास सिर्फ मनुष्य के लिए नहीं हर वस्तु के लिए है. 
 
ईश्वर का ख़याल करते ही ज्यादातर लोगों के दिमाग में त्रिशूल, तलवार, गोटा और भी ना जाने कैसे-कैसे औजार लिए हुई, ऊपर से नीचे तक सजी धजी छवियाँ उभरने लगती है. जबकि चेतना, आत्मा, परमात्मा ये सभी शब्द पञ्च तत्वों में से उस तत्व की ओर इंगित करते हैं जिसे आकाश, स्पेस, ईथर, स्पिरिट या शून्य आदि कहा जाता है. और शायद इसलिए ही कहा जाता है कि परमात्मा कण-कण में व्याप्त है. 
 
अगर सचमुच वैज्ञानिक ह्रदय बनना है तो ये आस्तिक और नास्तिक की श्रेणियों से थोड़ा बाहर निकलकर खुला और विस्तृत बनने की जरुरत है. न तो हमारे पूर्वज इतने मुर्ख थे और न ही हम इतने बुद्धिमान हैं कि कोई भी बात शत प्रतिशत दृढ़ता के साथ कह सकें. बल्कि मुर्खता का प्रतिशत अब ज्यादा नजर आता है. क्योंकि अगर हर कोई इतना जड़ हो जाता तो पशु से मनुष्य तक की ये यात्रा भी संभव न होती. और जब पशु से मनुष्य तक की यात्रा संभव है तो मनुष्य से परमात्मा तक की यात्रा की संभावनाओं को भी खारिज नहीं किया जा सकता. लेकिन शब्दों के मनमाने अर्थ लगाकर कई लोग फिर से मनुष्य से पशु बनने की तैयारी में लगे हुए हैं.
 
(2)
 
उत्थान या पतन

(Science without Religion is Lame, Religion without Science is Blind )
 
विज्ञान खोज का मार्ग है...हम उसे दोहन का मार्ग बना रहे हैं.
धर्म भी पथ है गति का...पर हम उसे दुर्गति का पथ बना रहे हैं.
धर्म और विज्ञान पूरक है उत्थान के...रुको!...कहीं हम उन्हें पतन का पूरक न बना दें.
 
प्रश्न : इतनी गूढ़ बात कहो तो फिर जरा विस्तार से कहा करो बौस..... न समझ आऐ तो....??

उत्तर : न समझ आये तो पूछा जाए. :) विज्ञान प्रकृति के रहस्यों को जानने का मार्ग है. हमने उसे सुविधाभोगी तकनीक के लिए प्रकृति के दोहन तक सीमित कर दिया है. धर्म आत्मा/परमात्मा के रहस्य तक पहुँचने का मार्ग है...हमनें उसे पाखण्ड, दिखावे, कट्टरता और राजनीति तक सीमित कर दिया है. धर्म और विज्ञान सहायक है एक दूसरे के...रहस्यों को जानने के लिए. खोज का एक रास्ता बाहर को जाता है और एक भीतर को. लेकिन आज दोनों अपना मूल खो रहे हैं.

प्रश्न : बाकी सब तो ठीक है लेकिन यह 'धर्म' कौन सा वाला धर्म है; रिलिजन वाला धर्म या फिर 'यदा यदा ही धर्मस्य...' वाला धर्म?

उत्तर : ये धर्म है अपनी मूल प्रकृति तक पहुँचने का.

प्रश्न : कृपया थोड़ा प्रकाश डालें... क्या है हमारी मूल प्रकृति?

उत्तर : हर व्यक्ति जीवन में मुख्य रूप से क्या चाहता है? जो सामान्यतया उसे मृत्यु तक नहीं मिलता. वह जो सामान्यत: नहीं मिलता है उसे पा लेना ही मूल प्रकृति को पा लेना है. बाकी तो जब मिलेगी तब बताऊंगी. :p

प्रश्न : मोनिका जी ऐसे कुछ भी से काम नहीं चलेगा, कृपया विस्तार से बताएं. यह तो टालने वाली बात हो गयी.

उत्तर : धर्म जीवन के समस्त द्वंदों से मुक्त होने का मार्ग है. मनुष्य जिस सुकून की तलाश में जीवन भर भटकता रहता है, उसे पाने का रास्ता. टाला नहीं है. धर्म के बारे में सबसे सही रूप में वही बता सकता है जो इन द्वंदों से पूर्ण रूप से मुक्त हो चुका हो. बाकी कई चीजें लिखती रहती हूँ. पसंदीदा विषय है. आप पढ़ते रहिये. जवाब मिल जायेंगे.

By Monika Jain ‘पंछी’

How is this article about religion and science?
 
 

Tuesday, March 29, 2016

Childhood Quotes in Hindi

Childhood Quotes in Hindi. Children’s Day Sms, Kids Messages, Bachpan Par Vichar, Children Sayings, Child Slogans, Bal Diwas Lines, Memories Quotations, Suvichar, Status. बाल दिवस, बचपन पर सुविचार.

Childhood Quotes

  • एक दोस्त कहता था - तुम्हारी सोच परिपक्व है, पर शक्ल, आवाज़, रोना, हँसना, गुस्सा, मनाना और दिल बिल्कुल बच्चों जैसा है. इसलिए जिससे भी तुम्हारी शादी होगी उसे बच्चा और समझदार वाइफ एक साथ ही मिल जायेंगे. :p जोक्स अपार्ट....पर मैं भी यही चाहती हूँ कि जब तक मैं जिन्दा रहूँ, मेरा बचपन भी जिन्दा रहे. इस दुनिया की शानो शौकत, दिखावे, बन्धनों, परम्पराओं और चमक-दमक से दूर जब भी मैं बच्चों के साथ होती हूँ तो खुद को बिलकुल आज़ाद महसूस करती हूँ. तब मैं पूरी तरह से मैं होती हूँ. मुझे बच्चों के साथ खेलना, उनसे बातें करना, उन्हें प्यार करना, उनका ख्याल रखना, उन्हें अच्छी-अच्छी बातें सिखाना, अपने हाथों से उन्हें खाना खिलाना, उन्हें कहानियां सुनाना, उनके साथ सालसा डांस करना...और भी बहुत कुछ...बहुत अच्छा लगता है. कुछ दोस्त पूछते हैं आपकी ज्यादातर पिक्स बच्चों के साथ क्यूँ होती है? इसका सीक्रेट है कि बच्चों के साथ मेरी पिक्स स्वाभाविक रूप से अच्छी आती है :). आज भी, जब भी मुझे मौका मिलता है तो चाहे सड़क हो, घर हो या कोई भी जगह मैं बच्चों के साथ बचपन वाले गेम्स खेलने लग जाती हूँ . माँ! मुझे बड़ा नहीं बनना. मुझे बच्चा ही रहना है. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • बच्चे मुझे बड़ा नहीं समझते. 'चिड़िया उड़, तोता उड़' से लेकर 'ओ मीना, मीना सानी', 'अक्कड़-बक्कड़', 'कार्ड्स की मैचिंग'...सारे के सारे गेम खिलवाकर ही मानते हैं. लगता है चिड़िया उड़ खेलते-खेलते ही उडूंगी एक दिन. :p ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • बच्चों को कुछ सिखाते और समझाते समय एक अच्छा अवसर होता है खुद के कुछ सीखने और समझने का भी...वह सब जो अब तक हम सीख या बदल नहीं पाए. माता-पिता और शिक्षकों के बाद शायद बच्चे ही सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं जीवन में. जरुरत बस खुद के और बच्चों के प्रति ईमानदारी की है. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • माँ क्या, बच्चे तो अपनी प्यारी, तुतलाती आवाज़ में मौसी, बुआ, दीदी कुछ भी कहे...जन्नत सा अहसास हो आता है. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • मम्मा वाशिंग मशीन में कपड़े धो रही है और बेबी ने बड़े प्यार से रट लगा रखी है, 'मम्मा-मम्मा मुझे इसमें डाल दो.' इसे कहते हैं खतरनाक मासूमियत. मम्मा ने कभी जरुर कहा होगा...रोना बंद कर...वरना अभी वाशिंग मशीन में डाल दूंगी. :p ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • बच्चे गीले सीमेंट के समान हैं. जो कुछ उन पर गिरता है, छाप छोड़ जाता है. ~ हेम गिनोट / Haim Ginott 
  • यदि आप चाहते हैं कि आपका बच्चा सही मार्ग पर चले तो उसे केवल ऐसी जानकारी न देवें बल्कि उस पर चलकर भी दिखाएँ. ~ जे ए रोसेनक्रांज़ / J. A. Rosenkranz  
  • प्रत्येक शिशु एक सन्देश लेकर आता है कि भगवान मनुष्य को लेकर हतोत्साहित नहीं है. ~ रवीन्द्रनाथ टैगोर / Rabindranath Tagore 
  • बच्चों को सीख देने का जो श्रेष्ठ तरीका मुझे पता चला है, वह यह है कि बच्चों की चाह का पता लगाया जाए और फिर उन्हें वही करने की सलाह दी जाए. ~ हैरी ट्रुमेन / Harry Truman  
  • प्रत्येक बच्चा एक कलाकार होता है, समस्या यह है कि युवा होने पर भी कलाकार कैसे बने रहा जाए? ~ पाबलो पिकासो / Pablo Picasso

How are these quotes about childhood? 


Monday, March 28, 2016

Poem on Women in Hindi

Poem on Women in Hindi. Woman Power Poetry, Indian Lady Rhymes, Bhartiya Nari Shakti ki Mahima par Kavita, Mahila Diwas Shayari, Aurat Slogans, Female Lines, Stree. भारतीय नारी शक्ति पर कविता, महिला.

नारी तुम हो सबकी आशा

किन शब्दों में दूँ परिभाषा?
नारी तुम हो सबकी आशा.

सरस्वती का रूप हो तुम
लक्ष्मी का स्वरुप हो तुम
बढ़ जाये जब अत्याचारी
दुर्गा-काली का रूप हो तुम.

किन शब्दों में दूँ परिभाषा?
नारी तुम हो सबकी आशा.

खुशियों का संसार हो तुम
प्रेम का आगार हो तुम
घर आँगन को रोशन करती
सूरज की दमकार हो तुम.

किन शब्दों में दूँ परिभाषा?
नारी तुम हो सबकी आशा.

ममता का सम्मान हो तुम
संस्कारों की जान हो तुम
स्नेह, प्यार और त्याग की
इकलौती पहचान हो तुम.

किन शब्दों में दूँ परिभाषा?
नारी तुम हो सबकी आशा.

कभी कोमल फूल गुलाब सी
कभी शक्ति के अवतार सी
नारी तेरे रूप अनेक
तू ईश्वर के चमत्कार सी.

किन शब्दों में दूँ परिभाषा?
नारी तुम हो सबकी आशा.

By Monika Jain 'पंछी'
 
Women are symbol of love, care, sacrifice, compassion, gentleness, strength and values. They are smart, beautiful, sensual, strong, caring, surviving, giving, tolerant and powerful. The power of a woman is endless. They are backbone of the earth. They give life to the world. From morning to night they perform multitasks. They can do almost anything they put their mind to. They smile even during stress and trouble. They are epitome of strength. As a mother, wife, sister, daughter, friend they play various vital roles till their last breath with full dedication. They are fountain of life. The above poem is dedicated to all the women of this universe. 

Unity Quotes in Hindi

Quotes on Unity is Strength in Hindi. Diversity Slogans, National Integration Messages, Togetherness Sms, Ekta Mein Anekta Bal Shakti Hai, United We Stand Lines, Harmony. अनेकता, एकता में बल शक्ति है.

Unity Quotes

  • विभाजन सुविधाओं के लिए किये जाते हैं...उन्हें जकड़कर और पकड़कर बैठने के लिए. वैसे भी सब कुछ इतना अंतर्संबंधित है कि कोई स्पष्ट रेखा खींची ही नहीं जा सकती. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • मतभेद थे, हैं और हमेशा रहेंगे. ऐसा कभी नहीं हो सकता कि आप मेरी सभी बातों से सहमत होंगे. ऐसा भी असंभव है कि मैं सिर्फ आपको खुश करने वाले शब्द ही बोलूं, पर मैंने इतने सालों में यही सीखा है कि मतभेदों को महत्त्व देकर नफ़रत पाल लेना, आक्रामक हो जाना, रिश्तों की तिलांजलि दे देना और संवाद को हमेशा के लिए खत्म कर देना बेवकूफी है. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • प्रकट हो या अप्रकट जातीय मानसिकता हर दूसरे व्यक्ति में पायी जाती है जिसके पीछे विलुप्त हो जाते हैं इंसान को इंसान बनाने वाले गुण. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • समर्थन और विरोध विचारों का होना चाहिए व्यक्ति का नहीं. मत भेद कभी मन भेद नहीं बनने चाहिए. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • बारिश की एक बूंद तूफान की तुलना में क्या है? एक विचार मन की तुलना में क्या है? हमारी एकता आश्चर्य से पूर्ण है जो तुम्हारा छोटा व्यक्तिवाद धारण भी नहीं कर सकता है. ~ Ken Levine  
  • एकता शक्ति है...जहाँ सामूहिक कार्य और सहयोग है वहां अद्भुत चीजे हासिल की जा सकती है. ~ Mattie Stepanek  
  • एकता का प्रकाश इतना शक्तिशाली है कि यह सारी पृथ्वी को रोशन कर सकता है. ~ Baha'u'llah  
  • जो इंसान को भगवान् से अलग कर देता है वह इंसान को इंसान से भी अलग कर देता है. ~ Edmund Burke 
  • समूचे जनसमूह में भाषा, भाव की एकता और सौहार्द का होना अच्छा है. इसके लिए तर्क शास्त्रियों की नहीं, ऐसे सेवाभावी लोगों की जरुरत है जो बाधाओं को स्वीकार करके काम करने में जुट जाते हैं. ~ हजारी प्रसाद द्विवेदी / Hazari Prasad Dwivedi  
  • एकता से हमारा अस्तित्व कायम रहता है, विभाजन से हमारा पतन होता है. ~ जॉन डिकिन्सन / John Dickinson 
  • एकता चापलूसी से कायम नहीं की जा सकती. ~ महात्मा गाँधी / Mahatma Gandhi  
  • एकता का किला सबसे सुरक्षित होता है. न वह टूटता है और न उसमें रहने वाला कभी दुखी होता है. ~ अज्ञात / Unknown  
  • सम्प्रदाय तो साधनरूप है, परन्तु साम्प्रदायिकता अभिशाप है. ~ स्वामी सनातनदेव / Swami Sanatan Dev
 
How are these quotes about unity?
 
 

Sunday, March 27, 2016

Short Love Stories in Hindi

Short Sad Love Stories in Hindi. Dard Bhari Prem Kahani, Heart Touching Real Memories, Wait, Intezar Kahaniyan, Small Story, Pyar ki Yaadein Tale, Painful Tales. लघु प्रेम कहानी, कहानियां.
 
(1)

छोटी बेबी
 
कभी वह उसके लिए उसकी लड्डू, बेटू और छोटी बेबी हुआ करती थी. दिन में कई बार तीन फ्लोर की सीढियाँ चढ़ते उतरते और बहुत पैदल चलने पर कभी जब उसके पाँव दर्द करने लगते तो वह रात में उसके पाँव दबा देता था और उसके बालों को सहलाते हुए उसे सुला देता था. रात-रात जागते परीक्षा के दिनों में किसी पेपर के खत्म होकर घर पहुँचते ही खाना खाकर वह उसकी गोद में सर रखकर...उसे पकड़कर सो जाती थी. वह दीवार से सटकर उसे यूँ ही सुलाए रहता. वह अक्सर कहता था, 'तुममें जितना बचपन है...उतना ही बड़प्पन भी. पता है...जिससे भी तुम्हारी शादी होगी उसे बच्चा और समझदार बीवी दोनों साथ-साथ मिल जायेंगे.'

वह हँसती और कहती, 'किसी और से क्यों, तुमसे क्यों नहीं?'

'तुम्हारा परिवार नहीं मानेगा. लेकिन मैं हमेशा तुम्हारा इंतजार करूँगा. तुम्हारी शादी के बाद भी. अगर जीवन में कभी भी तुम्हें लगे कि तुम ख़ुश नहीं हो तो तुम मेरे पास लौट आना' ...और ऐसा कहते और सुनते उन दोनों की आँखें भीग जाती.

अतीत की स्मृतियों से अचानक वह बाहर आती है. आज उससे फोन पर बात हुई थी. उसने बताया था वह पापा बनने वाला है. वह ख़ुश हुई और उसे उसकी इस ख़ुशी पर बधाई दी. बचपन और बड़प्पन दोनों उसमें आज भी है न. :)

(2)

इंतजार
 
वे दोनों सालों से नहीं मिले. गुजरते समय ने दोनों के जीवन में बहुत कुछ बदल दिया.

दूरियाँ ग़लतफ़हमी पैदा करती है, पर जब भी वे बात करते हैं तो सारी गलतफहमियां और गिले-शिकवे दरकिनार हो जाते हैं और उनकी बातों में उन मीठी पुरानी यादों का पिटारा खुल जाता है. भीगी आँखों में एक दूसरे के पुराने अक्स तैरने लगते हैं और धड़कते दिलों में बस एक ही शब्द गूंजता है...काश!

वह नहीं चाहती पर उसकी आँखों से आंसू निकलने लगते हैं. वह छिपाती है पर आवाज़ का भारीपन और रह-रह कर निकलती सिसकियाँ उसकी तकलीफों और तड़प को बयां कर देती है.

पर ये आंसू भी उसका सारा दर्द कहाँ निकाल पाते हैं. जब रोती आँखों को कन्धों का सहारा ना मिले तो दर्द की घुटन तो बाकी रहनी ही है.

वह कहता है (क्योंकि सिर्फ वही समझता है ) 'तुम्हें ढेर सारे प्यार की जरुरुत है. तुम यहाँ आ जाओ, मैं तुम्हारा बहुत खयाल रखूँगा. फिर धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा.'

वह छटपटाती है. उड़ना चाहती है. उसके पास जाना चाहती है. पर वह अपनी तकलीफों से लड़ते-लड़ते बहुत थक चुकी है. उसमें अब उड़ने की ताकत नहीं. न ही कोई नया सपना संजोने की हिम्मत. ऊपर से ढेर सारे बन्धनों की जकड़न. वह बहुत मजबूर है. बहुत ज्यादा.

पर वह खुश है कि आज भी उसे उसका इंतजार है. लेकिन वह यह भी चाहती है कि वह आगे बढ़ जाए.

अतीत की स्मृतियों से वह बाहर आती है. साल भर पहले ही तो उसकी शादी हुई थी. इसके कुछ सालों पहले वह उसके इंतजार में ख़ुश थी...और अब उसके आगे बढ़ जाने पर भी.
 
(3)

कितनी बातें याद आती हैं...
 
आज अचानक तुम्हारी बहुत याद आई. तुम्हारे पास रहते हुए...तुम्हारे साथ रहते हुए...कभी महसूस ही नहीं हुआ कि मैं किसी बंधन में हूँ. मुझे याद नहीं हमारी किसी भी बात को लेकर कभी भी कोई बहस हुई हो. हमने कभी कुछ नहीं थोपा एक दूसरे पर...कुछ भी नहीं.

हम अक्सर देखा करते थे...कैसे कई कपल्स हमेशा एक दूसरे से लड़ते-झगड़ते रहते थे...और मैं अक्सर सोचती थी कि हमारे बीच कभी झगड़ा क्यों नहीं होता?...और फिर कभी-कभी मैं जान-बूझकर वाली लड़ाई किया करती थी...पर उसमें भी कभी कामयाब नहीं हो पाती.

क्योंकि एकतरफ़ा लड़ाई और गुस्सा भला कब तक चलेगा? मुश्किल से आधा घंटा भी नहीं होता होगा और मेरी आँखों से गंगा-यमुना बहने लगती...और फिर लम्बी लड़ाई का सारा प्लान फ्लॉप हो जाता. उसके बाद भीगी आँखें और डरे-सहमे से मन के साथ कैसे मैं बच्चों की तरह तुम्हारा हाथ पकड़ लेती और फिर हम मेरी सबसे पसंदीदा..एक लम्बी सी वाक पर जाते. सोच रही हूँ...वो रास्ते आज भी हमें याद करते होंगे न?
 
By Monika Jain 'पंछी'

Monday, March 21, 2016

Essay on Character in Hindi

Essay on Character in Hindi. Charitra Bal par Nibandh. Conduct Types, Personality Traits Article, Nature Paragraph, Temper, Behavior, Habits, Spirit. व्यक्तित्व के प्रकार, चरित्र बल पर निबंध, स्वभाव.
 
अज़ब-ग़ज़ब के लोग हम

बीते दिनों शिवा ट्रायलॉजी का दूसरा भाग ’नागाओं का रहस्य’ पूरा किया. अमीश ने शिव के माध्यम से एक बेहद सुन्दर बात कही है, 'कोई भी अच्छा या बुरा नहीं है. वे या तो शक्तिशाली होते हैं या फिर दुर्बल. शक्तिशाली व्यक्ति अपनी नैतिकताओं पर टिके रहते हैं, चाहे कितनी ही परीक्षा हो या संकट आये. दुर्बल व्यक्ति अधिकतर समय इस बात का अनुभव भी नहीं करते कि वे कितना गिर चुके हैं.' अब इसे हम अच्छाई और बुराई कहें, शक्ति और दुर्बलता कहें या फिर सकारात्मकता और नकारात्मकता...इन दोनों के अलग-अलग मात्रा में संयोग से ही बनते हैं विभिन्न व्यक्तित्व और चरित्र.
 
एक मजबूत व्यक्तित्व के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है अपनी अंतरात्मा के प्रति जवाबदेही. यह जवाबदेही उसे स्वत: ही दुनिया में अपने कर्तव्यों के प्रति जिम्मेदार बना देती है. उनका कोई भी कार्य कोई छवि विशेष बनाने के लिए नहीं होता. उनके कार्य उनकी अंतरात्मा से प्रेरित होते हैं. वहीं एक कमजोर व्यक्तित्व के लिए अपना भौतिक सुख सबसे पहले आता है. हाँ, दुनिया के सामने अपनी इमेज उनके लिए महत्वपूर्ण हो सकती है...पर वहां अच्छाई सहज या स्वाभाविक न होकर मेनीपुलेट होगी..जिससे जन्म लेते हैं पाखण्ड और आडम्बर. इसके साथ ही कोई ऐसा भी हो सकता है जिसकी जवाबदेही न अपनी अंतरात्मा के प्रति हो और न ही जिसे अपनी किसी इमेज की चिंता हो. अमीश के नॉवेल के ही चरित्रों की बात करें तो शिव और सती मजबूत चरित्र को और दक्ष एक कमजोर चरित्र को प्रकट करता है, जो अपनी छवि की सजगता को लेकर अपनी विकृत पुत्री और पौत्र का ही परित्याग कर देता है, यहाँ तक कि विकृत संतानों के जन्म का दोष भी अपनी पत्नी पर मढ़ देता है. ऐसे चरित्रों के झूठ और सच सिर्फ अवसरों की खोज में रहते हैं. हालाँकि अभी तीसरा भाग वायुपुत्रों की शपथ पढ़ना बाकी है. उससे कई और नयी चीजें सामने आएँगी.
 
वर्षों के ऑब्जरवेशन में मैंने भी इसी तरह की एक विशेष प्रजाति को डिटेक्ट किया है...जो अपने जीवन की हर विषमता, हर मुश्किल, हर परेशानी का दोष दूसरों पर मढ़ने को हर वक्त तैयार रहते हैं...वहां भी जहाँ दूर-दूर तक कहीं कोई आधार ही न हो. अपनी निराशा, कुंठा, झुंझलाहट और नफरत का ठीकरा फोड़ने के लिए इन्हें हमेशा ऐसे शख्स की जरुरत पड़ती है जो निर्दोष या संवेदनशील हो, या फिर भावनात्मक रूप से उनसे जुड़ा होने की वजह से उन्हें कोई हानि न पहुंचा पाए और अपराधी न होते हुए भी अपनी संवेदनशीलता या जुड़ाव की वजह से दु:खी होता रहे. दोष मढ़ने वाले ये लोग हमेशा किसी न किसी को कोसते नजर आयेंगे...जीवन-साथी, माता-पिता, पुत्र-पुत्री, बाहरी व्यक्ति...कोई भी वह शिकार हो सकता है. मनहूस, अपशगुनी, विकर्म... ऐसे शब्द निश्चित रूप से इसी प्रजाति की उपज होंगे. हद तब हो जाती है जब उनका मोबाइल, कंप्यूटर, टीवी या कोई भी चीज ख़राब होती है तब भी वे किसी को दोष मढ़ने के लिए ढूंढ निकालते हैं...भले ही वह व्यक्ति सात समुन्दर पार ही क्यों न बैठा हो. यह कैसी मानसिकता है इसे अभी तक समझ नहीं पायी, पर हाँ फ़िलहाल इसे कह सकती हूँ गैरजिम्मेदारी की पराकाष्ठा! वैसे सबसे मजेदार बात यह होती है कि मौकापरस्त ये लोग अपनी रणनीति को बदलते हुए किसी की निजी जीवन की परेशानियों को पहले खोद-खोद कर जानते हैं फिर अवसर आने पर अपनी घृणा को तुष्ट करने के लिए यह हमला करते हुए भी पाए जाते हैं कि जरुर भुगत रहे होंगे अपने ही कर्मों का फल. सुपर क्यूट! इसे कहते हैं चित भी मेरी और पट भी मेरी. :) काश! भरोसे और विश्वास को कायम रखने का मतलब उन्हें पता होता. वह भरोसा जिसे मृत्यु भी खत्म नहीं करती.
 
इसी तरह किसी विषय विशेष पर चर्चा करते हुए कुछ भद्र जनों के तर्क जब खत्म होने लगते हैं तो अपशब्द/कुतर्क शुरू हो जाते हैं. जिन्हें शब्दों की मर्यादा में रहते हुए सत्य (कटु हो सकता है) पर दृढ़ता से टिके रहना आता है और अपनी गलती होने पर स्वीकार करना और क्षमा माँगना भी आता है, उन्हें कुटिल अपशब्दों और क्रूर व्यंग्यों के स्तर तक जाने की जरुरत नहीं पड़ती. ऐसा नहीं है कि उन्हें ऐसे शब्दों की जानकारी या प्रयोग पता नहीं होता, लेकिन स्वाभाविक/सहज तौर पर उन्हें जरुरत पड़ती ही नहीं...और जिन्हें पल-पल में इसकी जरुरत पड़ती है उनके स्तर का अंदाज़ा लगा ही सकते हैं. सबसे मजेदार बात यह कि कुतर्कों का कीचड़ उछालने में जिनकी क्षमता सबसे तेज होती है, कड़वे सच को झेलने में वे उतने ही फुस्स होते हैं.
 
कई लोगों के लिए आध्यात्म अलग से कोई विषय या चर्या है. मुझे लगता है आध्यात्म एक सहज गुण है जिसे विकसित जरुर किया जा सकता है, लेकिन किसी अलग खांचे में नहीं बांटा जा सकता कि चलो इतने समय हम आध्यात्मिक हो लेते हैं और बाकी समय भौतिक. इसके अलावा यह आध्यात्म का गुण ही होता है जो व्यक्ति को जिम्मेदार बनाता है. अपनी गलतियों, अपनी परेशानियों की जिम्मेदारी खुद लेने जितना मजबूत और सक्षम बनाता है. क्षमा मांगने और क्षमा कर देने जितना साहसी भी और अहंकार से उपजी कृतघ्नता छोड़कर कृतज्ञ और विनम्र भी. अपनी अति उन्नत अवस्था में (महावीर या बुद्ध जैसे व्यक्तित्व के रूप में) यह दूसरों की अपने प्रति गलतियों को भी उसे अपने ही कर्म फल का निमित्त मानकर भूल जाता है. इस चरम स्तर तक जो पहुँच जाए निश्चय ही वह अपने जीवन में कभी दु:खी नहीं हो सकता. और शायद इसी वजह से ही आध्यात्म आनंद की कुंजी है. ईश्वर हम सभी को इस मार्ग पर चलने में सक्षम बनायें...और इतना निर्भय बनाये जहाँ न हम किसी से भयभीत हों और न ही कोई हमसे.
 
By Monika Jain ‘पंछी’

How is this article about some personality traits?

Sunday, March 20, 2016

Poem on Holi in Hindi

Poem on Holi in Hindi for Kids. Rango ka Tyohar Phagwah Kavita, Happy Festival Sms, Colours Shayari, Messages, Quotes, Rang Panchami Poetry, Fagun Slogans Lines. रंगों का त्योहार होली पर कविता, फगुआ.
 
आओ मिलकर होली खेलें!
 
लाल, नीले, हरे और पीले
होली के हैं रंग सजीले
भेदभाव सब भूल के यारों 
आओ मिलकर होली खेलें!

लाल रंग का तिलक लगाकर
रंग गुलाबी गाल सजाकर
कर दे वस्त्र हरे और नीले
आओ मिलकर होली खेलें!

जाँत-पाँत के बंधन छोड़ें 
नफरत की दीवारे तोड़ें 
दिल के दरवाजे हम खोले
आओ मिलकर होली खेलें!

मीठे-मीठे पकवान पकाएं
खुद खाएं औरों को खिलाएं
गुजिया, लस्सी, दही और भल्ले
आओ मिलकर होली खेलें!

भूल के सारे गम के फँसाने
खो जाये रंगों में दीवाने
प्यार के रंग में होकर गीले
आओ मिलकर होली खेलें!

By Monika Jain 'पंछी'

How is this poem about holi festival? 
 
 

Saturday, March 19, 2016

Poem on Darkness in Hindi

Poem on Darkness in Hindi. Andhera Kavita, Andhkar Shayari, Dark Matter Poetry, Energy, Shiva, Shakti, Beyond Duality, Light, Jealousy, Competition, Fearlessness Lines. अँधेरा कविता, अंधकार शायरी.
 
मुझे तो बनना ही है अंधकार...
 
ईर्ष्या से प्रेरित प्रतिस्पर्धा तुम्हारी
जीतने चली है उससे
जो दौड़ में शामिल ही नहीं!
 
चलो तुम बन जाओ चमकदार
मुझे तो बनना ही है अंधकार...
वह अंधकार जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं!
पर देखो! जिसका कोई अस्तित्व नहीं
उसी से तो है यह सारा अस्तित्व!

पहुँचने को मुझ तक
बनाने पड़ते हैं तुम्हें छद्म रास्तें,
पर यहाँ है सब कुछ प्रकट और स्पष्ट,
जहाँ सच और ईमानदारी नहीं है
अवसरवादिता के वास्ते!

चलो तुम गर्व करो अपनी कठोरता पर
मैं ख़ुश हूँ अपनी कोमलता के संग!
कठोरता की कमजोरी और
कोमलता की मजबूती से अनभिज्ञ
तुम यह तो जानते ही होंगे कि
कठोरता बना जाती है अघुलनशील
और कोमलता बन जाती है स्नेह की झील!

द्वंद्वों की शुरुआत थी तुम्हारी ओर से
मैं करुँगी इनका अंत बनकर निर्द्वंद्व!
गांठों में उलझा है तुम्हारा व्यक्तित्व!
उलझे रहो! मैं बनूँगी एक दिन निर्ग्रन्थ!

तुम्हारे लांछन, व्यंग्य और विश्वासघात
नहीं पहुंचा सकते अब कोई भी आघात!
तुम उधेड़ते रहो मेरे चरित्र की बखिया
पर निर्भयता से सदा चमकती रहेंगी ये अँखियाँ!

By Monika Jain ‘पंछी’

( नोट : कुछ कवितायेँ लिखी नहीं जाती, बस लिख जाती है, अनन्त की प्रेरणा से!)
( नोट : शिव को डार्क मैटर और शक्ति को डार्क एनर्जी कहा जाता है. )


Thursday, March 17, 2016

Essay on Holi in Hindi

Essay on Holi in Hindi for Kids. Indian Festival of Colours Paragraph, Hindu Tyohar Nibandh, Speech, Rang Panchami Anuched, Article, Lekh, Write Up, Matter. होली रंगों का त्यौहार निबंध, रंग पंचमी लेख.
 
सुनों! रंग क्या कहते हैं?
 
तुमको हमारी उमर लग जाए :

सफेद रंग है नयी शुरुआत का रंग. एक कैनवास जिस पर नयी इबारत लिखी जानी है. आज आपके जीवन का भी एक नया अध्याय शुरू होने जा रहा है. दुनिया से निर्लिप्त रहने, कुछ भी पकड़कर ना रखने और सब कुछ बाहर की ओर बिखेरने का प्रतीक यह रंग आपके जीवन में आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करे. शांति, शुद्धता, विद्या, नीति, सात्विकता और पवित्रता का प्रतीक यह रंग आपके जीवन में रौशनी और खुलेपन का विस्तार करे. सुरक्षा और धैर्य का प्रतीक यह रंग आपको सभी विपदाओं से बचाये. सकारात्मकता, संतुलन, संवेदनशीलता, ईमानदारी, आत्मनियंत्रण, आत्मविश्वास, सादगी, बराबरी, पारदर्शिता, संयम और स्वतंत्रता का प्रतीक यह रंग आपको केवल दीर्घायु ही नहीं बल्कि अमरत्व प्रदान करे.

मुरादें हों पूरी सजे हर तमन्ना :

शक्ति, ऊर्जा, स्फूर्ति, कम्पन, उत्साह, महत्वकांक्षा और उल्लास का प्रतीक यह लाल रंग आपको उगते सूरज की तरह सिरमोर बनाये. प्रेम, रोमांच और आकर्षण का प्रतीक यह रंग आपके जीवन को सच्चे प्रेम से सुवासित करे. यह रंग आपके जीवन में आनंद का संचार करे. आपके आभामंडल को शक्तिशाली बनाये. सिन्दूर, रोली और कुमकुम का यह रंग आपके जीवन में शुभ और मंगल का संचार करे. शौर्य, साहस और विजय का प्रतीक यह रंग आपके गौरव, तेजस्विता और यश में उत्तरोतर वृद्धि करे. सजीवता का प्रतीक यह रंग आपकी प्राण शक्ति का नित पोषण करे. आपकी सभी शुभेच्छाएं पूरी हो. विवाह के प्रतीक इस रंग के सकारात्मक प्रभाव से जल्द ही आपके जीवन में मनचाहे साथी का आगमन हो.

मोहब्बत की दुनिया के तुम चाँद बनना :

पीला रंग अर्थात बासंती रंग, उत्सव का रंग, प्रेम का रंग, ख़ुशी का रंग. आपको जीवन में ऐसा प्रेम मिले जो मुक्ति के आकाश में जन्मा हो. जिसमें स्वतंत्रता की सांस हो, विश्वास का प्रकाश हो, करुणा की धार हो. ऐसा प्रेम जो आपकी बातों, ख़्वाबों और मुस्कुराहटों में जीवन भर सके. ऊर्जा का संवाहक यह पीला रंग आपके जीवन में हमेशा गर्माहट का अहसास बनाये रखे. सूझबूझ, सुकून और जिज्ञासा से संपन्न रखे. सादगी, निर्मलता, सात्विकता, उदारता और उत्फुल्लता का प्रसार करे. मूलाधार चक्र का यह रंग आपकी रचनात्मकता, सकारात्मकता, स्वाभिमान, आत्मविश्वास और स्थिरता में वृद्धि करे. मित्रता का प्रतीक यह रंग आपको सदा सच्चे मित्रों से संपन्न रखे. हल्दी का यह रंग आपके जीवन में सुख-सौभाग्य और समृद्धि लाये. पीले रंग से सम्बद्ध वृहस्पति गृह और वसंत पंचमी पर पूजित माँ सरस्वती आपके ज्ञान में उत्तरोतर विकास करे. आपके ऐश्वर्य, कीर्ति, भव्यता, सुख, आरोग्यता और योग्यता में नित वृद्धि हो.

सितारों से ऊंचा हो रुतबा तुम्हारा : 
 
जीवन के सारे अंधियारों को धता बताते हुए आप सफलता की असीम ऊंचाइयों को छुएँ. सागर की गहराई से बीनने हो मोती, चाहे करने हो अनन्त आकाश पर अपने हस्ताक्षर, करना हो ब्रह्माण्ड के रहस्यों का उद्घाटन, चाहे भरना हो कई मुस्कुराहटों में जीवन या फिर लिखनी हो अपने हाथों से अपनी तकदीर, आप हमेशा आगे बढ़ते रहें और सफलता पल, प्रतिपल, अहर्निश आपके साथ रहे. आपको आपकी शक्ति, बुद्धि, क्षमता, कुशलता, प्रखरता, आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास और स्वाभिमान की लौ से प्रकाशित सम्पूर्णता का आकाश मिले. आपकी सफलता की राह में कोई भी विघ्न ना टिक पाये, पर्वत के पाँव उखड़ जाए और पत्थर भी पानी बन जाये. आपको कभी भी रास्ते तलाशने ना पड़े, बल्कि आप रास्ते तराशते हुए जन-जन के मार्गदर्शक बनें.

बहारों की मंजिल पे हँसना हँसाना :

ज़िंदगी आपकी मुस्कुराहटों में मुस्कुराने लगे. आपके उत्साह की किरणें समूचे वातावरण को सजीव और मुखरित बना दे. हरी दूब पर मोतियों सी चमकने वाली ये ओस की बूँदें आपकी मुस्कुराहट बनकर सदा यूँ ही खिलखिलाती रहे. खिले फूलों की महक सदा आपके जीवन को सुवासित करती रहे. ताजगी का प्रतीक यह हरा रंग आपकी आँखों को सुकून दे और आपके ह्रदय को शीतलता प्रदान करे. प्यार, एकता और सामंजस्य का यह रंग आपके जीवन में सदैव खुशहाली बनाये रखे. प्रकृति की हरियाली आपके जीवन में सदैव बनी रहे. हर पल मीठा हो और मीठी हो हर याद भी. जीवन, आशा, विकास, स्वास्थ्य, समृद्धि, कर्मशीलता, सक्रियता, हास्य और सौभाग्य का प्रतीक यह रंग अपनी सकारात्मक छटा सदा आपके जीवन में बिखेरता रहे.

ख़ुशी में हमारी भी आवाज़ सुनना :

नारंगी रंग, नये सवेरे का रंग. सूरज की किरणें आपके जीवन पथ को रोशन करे. सूर्य के सातों रंग, पंछियों के कलरव, पानी की कल-कल और मुक्त मधुर हवा के संग आपकी उड़ान आपके सभी सपनों को पूरा करे. आज्ञा चक्र का यह रंग जो ज्ञान प्राप्ति का सूचक है, आपके ज्ञान में उत्तरोतर वृद्धि करे. धार्मिकता, दार्शनिकता और साधना का द्योतक व परिपक्वता का प्रतीक यह रंग आपमें नवीनतम व श्रेष्ठतम दृष्टि विकसित करे.

ख़ुदा दिलजलों की नज़र से बचाए :

विशालता का परिचायक, सब कुछ अपने भीतर समाहित करने वाला यह नीला रंग आपके शत्रुओं को भी अपना बना ले. मन को शांत रखने वाला यह रंग आपके प्रति किसी के भी मन में उठने वाले विकारों को पूर्णत: शांत करे. आपके प्रति उनमें स्नेह, शांति, विश्वास, त्याग और समर्पण की भावना में वृद्धि करे. समुद्र और आकाश का यह रंग आपके जीवन में बुद्धि, ज्ञान, साहस, अन्वेषण और रचनात्मकता को समृद्ध करे. अंतर्ज्ञान, प्रेरणा और आध्यामिक विकास में सहयोगी बने. स्वच्छता और निर्मलता का प्रतीक जल का यह रंग आपको गति और जीवनदायिनी शक्तियां प्रदान करे. उदारता, सौन्दर्य, प्रेम, त्याग, कोमलता, अनुराग और चरित्र निर्माण की प्रेरणा देने वाला यह रंग आपको सभी के बीच एक श्रेष्ठ चरित्र के रूप में स्थापित करे.
 
By Monika Jain ‘पंछी’


Wednesday, March 16, 2016

Peace Quotes in Hindi

Peace Quotes in Hindi. Shanti par Vichar, Peaceful Inner Mind Slogans, World Harmony Day Quotations, Still Lines, Mental Sayings, Serenity Sms, Calmness Messages, Nare. शांति पर विचार, अमन नारे.

Peace Quotes

  • धर्म का सीधा सम्बन्ध मन की शांति से है. जहाँ मन की शांति नहीं वहां धर्म नहीं. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • चीजो को नज़रंदाज़ करने की काबिलियत हासिल करना मन की शांति प्राप्त करने का उत्तम तरीका है. ~ अज्ञात / Unknown 
  • हर व्यक्ति को शांति अपने अन्दर ही खोजनी पड़ती है. यह शांति बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होनी चाहिए. अज्ञात / Unknown 
  • यदि आप मानसिक शांति के बदले पूरा साम्राज्य भी पा लें तो भी आप पराजित ही हैं. अज्ञात / Unknown 
  • मन की शांति पाने का सबसे बढ़िया तरीका है - कुछ चीजों को नजरअंदाज करना भी सीखें. ~ अज्ञात / Unknown 
  • लोग जैसे है उन्हें वैसे ही स्वीकार करना विवादों की सम्भावना को कम कर देता है. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • जो दूसरों से ईर्ष्या करते हैं, वे जीवन में शांति नहीं पा सकते. ~ अज्ञात / Unknown 
  • इच्छाओं से मुक्ति आंतरिक शांति का मार्ग प्रशस्त करती है. ~ अज्ञात / Unknown

How are these quotes about peace? 
 
 

Sunday, March 13, 2016

Poem on Colours in Hindi

Poem on Colours in Hindi. Colors Poetry, Rango par Kavita, Rang Shayari, Coloring, Paint Rhymes, Transparent, Color Blindness, Pardarshi Lines, Vairagya. रंगों पर कविता, वैराग्य, रंग शायरी, पारदर्शी.

प्रेम : राग और रंगों से परे
 
उठाये थे मैंने रंग
तब जब प्रेम में थी।
प्रेम को रंग रही थी
या भर रही थी रंगों में प्रेम
इसकी ख़बर न थी।
झोंका था खुद को इस कदर
कि जो सृजित हुआ था
मेरी ज्ञात सीमाओं से परे था।
पर तुम्हारी रंगअन्धता?
वह भी तो थी चरम पर!
नहीं देख पायी वह कोई रंग!
नहीं महसूसा उसने कोई समर्पण!
उसने पहले गढ़े और फिर पढ़े
कोरे स्वार्थ के समीकरण!
कि बहुत रोया था उस दिन प्रेम!
बह गए थे सारे रंग!
पर नहीं ओढ़नी है
इन आँखों को कोई रंगअन्धता!
इन्हें चुनना है रंगों से परे
उस पारदर्शिता को
जिसके लिए नहीं खोना पड़ता है प्रेम!
जो हर रंग को पहचान
हो जाती है उससे एकाकार
फिर भी रहती है पूर्णत: निर्लिप्त!
क्योंकि परे है यह राग और रंगों से!
 
By Monika Jain ‘पंछी’
 
How is this poem about love beyond colours and attachment?

Wednesday, March 9, 2016

Story of Diwali in Hindi

Story of Diwali Festival in Hindi for Kids, Children. Short Deepavali Kahani, Deepawali Ka Tyohar Katha, Festival of Lights Tale, Moral Tales, Stories. दिवाली की कहानी, दीपावली का त्यौहार कथा.
 
रोशनपुर की पहली दिवाली
 
दिवाली के कुछ ही दिन बचे थे. हमारे छोटे से कस्बे में सफाई का काम जोरों पर था. कुछ ही दिनों में बच्चों के स्कूल की भी छुट्टियाँ होने वाली थी. रत्ना जो पड़ोस के घरों में झाड़ू-पोचे करती थी, उसी की मदद से मैं भी दिवाली की सफाई में जुटी हुई थी. बच्चों में हमेशा की तरह खासा उत्साह था दिवाली को लेकर. कभी दिवाली पर बनने वाली मिठाईयों की प्लानिंग होती, तो कभी घर के भीतरी और बाहरी डेकोरेशन की, तो कभी इस बार कौन-कौन से और कितने पटाखे छुडायेंगे इसकी.

रत्ना आज अपनी 7-8 साल की बच्ची को भी साथ लेकर आई थी, पर उसने उसे सफाई वाले कमरे में आने से मना कर दिया और बाहर बरामदे में ही बैठकर खेलने के लिए कहा. बच्ची बाहर ही खेलने लगी. मैंने रत्ना से पूछा, ‘अंदर क्यों नहीं आने दिया?’ तो उसने कहा, ‘दीदीजी, उसे दमा है. धूल-मिट्टी उड़ती है तो बहुत खाँसी चलने लगती है. उसे साथ लेकर भी ना आ रही थी पर वह जिद करने लगी तो लाना पड़ा.’
 
रत्ना के यह कहते-कहते ही उसकी बेटी खेलते-खेलते अचानक सफाई वाले कमरे में आ गयी और उसे खांसी चलने लगी. रत्ना को आश्वस्त कर मैं उसे अपने साथ ऊपर वाले कमरे में ले आई. उसे बिस्तर पर बैठाया, पानी पिलाया और फिर उससे बातें करने लगी. तभी मेरे बच्चे श्रुति और श्रेय भी दौड़े-दौड़े वहां आ गए.
 
श्रुति ने रत्ना की बेटी से पूछा, ‘क्या नाम है तुम्हारा?’

‘कोमल’, वह धीरे से बोली.

थी भी वह एकदम प्यारी और कोमल सी. मैं उसका ध्यान रखने की हिदायत देकर उसे बच्चों के साथ छोड़कर नीचे आ गयी और सफाई का काम देखने लगी.

जब कमरे की सफाई पूरी हो गयी तो रत्ना ने कोमल को आवाज़ लगाई. आज रसोई में भुट्टे सिक रहे थे. मैंने रत्ना को भी कुछ भुट्टे खाने को दिये. उसे अभी और भी घरों में सफाई के लिए जाना था सो मैंने कहा, ‘यही बैठकर खा लो दोनों. फिर तो ठंडे हो जायेंगे.’

रत्ना और कोमल दोनों बरामदे में दीवार के सहारे बैठ गए और भुट्टे खाने लगे. तभी कोमल ने रत्ना से पूछा, ‘माँ, दिवाली के लिए सब इतनी साफ-सफाई क्यों करवाते हैं? कित्ती खांसी चलती है मुझे.’

रत्ना ने उसे इशारे से चुपचाप भुट्टे खाने को कहा.

मैंने रत्ना से कहा, ‘अरे! इसे चुप क्यों करवा रही हो. ऐसे बच्चों के सवालों को टाला नहीं करते.’ ‘कोमल बेटा, क्या पूछना है तुम्हें मुझसे पूछो.’ मैंने कोमल के पास जाकर कहा.

कोमल संकोचवश चुप रही तो मैंने ही उसे बताना शुरू किया, ‘बेटा, सफाई करना बहुत जरुरी है. सफाई रहेगी तो हम कई बीमारियों से बचकर रहेंगे. बल्कि साफ़-सफाई होने के बाद तुझे भी बहुत अच्छा महसूस होगा. हाँ बस जब सफाई हो रही हो और कहीं धूल मिट्टी उड़ रही हो तो तुझे वहां से दूर रहना है. पर सफाई हो जाने के बाद फिर तुझे खांसी नहीं चलेगी, और फिर दिवाली की रात लक्ष्मी माता भी तो हमारे घरों में आती है, तो उनके स्वागत के लिए भी सफाई तो करनी पड़ेगी न.’

कोमल कुछ सोचते हुए बोली, ‘लेकिन आंटीजी, मुझे तो दिवाली वाले दिन भी बहुत ज्यादा खांसी चलती है. माँ मुझे घर से बाहर भी नहीं निकलने देती. मेरा कित्ता मन होता है कि मैं भी नयी-नयी ड्रेस पहनकर सबकी तरह माँ और बापू के साथ रौशनी देखने जाऊं. पर माँ और बापू नहीं ले जाते. कहते हैं डॉक्टर ने मना किया है. मुझे ज्यादा मिठाई भी खाने को नहीं मिलती. मुझसे सांस भी नहीं ली जाती है और खांसी चलती रहती है तो मैं फिर जिद भी नहीं कर पाती, और अगले दिन तो पूरी सड़क पर जले हुए पटाखे ही पटाखे दिखते हैं. कित्ती गन्दी लगती है सड़क. क्या लक्ष्मी माता को भी पटाखे अच्छे लगते हैं? क्या जो पटाखे जलाते हैं वे उन्हीं के घर आती हैं?’

कोमल के मासूम मन ने अपनी सारी जिज्ञासा और शिकायत तो प्रकट कर दी, पर मेरे पास इन बातों का कोई जवाब नहीं था.

रत्ना बोली, ‘ये नासमझ है दीदीजी. अब इसकी किस्मत ही खोटी है तो कोई क्या करे? पटाखे तो सब हमेशा से ही जला रहे हैं. अब एक इसके लिए तो बंद होने से रहे. बस हर दिवाली इसी बात से आँखें भर आती है कि जब सारी दुनिया खुशियाँ मना रही होती है तो मेरी बेटी बिस्तर में पड़े-पड़े खांसती रहती है. जब से थोड़ी समझ आई है इसे तब से एक दिवाली भी नहीं देखी इसने. डॉक्टर ने ज्यादा मिठाई और तली-फली चीजों के लिए भी मना किया है सो वह भी नहीं दे सकती.’ यह कहकर रत्ना तो चली गयी. लेकिन मैं काफी देर तक स्तब्ध सी वहीँ खड़ी रही.

फिर अंदर आकर शाम का डिनर तैयार करने लगी. इसी बीच श्रुति और श्रेय के पापा विकास ऑफिस से घर आ गए. थोड़ी देर में बच्चे और विकास सभी डिनर टेबल पर आ गए. बच्चे अपने पापा को दिनभर की बातें बताने लगे. तभी विकास ने हँसते हुए पूछा, ‘अच्छा, इस बार तुमने अभी तक अपने पटाखों की लिस्ट नहीं पकड़ाई मुझे. लगता है बहुत बड़ी लिस्ट बन रही है इस बार.’ पटाखों का नाम सुनते ही एक बार फिर कोमल का चेहरा सामने आ गया. मैं कुछ कहने ही जा रही थी, तभी श्रेय बोला, ‘नहीं पापा, इस बार हम पटाखे नहीं जलाएंगे.’ ‘हाँ पापा, इस बार हम बिल्कुल पटाखे नहीं जलाएंगे. श्रुति ने श्रेय की बात दोहराते हुए कहा. मैं आश्चर्य से दोनों को देखने लगी और सोचने लगी, ‘क्या ये दोनों वही श्रुति और श्रेय हैं जिनके पटाखों की लिस्ट दिवाली के महीने भर पहले से ही तैयार होने लगती है.’ विकास भी बड़े अचरज से दोनों को देखने लगे. तब श्रुति ने कहा, ‘मम्मा, आज हमने कोमल की सारी बातें सुनी थी. कितनी प्यारी है वह. और हम सब लोगों की वजह से वह अपनी दिवाली भी नहीं मना पाती. हमने तो यह भी तय किया है कि स्कूल में हम सब बच्चों से रिक्वेस्ट करेंगे कि इस बार वे दिवाली पर पटाखे न जलाये.’

‘बहुत अच्छा किया तुमने बच्चों. बल्कि कोमल ही क्या, पटाखों से तो सभी को परेशानी होती है. पेड़-पौधों, पशु-पक्षी, पर्यावरण, वृद्ध जनों, नवजात बच्चों के साथ-साथ हम सब के लिए पटाखों का विषैला धुआँ और तेज आवाज़ बहुत हानिकारक है. इसलिए तो हर बार मैं तुम्हें कम से कम पटाखे जलाने को कहती हूँ. यूँ तो तुम कभी नहीं सुनते. पर इस बार तो कोमल ने कमाल कर दिया.’ मैंने सबको खाना परोसते हुए कहा.

विकास ने मेरी तरफ देखते हुए विस्मय से पूछा, ‘रश्मि! कोमल और कमाल ये सब क्या है?’ तब मैंने उन्हें सारी बात बताई. हम दोनों को ही बच्चों के इस निर्णय पर बहुत ख़ुशी और गर्व महसूस हो रहा था.

हमारे कस्बे का बस वह एक ही हाई स्कूल था, जहाँ पूरे कस्बे के बच्चे पढ़ने आते थे. प्रार्थना सभा में श्रुति और श्रेय ने सभी को कोमल के बारे में बताया और सभी से रिक्वेस्ट की कि क्या इस बार हम पटाखे न जलाकर दिवाली पर हमारे कस्बे के गरीब लोगो की बस्ती में मिठाई, दीपक, कपड़े आदि बांटने चल सकते हैं ? ताकि कोमल जैसे गरीब परिवार के बच्चे, बीमार और वृद्ध जन सभी मजे से दिवाली मना सके. और फिर दिवाली पर चहकने का हक़ तो पेड़-पौधों और पशु-पक्षियों का भी बनता है, तो क्यों न इस बार की दिवाली हम सबके लिए ख़ुशनुमा बना दें.’

बच्चों की बात सुनकर सारा स्कूल प्रांगण तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा. सभी शिक्षकों ने उनके इस सराहनीय कदम की भरपूर तारीफ की और सभी ने इस अच्छे कार्य में अपना पूरा-पूरा सहयोग देने का वादा किया.

बच्चों ने अलग-अलग टोलियाँ बनाकर अपने-अपने मोहल्ले से चंदा इकट्ठा किया और दिवाली की सुबह गरीबों की बस्ती में सभी को फल, मिठाइयाँ, कपड़े और दीपक वितरित करने चल पड़े. बच्चों के इस प्रयास की कुछ ऐसी लहर दौड़ी कि इस बार हमारे कस्बे में एक भी पटाखा नहीं छोड़ा गया.

कोमल शाम को अपनी माँ के साथ हम सबको दिवाली की शुभकामनाएँ देने आई. उसके चमक धमक वाले कपड़े और उसकी खिलखिलाती मुस्कुराहट देखकर ऐसा लगा जैसे उसकी तरह हम सबने भी दिवाली पहली बार ही मनाई है.
 
By Monika Jain ‘पंछी’
 
 
How is this story about diwali?
 


Salvation Quotes in Hindi

Salvation Quotes in Hindi. Mukti par Vichar, Nirvana Suvichar, Freedom Quotations, Liberation Sms, Moksha Messages, Release Sayings, Independence Slogans, Emancipation. मोक्ष मुक्ति पर विचार, निर्वाण.
 
Salvation Quotes

  • एक तरफ सारे संसार के मोह, माया, आकर्षण और छद्म सफलता की दौड़ और दूसरी तरफ सत्य का साक्षात्कार और उसी के अनुपात में मौन और अदृश्यता का जीवन में प्रवेश, जहाँ 'मैं' को पूरी तरह मिटना होता है. उस 'मैं' को जो वास्तव में भ्रम के सिवा और कुछ है भी नहीं. तात्कालिक परिणामों और प्रभावों के चलते पहला पलड़ा सामान्यतया भारी पड़ता है. इसलिए किसी महावीर या बुद्ध का होना एक अति असामान्य घटना है. हम तो प्रकृति के सामान्य नियमों को भी भुला बैठे और इंसान तक न रहे. फिर ईश्वरत्व तो प्रकृति के सामान्य नियमों से भी पार बहुत दूर की कोड़ी है. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • कुछ महापुरुषों को पढ़ना मन-मस्तिष्क में घटित होने वाली एक क्रांति के दौर से गुजरना है. जहाँ सब कुछ ध्वस्त होने लगता है. ऐसे तर्क जो हमारे सारे तर्कों को अतार्किक सिद्ध कर देते हैं. आदर्श के ऐसे स्तर जो हमारी सारी अच्छाईयों को बौना साबित कर देते हैं. ऐसी परिभाषाएं जो शब्दों के मायने ही बदल देती है. ऐसा ज्ञान जिसके सामने विकास की गाथा कहता सारा विज्ञान फेल नजर आता है. तब बरबस हंसी छूट पड़ती है हम लोगों की उन सब लड़ाईयों पर जिनमें एक आस्तिक, नास्तिक की फिक्र में मरा जा रहा है और एक नास्तिक, आस्तिक की. एक हिन्दू, मुसलमान को समझाने के पीछे पड़ा है और एक मुस्लिम, हिन्दू को. दुनिया का लगभग हर इंसान खुद को छोड़कर बाकी सबकी फिक्र में लगा है. जबकि जिन्हें अपनी फिक्र करना आ गया था वे तो सारे वाद, विभाजन और श्रेणियों से ही ऊपर उठ गए. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • कभी-कभी अवसाद से लड़ने के लिए कितने जतन करने होते हैं. कविता, कहानियाँ, जोक्स, तारीफ, गीत-संगीत, नृत्य, चित्रकारी, दोस्त, बच्चे, प्रकृति...हर पल ख़ुश रहने के बहाने ढूंढने पड़ते हैं. कभी-कभी सब फैल हो जाता है. ये निर्भरता बड़ी बुरी चीज है. मुक्ति और मोक्ष की बातें बेमानी नहीं है. सदियों से जिस पागलपंती को हम दोहराते आ रहे हैं, उस पर कभी तो विराम लगे. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • ओत्तेरी...तीर्थंकर महावीर की फ्रेंड रिक्वेस्ट आई है. एक फेसबुक ही है जहाँ आमिर खान, ऋतिक रोशन, माधुरी दीक्षित, मधुबाला, महात्मा गाँधी, भगत सिंह से लेकर खुद साक्षात् भगवान भी फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज देते हैं. वैसे ईश्वर/ब्रह्माण्ड/प्रकृति अपवाद हैं. वे तो हमेशा हमारे दोस्त होते ही हैं. उनकी कॉपी कोई कर सकता है भला. वैसे मैं तो बहुत बड़ी वाली इम्प्रेस्ड हूँ भगवान महावीर से. अभी-अभी 'महावीर या महाविनाश' बुक ही आर्डर करने जा रही थी. कुछ दिन पहले सिर्फ उन्होंने ही बचाया था एक बहुत बड़े और गहरे तनाव से. और तब यह अच्छी तरह समझ आया कि प्रेम, मित्रता और करुणा क्या होती है. सुख-दुःख, सफलता-असफलता, अकेलापन-साथ, गरीबी-अमीरी, दिन-रात जीवन के इन सभी द्वंदों में अक्सर लोगों को बदलते देखा है. उन्हें भी जिनके जीवन में ये पड़ाव आते हैं और उन्हें भी जो सामने खड़े इन पड़ावों के साक्षी होते हैं. और जो नहीं बदलते उनका जीवन उस वृक्ष की तरह हो जाता है जिसकी छाया में मुसाफिर जब मर्जी हो आते हैं, ठहरते हैं, फल खाते हैं और चले जाते हैं, पर उन्हें शिकायत करने का भी अधिकार नहीं होता. पर शिकायत करने वाली चीज है भी कहाँ? क्योंकि जिस दिन जगत के इन द्वंदों को पूरी तरह जीत लिया उस दिन तो उस वृक्ष को भी महावीर हो जाना है और महाविनाश से बेहतर है महावीर हो जाना. ~ Monika Jain ‘पंछी’
 
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Tuesday, March 8, 2016

Women Empowerment Essay in Hindi

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बस इतनी सी आज़ादी...दोगे?

उपरोक्त फेसबुक पोस्ट पर आये कुछ सवालों के जवाब :
 
जिन्होंने यह कहा कि आज़ादी मांगी नहीं जा सकती, वह लेनी/छीननी पड़ती है...या जिन्होंने यह कहा कि आज़ादी भीतर होती है.
  • बेशक! वास्तविक और पूर्ण आज़ादी भीतर ही है...बाहर कहीं भी नहीं. और इस पूर्णता या आज़ादी के लिए स्त्री और पुरुष क्या...हर एक भेद से ऊपर उठना होता है...और वह प्रकृति के विरुद्ध जाना नहीं, अपनी वास्तविक प्रकृति पाना ही है. लेकिन उस पूर्णता को प्राप्त करने से बहुत पहले और उस पूर्णता को प्राप्त करने के लिए भी भीतर के साथ-साथ बाहर एक अनुकूल माहौल की जरुरत होती है. उस अनुकूल माहौल को माँगना बस सहयोग माँगना है. हम सब आपस में इतने सम्बंधित हैं कि यह अनुकूल माहौल छीना नहीं जा सकता...सहयोग से ही बनाया जा सकता है.
 
जिन्होंने यह कहा कि यह भूलना भी क्यों चाहिए कि तुम स्त्री हो...या जिन्होंने यह कहा कि आप पुरुष बनना चाहती हैं.
  • सबसे पहले तो यह कि हर पुरुष में एक स्त्री और हर स्त्री में एक पुरुष पहले से ही विद्यमान है. यही वजह है कि पूर्णता भीतर की चीज है बाहर की नहीं. पर उस पूर्णता से पहले जब मैं यह कहती हूँ कि मैं हमेशा यह याद नहीं रखना चाहती कि मैं स्त्री हूँ तो मैं प्रकृति द्वारा एक स्त्री को प्रदत्त भिन्नताओं को नकारने की बात नहीं कह रही. एक पुरुष और स्त्री के स्वाभाविक आकर्षण को नकारने की बात भी नहीं कह रही. कुछ मर्यादाएं और शालीनताएँ जो समय के अनुरूप एक सुव्यवस्था के लिए जरुरी है (दोनों ओर से) उन्हें भुलाने की बात भी नहीं कह रही. मैं बस उन जबरन बनायी सीमाओं की बात कह रही हूँ जो एक स्त्री में सिर्फ स्त्री होने की वजह से भय उत्पन्न करती है. जहाँ वह चलते समय, कुछ बोलते समय, किसी शुरुआत से पहले, किसी निर्णय से पहले...या कई सारे मुद्दों पर सिर्फ इसलिए रुक जाती है या डर जाती है कि वह तो स्त्री है. उसे डर है कि प्रेम में उसने पहल की तो वह चरित्रहीन सिद्ध हो जायेगी. उसे डर है कि वह अकेले या असमय बाहर निकली तो कोई इज्जत नाम की चीज लुट सकती है. और भी ढेर सारी बातें. 
  • याद करती हूँ उन दिनों को जब बहुत ज्यादा अंतर्मुखी और निर्दोष होने की वजह से दुनिया से बेखबर थी. घर से दूर भी रात के 9-10 बजे जरुरी काम होने पर अकेले बाहर निकल जाती थी. रात के 3-4 बजे तक अकेले छत पर बेख़ौफ़ पढ़ती रहती थी. कुछ महीनों तक रात 7-9 बजे की एक ऐसी क्लास में थी जहाँ पर मैं अकेली लड़की और बाकी सारे लड़के थे...पर मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि मुझे पढ़ना था. एग्जाम टाइम में प्रैक्टिकल सब्जेक्ट्स समझाने के लिए पूरी रात लड़कों के साथ बैठकर पढ़ाया है. बस इतना चाहती हूँ कि आज भी और आगे भी वैसी ही रह सकूँ. मैंने यह तो कहा ही नहीं कि सब पुरुष एक से हैं...न ही यह कहा कि लड़कियों को कुछ समझने और बदलने की जरुरत नहीं. मैंने सिर्फ सहयोग की बात की है जो लड़के और लड़कियों सभी की ओर से अपेक्षित है.
 
जिन्होंने ममता, करुणा, क्षमा, सहनशीलता आदि स्त्री गुणों की बात की.
  • अपनी कई कमियों को स्वीकारते हुए इन गुणों की पूरजोर समर्थक हूँ. यहाँ सड़क पर दौड़ते पिल्लों के लिए भी ममता उमड़ पड़ती है. मौसी और बुआ कहने वाले बच्चे अचानक से मम्मा भी कह चुके हैं. बच्चों को हाथों से खाना खिलाना, उनके साथ खेलना, उन्हें कहानियां सुनाना, उनका ख़याल रखना सब बहुत पसंद है. करुणा के आड़े पशु जगत, मानव जगत, धर्म, जाति, लिंग ये सब सीमायें नहीं आती. लेकिन ये ऐसे गुण हैं जो सिर्फ स्त्री के लिए नहीं सबके लिए हैं. इन्हें सिर्फ स्त्री से बांधकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता. जब मैं कहती हूँ कि मैं हमेशा याद नहीं रखना चाहती कि मैं स्त्री हूँ तो समझिये कि मैं सबमें इन्हीं गुणों के विकास की बात कहती हूँ.

By Monika Jain ‘पंछी’
 
 

Spiritual Quotes in Hindi

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Spiritual Quotes

  • हर व्यक्ति विरोधाभासी विचारों और शब्दों का पुतला है. कोई ज्यादा, कोई कम. हमारी दृष्टि जब तक 'पर' पर रहेगी विरोधाभास रहेंगे, और जितनी ज्यादा रहेगी उतने ही रहेंगे. ऐसे में विरोधाभास नजर तो आयेंगे पर सिर्फ 'पर' के ही 'स्व' के नहीं. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • आध्यात्म की सफलता इसमें भी होगी, अगर यह अपने नाम पर होने वाले क्रूर से क्रूरतम व्यंग्यों और तमाशों को पढ़ते, देखते और सुनते हुए भी विचलित न हो. क्योंकि आध्यात्म ही सिखाता है : आत्मवत् सर्वभूतेषु...तो महावीर, बुद्ध, कबीर, विवेकानंद, ओशो आदि सभी विचारकों की मान्यताओं को पागलपन और मानसिक बीमारी करार देने वाले नास्तिक बुद्धिजीवियों! और अर्थ का अनर्थ कर देने वाले तथाकथित आस्तिक भक्तों! हमें आप दोनों से प्यार है. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • कल एक दोस्त ने मेरी आध्यात्म से संदर्भित पोस्ट्स के लिए कहा, 'अगर मुझे पहले पता होता कि आगे जाकर तुम इतनी खतरनाक वाली पोस्ट्स करने लगोगी तो मैं तुम्हें फ्रेंड रिक्वेस्ट ही नहीं भेजता.’ वैसे मुझे भी कहाँ पता था. :) ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • सब कुछ चमत्कार है और कुछ भी चमत्कार नहीं. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • छोटी-छोटी आध्यात्मिक अनुभूतियाँ यह अहसास करवाने के लिए पर्याप्त हैं कि अगर कोई रास्ता पूर्णता और स्थायी आनंद की ओर जाता है तो वह आध्यात्म ही है. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • साथी ऐसा हो जो आत्मिक उत्थान में सहायक बनें, वह नहीं जो पतन के गर्त में ले जाए. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • कितनी अजीब बात है न...ज्यादातर मनुष्य सबसे ज्यादा बोर खुद के साथ ही महसूस करते हैं. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • मनुष्य कितने बड़े भ्रम में जीता है इसका पता उसे उसी दिन से लगना शुरू हो जाता है जब वह अपने मन, विचारों और कार्यों पर एक सजग और निष्पक्ष दृष्टि रखने लगता है. अक्सर व्यक्ति प्रवाह में बह जाते हैं. भीड़ और भेड़ चाल ही उनकी पसंद और नापसंदगी तय करने लगती है. मनोरंजन. ख़ुशी, सफलता, समर्थन, विरोध, नैतिकता और अनैतिकता के मापदंड भी यहीं से तय होने लगते हैं. विरले ही होते हैं जो हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींच लेने वाली भीड़ के शोर में अपने अंतर्मन की आवाज़ सुन पाते हैं. बाकी सब सिर्फ दुनियादारी में मुखौटें बदलते रह जाते हैं. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • दुनिया-जहाँ की घटनाएँ देखते-सुनते मन अक्सर सवाल करता है...आखिर इंसान पहुँचना कहाँ चाहता है? ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • कुछ दिन पहले कहीं पढ़ा था 'जो भी इच्छाएं और वासनाएं बाकी रह गयी है उन्हें इसी जन्म में पूरा कर लो क्योंकि दमित इच्छाएं आध्यात्म के मार्ग में बाधा बनती है.' इसे पढ़ने के बाद एक मुस्कान आई चेहरे पर और पहला प्रश्न मन में आया : क्या इच्छाएं कभी पूरी हुई हैं? आध्यात्म का मार्ग इच्छाओं को पूरा करने से या दमन से शुरू नहीं होता. आध्यात्म का मार्ग शुरू होता है इच्छाओं से ऊपर उठते जाने से. जहाँ न उनके दमन की आवश्यकता है और न ही उन्हें पूरा करने की. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • एक अध्ययन ऐसा भी है...जो शब्दकोष नहीं बढ़ाता...वहां तो शब्द गुम होने लगते हैं. ~ Monika Jain ‘पंछी’
 
How are these spiritual quotes?
 
 

Monday, March 7, 2016

Essay on Indian Culture and Tradition in Hindi

Essay on Indian Culture and Tradition in Hindi. Customs of India Article, Parampara Speech, Festivals Paragraph, Sanskriti, Dogma, Heritage, Pratha Lekh. भारतीय परम्परा और संस्कृति पर निबंध, कुप्रथा.
 
परंपरा कहीं प्रदूषण न बन जाए

पर्व, संस्कृति, परंपरा, प्रकृति के साथ इनके जुड़े होने सम्बंधित भावुक कर देने वाली बातें बहुत पढ़ीं. इनका मजाक उड़ाने वाली, विरोध करने वाली, तर्क की कसौटी पर कसी पोस्ट्स भी बहुत पढ़ीं. दोनों काफी कुछ अपनी-अपनी जगह सही हैं. मैं जन्म से जिस धर्म और परिवार से जुड़ी हूँ और जो स्वभाव और परिस्थितियां पायी हैं उसमें परम्पराओं, रीति-रिवाजों, कर्म-कांडों से बहुत ज्यादा पाला पड़ता नहीं...और खुद का आकर्षण नहीं इसलिए जहाँ तक संभव हो पाला पड़ने भी नहीं देती. पर अगर बात प्रकृति से जुड़ाव, स्नेह, संवेदनशीलता की आये तो हर रोज पर्व और उत्सव मनाने वाले कई लोगों से बहुत बेहतर स्थिति है. कोई अपनी परम्पराएं संजोकर रखना चाहता है, कोई छुटकारा चाहता है, जो जैसा भी चाहता है वैसा करे. लेकिन हम जो भी जीवन पद्दतियां अपनाते हैं उनमें धीरे-धीरे पसर आने वाले आतंकवाद, शोषण, अन्याय, असंवेदनशीलता, दिखावे, हिंसा और पाखण्ड को नजरंदाज करते रहें यह भी तो सही बात नहीं. यह ऐसा युग है जहाँ पर अहिंसा के नाम पर भी भयंकर हिंसा हो जाती है. जहाँ धर्म के नाम पर कितना अधर्म हो रहा होता है इसका अहसास तक नहीं होता. ऐसे में आँखों और मन को क्षण भर के लिए लुभाने वाली चीजों के पीछे कौन-कौन से आधार खोखले हो रहे हैं, इस पर ध्यान दिया जाना भी जरुरी है. पर्वों पर रात दिन छूटने वाले पटाखें, लाउडस्पीकर वाले रात्रि जागरण, सुबह असमय नींद उड़ा देने वाली आरती और भजनों की तेज आवाजें क्या यही प्रकृति और इसके प्राणियों से प्रेम है? कम से कम रातों को शांति के और सुबहों को तो पंछियों की सुरीली आवाजों के नाम कर दिया होता.
 
हमें यह समझना होगा कि आज आस्था, धर्म, ईश्वर और परम्पराओं से कई ज्यादा जरुरत दुनिया को संवेदनशीलता और अच्छाई की है. संवेदनशीलता प्रकृति और इसके समस्त प्राणियों के प्रति. अगर परम्पराएँ प्रकृति से जोड़ने में सफल हो पाती, तो आज प्रकृति और पर्यावरण की ये हालत न होती. तथाकथित परम्पराओं को निभाते तो मैंने उन्हें भी देखा है, जो झरनों, झीलों, नदियों में शराब छलकाते हुए, फूहड़ गानों पर घंटों डांस करते हैं. परम्पराएँ निभाते उन्हें भी देखा है, जो तोते, चिड़ियाँ जैसे कई पशु-पक्षियों को पिंजरों में कैदकर गर्व से फूलें नहीं समाते. परम्पराएँ निभाते उन्हें भी देखा है, जिनके लिए पत्नी सिर्फ घर में काम करने वाली और उनके विषय भोगों को पूरा करने वाली मशीन से ज्यादा कुछ भी नहीं. परम्पराओं के नाम पर होने वाली हत्याएँ देखी हैं, परम्पराओं के नाम पर होने वाला शारीरिक और मानसिक शोषण भी. और भी सेकड़ों उदाहरण...जरुरत क्या है चीजों को यूँ गोलमोल घुमाकर, उन्हें सही सिद्ध करने की. क्या सीधी-सरल बातें समझ नहीं आती? या बस दिखावा करते-करते एक दिन सबको ले डूबना ही हमारी एकमात्र इच्छा और नियति है. बल्कि आजकल तो परंपरा और आधुनिकता दोनों का वह कॉकटेल दिखाई पड़ता है जिसने चमक और धमक की अति के पीछे अपने सारे आधारों को खोखला कर देने की ठानी है.
 
मैं धर्म और परम्पराओं की विरोधी नहीं लेकिन जब परम्पराएँ, प्रतीक, रिवाज और कर्म-कांड अपना महत्व खोने लगे और शोषण और व्यापार ही उनका उद्देश्य मात्र रह जाए तो उन्हें भुला देने में ही भलाई है. कहीं किसी की मृत्यु होती है और सुर में सुर मिलाकर महिलाएं पल्ला प्रथा के नाम पर रोने का अभिनय करती हैं. अभिनय के समाप्त होने पर यही महिलाएं मृत्यु वाले पूरे परिवार का इतिहास, भूगोल सब बांचने लगती है. बेटी ने किसी और जाति में विवाह किया है, इसलिए उसके रहते हम यहाँ नहीं रह सकते. पति ने ये किया, पुत्र ऐसा है, फलां, ढीमका और भी न जाने क्या-क्या. परिवार, समाज, देश और दुनिया सभी को संवेदनशीलता और प्रेम की जरुरत है. इन बेवजह की नौटंकियों की नहीं. कुछ दिन पहले सुना था दक्षिण तमिलनाडु के विरुद्धनगर में 'तलईकुथल' नाम की एक परम्परा है. जिसके अनुसार बुजुर्गों को नारियल पानी पिला कर फिर किसी ठंडे तेल से मालिश करके तब तक ठंडे पानी से नहलाया जाता है जब तक उनकी मृत्यु नहीं हो जाती. इस परंपरा के चलते अपने दादा-दादी, माता-पिता, पति-पत्नी किसी की भी हत्या कर दी जाती है और कोई पछतावा भी नहीं. क्या खाकर पैदा होते हैं ऐसे लोग? उन्हें इंसान तो नहीं कह सकते पर 'जानवर' वो भी कैसे कहें? लोग अपने स्वार्थ के लिए कोई भी परंपरा बना लेते हैं. अपने ही मतलब के लिए उसे जब चाहे तोड़ मरोड़ लेते हैं और अपने ही मतलब के लिए इन परम्पराओं की दुहाई देते नहीं थकते. थू है ऐसी परम्पराओं पर, इन्हें बनाने वालों पर और इनका पालन करने वालों पर.
 
परम्पराओं, प्रतीकों, कर्मकांडों और संस्कृति के नाम पर छल की संभावनाएं बहुत ज्यादा बढ़ गयी है. हमें समय को देखकर चलना होगा और आज की आवश्यकताओं को समझना होगा. सालों पहले जो चीजें प्रासंगिक थी, आज भी हो जरुरी नहीं. समस्यायों के घुमा-फिरा कर नहीं, सीधे समाधान ढूंढने होंगे. मंदिर, मस्जिद, सिन्दूर, मंगलसूत्र, पूजा-पाठ, आरती, ज्योतिष, वास्तु इनके पीछे चाहे जितने वैज्ञानिक कारण गिनाये जाए पर क्या ये चीजें आज की समस्यायों का समाधान करने में सक्षम है? सारी समस्याएं हमारे भीतर की उपज है. तो समाधान भी वैसे ही ढूंढने होंगे जो सीधे दिल और दिमाग पर असर करे. इधर-उधर भटकाने वाले समाधान नयी समस्याएं पैदा करेंगे और कुछ नहीं.
 
सारी अमूर्त चीजों को मूर्त रूप में बदल देने वाली परम्पराएँ और व्यवस्थाएं कितना भला कर पायी है, वर्तमान के सन्दर्भ में इसकी समीक्षा बेहद जरुरी है. कहीं ऐसा ना हो कि हम खोखली परम्पराओं पर गर्व करते रह जाएँ और वह जमीं जिस पर इन्हें आरोपित किया गया था उसका पूरा सफाया ही हो जाए. सत्य के प्रतीक बचे रहे और सत्य पूरी तरह मिट जाए. प्रेम और साहस के प्रतीक बचे रहे पर प्रेम और साहस कहीं नजर ही ना आये, ऐसा तो नहीं होना चाहिए न?

 
By Monika Jain ‘पंछी’

How this essay about unnecessary traditions of our culture? 

Sunday, March 6, 2016

Tradition Quotes in Hindi

Tradition Quotes in Hindi. Parampara par Vichar, Traditional Day, Indian Culture Sayings, Convention, Practice, Custom, Dogma, Heritage. प्रथा, रिवाज, परिपाटी, रूढ़ी, लीक, परंपरागत, परंपरा पर विचार.
 
Tradition Quotes

  • प्रेम? नहीं शायद अहंकार और स्वार्थ अँधा होता है...फिर चाहे वह अपनी परम्पराओं, संस्कृति, रीति-रिवाजों और कर्म कांडों से हो या तथाकथित स्वछन्द फूहड़ आधुनिकता से. क्योंकि यह इनके नाम पर घुस आने वाली विकृति, आतंकवाद, हिंसा, शोषण, अराजकता, अन्याय और असंवेदनशीलता को देख नहीं पाता. और फिर आजकल तो परंपरा और आधुनिकता दोनों का वह कॉकटेल दिखाई पड़ता है जिसने चमक और धमक की अति के पीछे अपने सारे आधारों को खोखला कर देने की ठानी है. पर इस अहंकार और स्वार्थ के वशीभूत लोगों को भला वह खोखलापन नजर क्यों कर आने लगा? ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • मेरी बातों से बहुत से लोग ये आशय लगा लेते हैं कि मैं नास्तिक हूँ और धर्म तथा परम्पराओं की विरोधी हूँ...पर न तो मैं नास्तिक हूँ और न ही धर्म तथा परम्पराओं की विरोधी हूँ. हाँ बस मैं अन्धविश्वासी नहीं हूँ और आडम्बरों और अंधविश्वासों से मुक्त समाज चाहती हूँ. ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं यह बात मुझे परेशान नहीं करती, पर ईश्वर के नाम को कलंकित होते देखना...यह मुझसे नहीं होता. धर्म की आड़ में हो रहे अपराध मुझे दूसरे अपराधों से ज्यादा घृणित लगते हैं. देखा है मैंने...कैसे आडम्बरों के चलते गरीब लोग जिन्हें दो वक्त का खाना भी नसीब नहीं होता अपने खून पसीने की मेहनत से कमाया हुआ धन जादू टोने और टोटकों में खर्च कर आते हैं. कई लोग अंधविश्वासों के चलते अपने जीवन तक से हाथ धो बैठते हैं. धर्म की आड़ में चल रहे अय्याशों के अड्डे सिर्फ एक-दो नहीं...हर धर्म में इनकी भरमार है. सिर्फ और सिर्फ पैसे कमाने के लिए न जाने कितनी धर्म की दुकाने चल रही है. धर्म के इस अपराधीकरण और व्यवसायीकरण को स्वीकार करना मेरे बस में तो नहीं. इसलिए मुझे बहुत ज्यादा जरुरी लगता है कि आज के युग की आवश्कताओं के अनुसार धर्म और परम्पराओं में आमूलचूल परिवर्तन किये जाए. हर युग की अपनी आवश्यकताएं हैं और यह जरुरी नहीं है कि हजारों लाखों वर्षों से जो परम्पराएँ चली आ रही है वे सभी आज के युग में प्रासंगिक हों. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • लोग हमेशा इतिहास के पीछे क्यों पड़े रहते हैं? आप कितनी भी कोशिश कर लें उन घटनाओं की पूरी सच्चाई नहीं जान सकते, जो आपके अस्तित्व से हजारों सालों पहले की है. राम, रावण, दुर्गा, महिषासुर, कृष्ण, दुर्योधन, पांडव किसने क्या किया, कौन सही था, कौन गलत?...कोई था भी या नहीं...क्या अब इन बातों से फर्क पड़ना चाहिए? जो नहीं हैं उनके लिए जो हैं...क्या उनको लड़-कट के मरना चाहिए? तब की परिस्थितियाँ और आज की परिस्थितियाँ क्या बिल्कुल एक सी है? कोई ये क्यों नहीं समझ पाता कि कोई भी व्यक्तित्व सबके लिए, सब परिस्थितयों में पूर्ण रूप से आदर्श नहीं हो सकता. उसकी सभी बातों का समर्थन नहीं किया जा सकता. पर अंधभक्ति तो बड़ी प्यारी है मेरे देश के लोगों को. पूजना इतना जरुरी हो गया है कि उसके लिए तो जिसे पूजा जा रहा है, जिस कारण पूजा जा रहा है, उन्हीं आदर्शों की बलि देने में नहीं हिचकते लोग. जो अदृश्य है उसके लिए जो दिखाई दे रहा है, उसे काट डालने में शर्म नहीं आती किसी को. कभी-कभी लगता है सब कुछ मनोरंजन के लिए करते हैं लोग. लड़ना शायद बेहद पसंद है इसलिए नित नए बहाने ढूंढते हैं लोग. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • हर्षोल्लास और आमोद प्रमोद के लिए पर्वों का मनाया जाना बेशक जरुरी है पर उनके मनाये जाने की सार्थकता तभी है जब उनमें छिपे सन्देश को आंशिक तौर पर ही सही हम अपने जीवन में उतारें. ~ Monika Jain ‘पंछी’
 
How are these quotes about traditions? 
 
 

Saturday, March 5, 2016

Knowledge Quotes in Hindi

Knowledge is Power Quotes in Hindi. Gyan par Vichar, Awareness Quotations, Knowledgeable Sayings, Education Sms, Educational Messages, Knowing Slogans, Shiksha Lines. ज्ञान पर सुविचार, विद्या, शिक्षा.
 
Knowledge Quotes

  • आजकल कई मित्र पूछते हैं, 'इतना ज्ञान कहाँ से लाती हो पंछी!' मूर्खताओं के इतिहास से. :p (सभी वहीँ से लाते हैं, महावीर और बुद्ध भी.) हालाँकि मूर्खताओं से छुटकारा इतना आसान कहाँ? आशा है कभी तो मिलेगा. :) कुछ मित्रों का डर है, मैं सन्यासी न हो जाऊं कहीं. काश! ऐसा भी हो पाए कभी. आपके मुंह में घी-शक्कर (घी-शक्कर की जगह मनपसंद मिठाई मान लेना. :p) वास्तविकता यह है कि जब भी किसी के जीवन में सच्चे अर्थों में सन्यास घटित होता है तो वह परम हर्ष का विषय होता है. डर या चिंता का विषय तो बिल्कुल भी नहीं. बल्कि जब भी किसी में ऐसी संभावना या इच्छा देखें तो उसके लिए दुआ करें. :) आज सुबह-सुबह कुछ याद आया : सम्यक ज्ञान आता है सम्यक दृष्टि से (जो जैसा है उसे वैसा ही देखना, अपनी ओर से बिना कोई सहयोग किये हुए, निष्पक्ष दृष्टिकोण से). इसे ही साक्षी बनना या दृष्टा बनना कहते हैं. जब यही दृष्टि हमारे मन पर होती है तो वह सामायिक बन जाती है. सम्यक दृष्टि से उपजा यह सम्यक ज्ञान ही बनता है सम्यक आचरण...और सम्यक आचरण ही ले जाता है मुक्ति (परम स्वतंत्रता) की ओर. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • हम जब भी किसी को पूजनीय बना देते हैं, या महान घोषित कर देते हैं तो दरअसल हम अपनी विफलताओं को छुपाने का प्रयास करते हैं. महान आत्माएं हमेशा से महान नहीं होती है. बस अपने ज्ञान द्वारा पशु से परमात्मा बनने के क्रमिक विकास में आगे या परम स्तर तक पहुँच जाती है और इस उपलब्धि की सम्भावना दुनिया के हर एक प्राणी में है. दरअसल कोई महान नहीं होता, सिर्फ बुद्धिमान होता है. और चेतना का वह स्तर प्राप्त करना हर प्राणी के बस की ही बात है. बस से बाहर कुछ नहीं. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • यह एक तथ्य है कि हम सामान्यतया जिसके बारे में या जिन बातों के बारे में सबसे ज्यादा सोचते हैं बहुत कुछ वैसे ही होने लगते हैं. संगति के असर की बात इसलिए ही कही जाती है. मंत्रों का निर्माण और उच्चारण भी इसी सोच के साथ शुरू हुआ होगा कि एक अच्छे व्यक्तित्व के अच्छे गुणों के बारे में हम जब चिंतन और मनन करेंगे तो अच्छे भाव और गुण हममें अवतरित होने लगेंगे. अर्थात मुख्य बात भाव की ही थी और उस व्यक्तित्व को धारण करने की ही थी. पर होने क्या लगा? भगवान खुश होकर हमारी अच्छी-बुरी सब इच्छाएं पूरी कर देंगे इस उद्देश्य ने सबके मन में जगह बना ली या फिर 'मुंह में राम बगल में छुरी' वाली बातें सामने आने लगी...और अपनी स्वार्थ सिद्धि और दिखावे का उद्देश्य इतना गहराता चला गया कि उस व्यक्तित्व जिसे ईश्वर या अल्लाह कहा जाता है को बहरा या अँधा समझकर सुबह से लेकर रात तक की नौटंकी सड़कों पर होने लगी. जिसका फायदा तो एक नहीं नजर आता, हाँ नुकसान प्रकृति और जाने किस-किस को उठाना पड़ता है, इसकी कोई गिनती नहीं. धर्म के नाम पर कोई कितना अधर्म कर रहा होता है इसका अहसास भी नहीं होता उसे. इसलिए कहा जाता है, पहले जानना जरुरी है उसके बाद मानना. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • जितना भी अधिक जानो...उतना ही मोह भंग. कर रही है कायनात... साजिश कोई. ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • ज्ञान अगर साथ में अहंकार ला रहा है तो वह अज्ञान की ओर बढ़ाया गया कदम है. पर ज्ञान अगर साथ में विनम्रता ला रहा है तो वह खुद के अभी बहुत अज्ञानी होने का भान है. पहली परिस्थिति में पतन का मार्ग चुना गया है और दूसरी में उत्कर्ष का. ~ Monika Jain ‘पंछी’

How are these quotes about knowledge?