Tuesday, February 21, 2017

Poem on Smile in Hindi

मुस्कुराहट पर कविता, मुस्कान शायरी. Poem on Smile in Hindi. Falling in Love with a Book Writer Poetry, Smiling while Reading Rhymes, Infatuation Lines, Picture.
तुम और मुस्कुराहट

किताब के पन्ने पलटते
तुम्हारे शब्दों को पढ़ते
तुम्हारी भावनाओं को महसूस करते
और तुम्हारी संवेदनाओं को जीते…
एक दिन कब अचानक नज़र
किताब के पीछे बने
तुम्हारे अक्स पर जा टिकी
पता ही न चला।

कि आसान होता है
तस्वीरों को देर तक निहारना।
कि आसान होता है
तस्वीरों को अपना
हाल-ए-दिल सुना देना।
कि आसान होता है
तस्वीरों को चूम लेना भी...
और आसान होता है
उन्हें सीने से लगा लेना।

पर मेरे लिए इनमें से कुछ भी
आसान कहाँ था?
आसान था कुछ तो वो था
बस मुस्कुरा देना
और मुस्कुराते-मुस्कुराते
तुम्हारी किताब के कुछ पन्ने
और पलट देना।

Monika Jain ‘पंछी’
(20/02/2017)

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Saturday, February 18, 2017

Inspirational Story in Hindi

प्रेरणादायक कहानी, प्रेरक प्रसंग, जिम्मेदारी. Inspirational Story in Hindi. Sardar Vallabhbhai Patel Life Incident. Responsibility, Duty, Will Power Tales.
Inspirational Story in Hindi

(1)

फर्ज

वकालत के दौरान सरदार पटेल के पास हत्या का एक बेहद उलझा हुआ केस आया। मुकदमे को अपने हाथ में लेने से पहले सरदार पटेल ने बहुत सोचा और जब उन्हें यह भरोसा हो गया कि आरोपी बेगुनाह है तो उन्होंने मुकदमा अपने हाथ में ले लिया। पैरवी में हुई छोटी सी भूल भी आरोपी को फांसी दिला सकती थी इसलिए उन्होंने आरोपी को बचाने के लिए दिन-रात एक कर दिए।

एक दिन जब इस विषय पर महत्वपूर्ण बहस चल रही थी और फैसला इसी बहस पर टिका था और सरदार पटेल बहस में व्यस्त थे, तभी उनके नाम से एक तार आया। सरदार पटेल ने तार पढ़ा तो उनके चेहरे पर दुःख के भाव साफ-साफ नजर आने लगे। उन्होंने तार को वापस अपनी जेब में रख लिया और फिर बहस करने लगे।

जब मुक़दमे की बहस खत्म हो गयी तो उनके एक साथी ने उनसे उस तार के बारे में पूछा। सरदार पटेल ने बताया कि उनकी पत्नी की मृत्यु हो गयी है और इसी का समाचार उस तार में था। सरदार पटेल का जवाब सुनकर सब हैरान रह गए। उनके करीबी मित्र ने उनसे पूछा, ‘तुमने बहस जारी क्यों रखी?’ सरदार पटेल ने कहा, ‘वह दुनिया छोड़ चुकी थी, मैं अगर बहस छोड़ देता तो एक बेगुनाह को फांसी हो जाती। मुझे बहस जारी रखना ही सही लगा। यही मेरा फर्ज था।’

Source - Unknown

(2)

सच्ची लगन

नॉर्वे में एक रईस रहता था जिसका नाम फलेरा था। उसके यहाँ एंटोनियो नाम का एक नौकर काम करता था। पास ही में एक मूर्तिकार की दूकान थी। एंटोनियो को जब भी खाली समय मिलता वह मूर्तिकार की दूकान के पास खड़ा होकर मूर्तियाँ बनते हुए देखता था। उसे मूर्तियों की काफी कुछ समझ आ गयी थी और वह कभी-कभी वहां कार्य कर रहे कारीगरों की मदद भी कर देता था।

एक दिन दुकानदार ने कहा, ‘यहाँ आकर तुम अपना समय क्यों नष्ट करते हो?’ एंटोनियों बोला, ‘मुझे यहाँ आकर मूर्तियाँ बनते देखना अच्छा लगता है।’ इस तरह उसका आना निरंतर जारी रहा।

एक बार मालिक फलेरा के यहाँ दावत थी। भोजन स्थल की सजावट का कार्य मुख्य बैरे को सौंपा गया था लेकिन उससे सजावट का कार्य सही ढंग से नहीं हो पा रहा था। वह परेशान हो गया। उसे परेशान देखकर एंटोनियो ने कहा, ‘अगर तुम चाहो तो मै तुम्हारी मदद कर सकता हूँ।’ बैरे ने हामी भर दी।

एंटोनियों ने सबसे पहले बाज़ार से मक्खन मंगवाया। जमे हुए मक्खन से उसने चीते की एक आकर्षक मूर्ति बनायीं और उसे दावत स्थल के बीचोंबीच मेज पर सजा दिया। सभी मेहमानों ने मूर्ति की बहुत तारीफ की। उन्हीं मेहमानों में से एक व्यक्ति मूर्तिकला विशेषज्ञ था। उसे जब यह मालूम चला कि यह मूर्ति एक सामान्य से नौकर ने बनायी है तो उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। उसने हैरान होकर एंटोनियो से पूछा, ‘तुमने मूर्तिकला का प्रशिक्षण कहाँ से लिया?’ एंटोनियो ने जवाब दिया, ‘पास की ही दूकान पर वह रोज मूर्तियाँ बनते हुए देखता है। बस वहीँ से उसे प्रेरणा मिली।’

Moral : लगन, निष्ठा, समर्पण और इच्छाशक्ति हमें कुछ भी सिखा सकती है और हर कार्य में सफलता दिला सकती है।

Source - Unknown

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Thursday, February 16, 2017

Laghu Kahani in Hindi

जीवनदान लघु कहानी, डरावना सपना. Save Animals Story in Hindi. Giving Boon of Life to Birds, Insects. Horrible Dream, Reality, Mask, Double Standard Tales.
Laghu Kahani in Hindi

(1)

प्रेम की कमी...

आजकल आसपास चल रहे व्यक्ति को दूर से ही आगाह कर देती हूँ कि यहाँ एक कीड़ा चल रहा है, इस पर पाँव नहीं रख देना। क्योंकि कभी-कभी ऐसा होता है कि कुछ काम करते समय या पढ़ते समय किसी कीड़े को आसपास चलता हुआ देखती हूँ और कोई भी व्यक्ति आसपास चल रहा होता है तो मन में एक अंदेशा हो जाता है उस पर आये ख़तरे को लेकर। जब निश्चिन्त हो जाती हूँ कि चल रहा व्यक्ति इधर नहीं आ रहा है तो फिर अपने काम में लग जाती हूँ। लेकिन कुछ ही देर बाद मेरी आशंका सच सिद्ध हो जाती है। एकदम वह व्यक्ति वहां से गुजर जाता है और अनजाने में उस कीड़े को कुचलकर चला जाता है।

कुछ दिनों पहले भी तो ऐसा ही हुआ था। वह दिवाली की सफाई में व्यस्त थी। छत पर बने कमरे से बाहर वाश बेसिन के ऊपर वाली ताक में चिड़िया कई दिनों से घोंसला डालने में जुटी थी। आज जब वह सफाई करने को आई तो उस घोंसले को उठाकर बाहर डालने लगी। चिड़िया आसपास कहीं नहीं थी लेकिन अचानक मुझे ख़याल आया - क्या पता इसमें अंडे हों तो मैं भीतर से टेबल ले लायी। उसने टेबल पर चढ़कर देखा तो उसे कोई अंडा नजर नहीं आया। पर घोंसला लगभग पूरा तैयार था तो मैंने कहा, ‘हम अगर इसे फेंक देंगे तो चिड़िया फिर अंडा कहाँ देगी? और इतनी जल्दी घोंसला कैसे बनाएगी? और फिर थोड़े ही दिनों की तो बात है।’ यूँ वह जीवों के प्रति संवेदनशील है, लेकिन कचरे की समस्या तो सफाई करने वाला ही जानता है, इसलिए हमेशा संवेदना को बरक़रार भी नहीं रखा जा सकता। उसने एक पल सोचा और फिर कहा, ‘और भी तो बहुत सी जगह हैं बनाने के लिए।’ और ऐसा कहकर उसने घोंसला उठा लिया।

कुछ ही देर बाद एक छोटा सा अंडा लुढ़ककर नीचे आ गिरा और फूट गया। वह अचंभित हुई। अंडा उसे दिखा नहीं था और किसी छेद से निकलकर शायद फर्श पर पहले से पड़ा था या उठाने के दौरान चला गया था। उसे इस जीव हत्या पर बहुत पछतावा हो रहा था। पता नहीं क्यों उस दिन मुझे उस फूटे हुए अंडे को देखकर तो कोई विचलन या दुःख नहीं हुआ। मुझे उसकी मृत्यु स्वीकार्य थी पर भीतर आकर बस यही ख़याल आया कि अभी मेरे भीतर का प्रेम बहुत कम है, वरना वह उस जीवन को बचा पाने में जरुर सफल होता।

By Monika Jain ‘पंछी’
(01/10/2016)

(2)

सपने की हकीकत

कल रात मैंने एक अजीब सा सपना देखा - मैं एक शांत, सुव्यवस्थित और बड़े ही मनोहर से शहर के बीचों-बीच खड़ी थी। कई सभ्य, शालीन और सुसंस्कृत से दिखाई पड़ने वाले लोगों की बैठके जगह-जगह चल रही थी। उनमें से एक समूह अहिंसावादियों का था, जहाँ अहिंसा के महत्व को समझाया जा रहा था। एक समूह नारीवादियों का था, जो नारी स्वतंत्रता, सम्मान और सुरक्षा पर चर्चा कर रहा था। एक समूह धार्मिक साधु, संतों और सन्यासियों का था जो धर्म, त्याग, मोक्ष, तप और ब्रह्मचर्य आदि विषयों पर चिंतन-मनन कर रहा था और एक समूह भ्रष्टाचार के उन्मूलन के उपायों पर विमर्श कर रहा था। ऐसे ही कई समूह थे जिनमें कई अच्छे-अच्छे विषयों पर चर्चाएँ चल रही थी।

मैं बहुत खुश थी। क्योंकि दुनिया एक बेहतर जगह बन रही थी। धीरे-धीरे शाम होने लगी, अँधेरा गिरने लगा। मुझे टक-टक सी कुछ गिरने की आवाजें आने लगी। ध्यान से देखा तो मालूम चला बहुत सारे मुखौटे जमीन पर गिर रहे थे। ये सब मुखौटे उन सभ्य और शालीन लोगों के चेहरों से मिल रहे थे जिन्हें मैंने दिन में देखा था। चारों ओर नज़र दौड़ाई तो देखा वह शहर एक भयानक जंगल में तब्दील हो चुका था और वे सभ्य और शालीन से दिखने वाले लोग खूंखार भेड़ियों में।

एक तरफ एक अहिंसावादी किसी की निर्मम हत्या करके उसका खून पी रहा था। दूसरी ओर एक नारीवादी एक औरत को बेरहमी से पीट कर उसका बलात्कार कर रहा था। पास ही में एक भ्रष्टाचार विरोधी पैसों से भरा एक सूटकेस छिपाने के लिए जमीन में एक गड्डा खोद रहा था, जो अभी-अभी उसे कोई देकर गया था। और एक धर्म गुरु शराब और अफीम के नशे में धुत होकर कई लड़कियों के साथ अय्याशी कर रहा था।

अचानक मेरी आँख खुली। मैं पसीने से लथपथ और बहुत घबराई हुई थी। मेरे जीवन का यह सबसे भयानक सपना था जो दुर्भाग्य से इस दुनिया की हकीकत भी है।

By Monika Jain ‘पंछी’
(12/10/2013)

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Wednesday, February 15, 2017

Question and Answer in Hindi

सवाल जवाब, प्रश्न उत्तर. Question Answer Conversation between Girl and Boy in Hindi. Friends Query Sms, Problem Solution Status, Doubt Messages, Quotes.

Questions and Answers

(1)

Question : आप जीवों से बहुत प्रेम करती हैं। प्रेम में एक नॉन वेजीटेरियन से शादी के बारे में क्या ख़याल हैं आपका?

Answer : शादी खुद ही एक बहुत बुरा ख़याल है :p...बड़ी वाली हिंसा...सो कैंसिल। :D बाकी जब प्यार करते समय वेज-नॉनवेज नहीं देखते, दोस्ती करते समय नहीं देखते, तो फिर शादी कौनसे खेत की मूली है? बस दोनों ओर से थोड़ी अधिक अंडरस्टैंडिंग की जरुरत है। वैसे एक दोस्त था जिससे बाद में मैंने शादी के बारे में भी सोचा था। वह एक बंगाली, परिवर्तित क्रिश्चियन व नॉन वेजीटेरियन ही था। यह बात अलग है कि वह नॉनवेज खाता है इस बात का पता मुझे तब चला जब किसी ने उसे खाने को साथ चलने को कहा तो वह नहीं गया और उसने बताया कि कुछ महीनों से उसने खाना छोड़ दिया है। मैंने कारण पूछा तो उसने कहा, ‘क्योंकि तुम नहीं खाती हो।’ उस समय तो मैंने उसे यही कहा कि जो तुम्हारा दिल कहे सिर्फ वो करना, किसी भी बेवजह के दबाव में नहीं। लेकिन आज भी यही लगता है कि अगर कोई बचपन से संस्कारित है तो उससे जबरदस्ती नहीं छुड़वाया जा सकता। वह किसी दबाव में छोड़ भी दे लेकिन अगर उसके मन में इच्छा शेष है तो यह संस्कार किसी और रूप में निकलेगा, लेकिन निकलेगा जरुर। सिर्फ प्रेम ही काम कर सकता है और कुछ नहीं। वह भी प्रेमी या प्रेमिका के लिए छोड़ने (यह भी अच्छा ही है) से अधिक बेहतर है कि पशु-पक्षियों और खुद के प्रेम में छोड़ा जाए। 

(2)

Question : जब सब बुद्ध हो जायेंगे तो क्या होगा?

Answer : यह सवाल नहीं होगा और क्या? :) 

(3)

Question : आप टीवी नहीं देखती, गाने नहीं सुनती, मूवीज नहीं देखती, न्यूज़ पेपर नहीं पढ़ती...etc...etc...तो आप करती क्या हैं?

Answer : मैं दिन में भी तारे देखती हूँ। (जोक्स अपार्ट) मुझे अपने साथ रहना अच्छा लगता है। मैं अपने साथ बोर नहीं होती। :p बाकी तो और भी लाखों काम है ज़माने में टीवी, मूवी के सिवा। :)

(4)

Question : What’s the aim of your life?

Answer : To be aimless. :)

(5)

Question : तुम इतनी प्यारी क्यों हों?

Answer : क्या कोई और विकल्प होता है?

(6)

Question : आप एक लड़की हैं, आपको कई अजीबोगरीब मैसेज आते होंगे। कोई परेशानी नहीं होती?

Answer : व्यक्ति को अगर यह समझ आ जाए कि उसे कब और क्या पढ़ना है-नहीं पढ़ना है, सुनना है-नहीं सुनना है, देखना है-नहीं देखना है, बोलना है-नहीं बोलना है, महसूस करना है-नहीं करना है, कुछ करना है-नहीं करना है...और इन सबसे आगे बढ़कर उसे सिर्फ साक्षी या दृष्टा बनना आ जाए तो उसे दुनिया में कुछ भी परेशान नहीं कर सकता। उसकी गर्दन काटी जा रही हो यह भी नहीं। मैं हूँ तो नहीं ऐसी। लेकिन बहरहाल अजीबोगरीब मैसेजेज के लिए समझ आ गया कि वे न अजीब हैं और न ही गरीब हैं, वे सिर्फ मैसेजेज हैं। हाँ, कभी-कभी कोई कार्यवाही करना जरुरी हो तो की जानी चाहिए।

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Thursday, February 9, 2017

Essay on Social Evils in Hindi

समाज सुधार पर निबंध, सामाजिक समस्या लेख. Hindi Essay on Social Evils in Our Society. Reforms Article, Movement Speech, Problems of India Paragraph, Issues. 
Essay on Social Evils in Hindi

सुधार बनाम मानसिकता

(1)

यहाँ हम घर में कुल तीन सदस्य हैं। जब कभी भी घर में किसी को बर्तन साफ़ करने के लिए रखा जाता है तब भी मम्मी और मेरा ख़याल हमेशा यही रहता है कि बर्तन कम से कम हो। अभी जो आती हैं, वे बुजुर्ग हैं तो थोड़ा एक्स्ट्रा ख़याल रहता है। उनका मेहनताना, समय-समय पर दी जाने वाली खाने-पीने की चीजें और पहनने के कपड़े देना ये सब तो बहुत आम सी बातें हैं। मुझे जो चीज अच्छी लगती है वो है मम्मा द्वारा बराबर उनका हालचाल और परेशानियाँ पूछते रहना। उनका हल बताते रहना। एक दिन बर्तन साफ़ करते समय उनके हाथों में हल्की सी खरोंच आ गयी तो मम्मा अपने हाथों से उनको दवाई लगा रही थी और पट्टी बाँध रही थी। मैं सीढ़ियों से नीचे आ रही थी। बात तो यह भी मामूली सी थी लेकिन पता नहीं क्यों उस दृश्य में अद्भुत सा सम्मोहन था। दोनों के एक्सप्रेशन्स देखते ही बनते थे। जैसे माँ-बेटी हों। मेरी आँखें ऐसे दृश्यों के लिए कैमरे का काम करती है। :) कभी-कभी सोचती हूँ : क्रांति और सुधार के हौव्वे से इतर सभी को कितनी छोटी-छोटी सी चीजों को समझ लेने की जरुरत भर है।

Monika Jain ‘पंछी’
(23/01/2017)

(2)
 
 एक बात जो अक्सर सोचती हूँ कि अच्छे लोग भी हैं, समाज सुधारक भी हैं, फिर भी सुधार हमेशा इतना ज्यादा वक्त क्यों लेते हैं? कुछ अच्छा जल्दी से नज़र क्यों नहीं आता? आदर्श स्थायी क्यों नहीं होते? परिवर्तन इतना बलिदान क्यों चाहता है?

अपने अनुभव से बस इतना ही जान पायी हूँ कि बुराई में प्राय: मतभेद नहीं होते, बुराई की ओर ज्यादातर लोगों का आकर्षण होता है और वो आसानी से विस्तार भी पा लेती है। जो बहुत लालची है, उसके चोर बनने की गुंजाईश हमेशा रहती है। जो क्रूर है, उसके हत्यारा बनने का रास्ता भी खुला है। जिसके मन में नारी के लिए सम्मान नहीं, कल को वो बलात्कारी बन जाए तो आश्चर्य नहीं।

लेकिन अच्छाई का आकर्षण कम है। उसका विस्तार भी कुछ अपवादों को छोड़कर नहीं हो पाता। फिर हर व्यक्ति के लिए इसकी अलग-अलग परिभाषाएं हैं, भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण है। जो सुधार चाहते हैं उनमें मतभेद भी बहुत ज्यादा मिलते हैं। वे कब मनभेद बनकर उन्हें एक दूसरे के ही विरुद्ध खड़ा कर दे पता नहीं चलता। सुधार की इच्छा रखने वालों में अहंकार भी कम नहीं होता। अपना नाम उन्हें बड़ा प्रिय होता है। किसी भी सुधार को हमेशा सुधार चाहने वालों का ही विरोध सबसे पहले झेलना पड़ता है। ये मनभेद, ये अहंकार ही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है। मतभेदों का तो कोई विकल्प है ही नहीं, पर मनभेद, अहंकार और यश की चाह पर विजय पाना बहुत जरुरी है। सुधार के रास्ते में ये ही हमारे सबसे बड़े दुश्मन है और हमेशा रहेंगे।

Monika Jain 'पंछी'
(01/03/2013)

(3)

मौत दामिनी की नहीं हुई है, मौत हुई है इंसानियत की। वह इंसानियत जो आज हर गली, हर चौराहे, हर नुक्कड़, हर घर और हर दिल में दम तोड़ती नज़र आ रही है। मैंने कई बार पढ़ा है कि मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी है और मानव जीवन बहुत दुर्लभ है जो 84 हजार योनियों में भटकने के बाद मिलता है। लेकिन यदि यह तथाकथित सभ्य मानव समाज ऐसा है तो नहीं चाहिए ऐसा दुर्लभ मानव जन्म!

दामिनी के साथ जो हुआ वह सम्पूर्ण मानव जाति को शर्मसार करता है...लेकिन मेरी सोच और समझ से बाहर है वे बलात्कार की घटनायें जो अभी भी बदस्तूर जारी है। पिता का बेटी के साथ दुष्कर्म, पड़ोसी का पड़ोसी के साथ दुष्कर्म, 6 महीने की बच्ची का बलात्कार ...क्या हो गया है लोगों को? दो पल की भूख के लिए किसी की जिंदगी नर्क से भी बद्दतर बना देने में नहीं हिचकते।

एक छोटी मासूम सी बच्ची जिसे देखकर सिर्फ ममता उमड़नी चाहिए उसे भी अपनी दरिंदगी का शिकार बना देने वाले लोग कौनसी दुनिया के हैं? और वो लोग जो ईश्वर को सर्वशक्तिमान मानते हैं उनका ईश्वर कहाँ छिपा है?

कई लोगों से बहस होती है मेरी इस बात को लेकर कि दुनिया ईश्वर ने बनाई है और जो भी होता है ईश्वर की मर्जी से होता है...उन सभी लोगों से पूछना है मुझे ...क्या वो ईश्वर कहलाने लायक है जिसकी मर्जी से ये सब हो रहा है? लोगों के कुतर्कों की फिर भी कमी नहीं...कहेंगे कि पापों का फल भुगतना पड़ता है। मगर मुझे कोई ये समझाए कि अगर ईश्वर में इतनी ताकत है कि वह किसी के पापों का फल दे सकते हैं तो फिर उनमें क्या इतनी शक्ति नहीं कि वह पाप होने ही न दे? ईश्वर ऐसा कभी हो ही नहीं सकता। सच तो यह है कि हम इंसान कहें जाने वाले लोग अपनी करतूतों को छिपाने के लिए ऐसे ही घटिया तर्कों का इस्तेमाल करते हैं और जब तक हमारी मानसिकता ऐसे ही संकीर्ण विचारों के इर्द गिर्द घूमेगी तब तक कुछ भी नहीं बदल सकता...कुछ भी नहीं।

Monika Jain 'पंछी'
(29/12/2012)

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