Wednesday, February 1, 2017

Vasant Panchami Essay in Hindi

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Vasant Panchami Essay in Hindi

क्या और कोई विकल्प होता है?

प्यारे दोस्तों,

ऋतुराज बसंत के आगमन की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। मधुमास कई रूपों में प्रेम से जुड़ा है और आज का दिन भी कई लोगों द्वारा भारतीय संस्कृति का प्रेम दिवस कहा जाता है तो फिर आज बात प्रेम पर ही करते हैं। वैसे प्रेम पर बात हर रोज होनी चाहिए। बल्कि हर रोज, हर क्षण प्रेम ही होना चाहिए। इससे सहज और इससे सरल कुछ है ही नहीं पर हमने अपनी कारस्तानियों से इसे सबसे मुश्किल और जटिल बना दिया है।

एक बार एक दोस्त ने कई सम्बंधित प्रतिकूलताओं पर निजी स्वार्थ से परे मेरे सहर्ष स्वीकार भाव को देखते हुए कहा था, ‘तुम इतनी प्यारी क्यों हों?’ उस समय तो मैं बस मुस्कुरा दी थी। लेकिन मन में एक ख़याल उठा कि काश! मैं इस सवाल का जवाब दे पाती। विविध सापेक्षताओं को छोड़ दूँ तो इस प्रश्न के पूर्ण योग्य तो मैं बिल्कुल नहीं। पर सोचिये! इस प्रश्न का सबसे बेहतर जवाब क्या हो सकता है? ‘तुम इतनी प्यारी या तुम इतने प्यारे क्यों हों?’ इस प्रश्न का सबसे बेहतर जवाब हो सकता है - ‘क्या कोई और विकल्प होता है?’ सच! क्या प्रेम के अलावा कोई और विकल्प होता है? बस...बस इसी जवाब तक पहुँचना है हमें कि क्या प्रेम के अलावा कोई और भी विकल्प होता है?

अस्तित्व के पास प्रेम के अलावा कोई और विकल्प था ही नहीं इसलिए उसने हमें सब विकल्प दे डाले। प्रेम को छोड़कर हमने सब विकल्प चुने - हमने ईर्ष्या चुनी, हमने घृणा चुनी, हमने आसक्ति को चुना, लालच, लोभ, तृष्णा...सब कुछ चुना...हमने मित्र चुने, हमने शत्रु चुने, हमने अच्छा और बुरा चुना, सुख और दुःख चुना, ऊंच-नीच चुनी, सम्मान-अपमान चुना...हर कदम पर हमने द्वैत को चुना, तुलना को चुना...बस नहीं चुना तो प्रेम को।

क्यों चुन रहे हैं हम इतना सारा प्रतिरोध? क्यों चुन रहे हैं हम इतना मुश्किल रास्ता? क्यों चुन रहे हैं हम तमाम दुश्वारियां? इस आशा में ही न कि एक दिन सब ठीक होगा? सब ठीक होने के लिए क्या यह सब चुनना पड़ता है?

सब ठीक तो बस इस और इसी क्षण होता है। दरअसल हम सब ठीक को अक्सर चुनते ही नहीं। हाँ, उसकी आशा में सब गलत जरुर चुनते जाते हैं। खैर! बहुत ज्यादा दार्शनिक बातें तो नहीं करुँगी पर हाँ क्या ऐसा नहीं हो सकता कि कुछ भी लिखने से पहले, कुछ भी बोलने से पहले या कुछ भी करने से पहले हम इस बात को अच्छी तरह से देखें कि इसमें प्रेम कितना है और बाकी मिलावट कितनी? मेरे कहने का आशय यह नहीं है कि हमेशा बस रसगुल्ले सी मिठास ही टपकनी चाहिए। कभी सख्ती या तल्खी की जरुरत लगती है तो वो भी ठीक है, लेकिन यह देखना जरुरी है कि क्या इसका आधार वाकई प्रेम है? बात प्रेम, होश और समझ से उठ रही है या आधार कोई कुंठा, ईर्ष्या, भय, अहंकार...आदि वृत्तियाँ हैं?

मुझे लगता है हर रोज कम से कम एक प्रेमपत्र लिखा ही जाना चाहिए। कहाँ, कैसे, किस तरह...मुखर या मौन...प्रकट या अप्रकट...यह हमारा चुनाव! यह पत्र मैंने अपने और आप सबके लिए लिखा है। क्योंकि प्रेम से बहुत दूर आ चुके हैं हम तो चलो! वापस अपने घर लौटते हैं। <3

सप्रेम
पंछी