Tuesday, April 18, 2017

Mind Quotes in Hindi

मन पर विचार, बुद्धि, चित्त वृत्ति, मस्तिष्क, विवेक, बोध. Mind Conditioning Quotes in Hindi. Idea, Brain Power Status, Thinking, Opinion, Intellect Thoughts.

Mind Quotes
  • 19/03/2017 - एक ही बात पर कुछ लोग ख़ुश होते हैं, कुछ उदास, कुछ गुस्सा, कुछ क्या, कुछ कुछ नहीं...बस यहीं से मुझे ये 'मन' नामक प्राणी संदिग्ध लगने लगता है। ~ Monika Jain ‘पंछी
  • 23/03/2017 - कितना अच्छा होता गर धारणाएं बनाने की बजाय सीधे बात कर ली जाती। सहजता की कितनी कमी है हमारे समाज में। वैसे अगर सहजता हो तब तो बिना बात किये भी अक्सर धारणा बनती ही नहीं। शब्दों या कविताओं के कुछ टुकड़े पूरी ज़िन्दगी नहीं होते। वे तो खुद की छोड़ो किसी और की क्षणिक भावनाएं भी हो सकती है। क्योंकि लेखक महसूस लेता है कई ज़िंदगियों को खुद में। ~ Monika Jain ‘पंछी 
  • 15/01/2017 - हमें कोई विचार, उसके लिखने की शैली पसंद आती है, सो हमने उसे शेयर कर दिया इसमें कोई समस्या नहीं है। बहुत सारे विरोधी विचारों को पढ़कर ही तो समझ आता है कि विचार सिर्फ विचार है। लेकिन बात यहाँ उनके लिए है जो हावी होने की कोशिश करते हैं। जिन्हें लगता है कि दुनिया में एकमात्र सही सिर्फ वे ही हैं और बाकी सबको उनका अनुसरण करना चाहिए और ऐसा करवाकर वे सारी दुनिया को बदल देंगे। समस्या कट्टरता और तानाशाही में है। ~ Monika Jain ‘पंछी 
  • 21/01/2017 - धारणा का कुचक्र ऐसा है कि यह भी एक धारणा बन जाती है कि कोई कितनी धारणा बनाता है। हाँ, लेकिन धारणा और किसी को समझने में अंतर है। ~ Monika Jain ‘पंछी 
  • 26/01/2017 - ज्ञान जो खाली करे वह प्रेम तक पहुंचता है और ज्ञान जो भरे वह अहंकार तक। ~ Monika Jain ‘पंछी 
  • 04/01/2016 - न आस्तिक कहलाने की जरुरत है...न नास्तिक कहलाने की। जरुरत बस खुले दिमाग की है। किसी श्रेणी से बंध जाना अक्सर उन असीम क्षमताओं से दूर कर देता है जो हमारे भीतर विद्यमान है। कम से कम जो विज्ञान प्रेमी है उसे तो ऐसा नहीं ही करना चाहिए। ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • 08/01/2017 - प्रेम के मार्ग का बस एक ही काँटा है : वृत्तियाँ। सामान्य और सरल से सरलतम को भी मानव मन की ग्रंथियां कितना जटिल और जटिलतम बना देती है। ~ Monika Jain ‘पंछी 
  • 02/06/2016 - अतीत के चलचित्र वर्तमान के चलचित्रों से मिल बैठते हैं और फिल्म बिगड़ जाती है। (मन तू होजा कोरा कागज।) ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • 05/06/2016 - फ्रॉक पहनकर कितनी छोटी हो जाती हूँ मैं...फिर खेलने का मन करने लगता है... ^_^ (तितली मन!) ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • 17/03/2016 - जरुरत से अधिक सक्रिय दिमाग और जाग्रत मन में अंतर है। एक जहाँ राय कायम करने और निष्कर्षों की जल्दबाजी में सोये हुए जड़ मन की तरह ही पूर्वाग्रहों, धारणाओं, अंधविश्वासों और रूढ़ियों की गठरी बन सकता है, वहीँ दूसरा इन सबसे मुक्त हो सकता है। ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • 17/04/2016 - तुम्हारा मुझे इतने दिनों बाद अचानक कुछ लिख भेजना अनायास ही न था। कुछ ही देर पहले मन की गहराईयों ने तुम्हें याद किया था। ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • 22/01/2016 - दिल (रक्त परिसंचरण वाला) कभी कुछ नहीं कहता...जो भी कहता है दिमाग (मन) ही कहता है। जब तक बोध न हो तब तक तो मन में विरोधाभासी विचार ही उठते हैं। जहाँ भी चयन का सवाल है वहां हमें बस यह देखना है कि जिस बात को हम सुनने जा रहे हैं उसका व्यापक हित कितना है...और सही निर्णय भावनाओं में बहकर तो कभी नहीं हो सकते। यह तो सिर्फ सजग रहकर ही हो सकते हैं। ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • 26/09/2015 - शब्दों के मनमाने अर्थ और व्याख्याएं नहीं बदल सकते सच्चाईयाँ। जिसे जानना हो सच उसे मन के धरातल पर उतरना पड़ता है। ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • स्वयं का अच्छापन बुरापन दूसरों की दृष्टि से मत नापो। यह मन की दुर्बलता दिखाना है। ~ स्वामी विवेकानंद / Swami Vivekananda 
  • मन रूपी राजा की मृत्यु पर इन्द्रियां रुपी सेना स्वत: ही मर जाती है। ~ आराधना सार 
  • मनुष्य का मन यदि किसी चीज की कल्पना या उसमें विश्वास कर सकता है तो वह उसे प्राप्त भी कर सकता है। ~ Napoleon Hill / नेपोलियन हिल 
  • इंसान जितना अपने मन को मना सके उतना ख़ुश रह सकता है। ~ अब्राहम लिंकन / Abraham Lincoln 
  • जो मनुष्य अपने मन का गुलाम बना रहता है वह कभी नेता और प्रभावशाली पुरुष नहीं हो सकता। ~ वाल्तेयर / Voltaire
Feel free to add your views about these quotes on mind.

Monday, April 17, 2017

Vasant Panchami Essay in Hindi

बसंत पंचमी पर निबंध, ऋतुराज वसंत लेख, प्रेम पत्र. Vasant Ritu Panchami Essay in Hindi. Spring Season Wishes Article, Love Letter to Friends, Speech, Messages.

क्या और कोई विकल्प होता है?

प्यारे दोस्तों,

ऋतुराज बसंत के आगमन की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। मधुमास कई रूपों में प्रेम से जुड़ा है और आज का दिन भी कई लोगों द्वारा भारतीय संस्कृति का प्रेम दिवस कहा जाता है तो फिर आज बात प्रेम पर ही करते हैं। वैसे प्रेम पर बात हर रोज होनी चाहिए। बल्कि हर रोज, हर क्षण प्रेम ही होना चाहिए। इससे सहज और इससे सरल कुछ है ही नहीं पर हमने अपनी कारस्तानियों से इसे सबसे मुश्किल और जटिल बना दिया है।

एक बार एक दोस्त ने कई सम्बंधित प्रतिकूलताओं पर निजी स्वार्थ से परे मेरे सहर्ष स्वीकार भाव को देखते हुए कहा था, ‘तुम इतनी प्यारी क्यों हों?’ उस समय तो मैं बस मुस्कुरा दी थी। लेकिन मन में एक ख़याल उठा कि काश! मैं इस सवाल का जवाब दे पाती। विविध सापेक्षताओं को छोड़ दूँ तो इस प्रश्न के पूर्ण योग्य तो मैं बिल्कुल नहीं। पर सोचिये! इस प्रश्न का सबसे बेहतर जवाब क्या हो सकता है? ‘तुम इतनी प्यारी या तुम इतने प्यारे क्यों हों?’ इस प्रश्न का सबसे बेहतर जवाब हो सकता है - ‘क्या कोई और विकल्प होता है?’ सच! क्या प्रेम के अलावा कोई और विकल्प होता है? बस...बस इसी जवाब तक पहुँचना है हमें कि क्या प्रेम के अलावा कोई और भी विकल्प होता है?

अस्तित्व के पास प्रेम के अलावा कोई और विकल्प था ही नहीं इसलिए उसने हमें सब विकल्प दे डाले। प्रेम को छोड़कर हमने सब विकल्प चुने - हमने ईर्ष्या चुनी, हमने घृणा चुनी, हमने आसक्ति को चुना, लालच, लोभ, तृष्णा...सब कुछ चुना...हमने मित्र चुने, हमने शत्रु चुने, हमने अच्छा और बुरा चुना, सुख और दुःख चुना, ऊंच-नीच चुनी, सम्मान-अपमान चुना...हर कदम पर हमने द्वैत को चुना, तुलना को चुना...बस नहीं चुना तो प्रेम को।

क्यों चुन रहे हैं हम इतना सारा प्रतिरोध? क्यों चुन रहे हैं हम इतना मुश्किल रास्ता? क्यों चुन रहे हैं हम तमाम दुश्वारियां? इस आशा में ही न कि एक दिन सब ठीक होगा? सब ठीक होने के लिए क्या यह सब चुनना पड़ता है?

सब ठीक तो बस इस और इसी क्षण होता है। दरअसल हम सब ठीक को अक्सर चुनते ही नहीं। हाँ, उसकी आशा में सब गलत जरुर चुनते जाते हैं। खैर! बहुत ज्यादा दार्शनिक बातें तो नहीं करुँगी पर हाँ क्या ऐसा नहीं हो सकता कि कुछ भी लिखने से पहले, कुछ भी बोलने से पहले या कुछ भी करने से पहले हम इस बात को अच्छी तरह से देखें कि इसमें प्रेम कितना है और बाकी मिलावट कितनी? मेरे कहने का आशय यह नहीं है कि हमेशा बस रसगुल्ले सी मिठास ही टपकनी चाहिए। कभी सख्ती या तल्खी की जरुरत लगती है तो वो भी ठीक है, लेकिन यह देखना जरुरी है कि क्या इसका आधार वाकई प्रेम है? बात प्रेम, होश और समझ से उठ रही है या आधार कोई कुंठा, ईर्ष्या, भय, अहंकार...आदि वृत्तियाँ हैं?

मुझे लगता है हर रोज कम से कम एक प्रेमपत्र लिखा ही जाना चाहिए। कहाँ, कैसे, किस तरह...मुखर या मौन...प्रकट या अप्रकट...यह हमारा चुनाव! यह पत्र मैंने अपने और आप सबके लिए लिखा है। क्योंकि प्रेम से बहुत दूर आ चुके हैं हम तो चलो! वापस अपने घर लौटते हैं। <3

सप्रेम
पंछी

(01/02/2017)

Sunday, April 16, 2017

Poem on Roti in Hindi

पहली रोटी पर कविता, चपाती शायरी, ऑस्ट्रेलिया का नक्शा. Poem on Roti in Hindi for Kids. First Bread Nursery Rhyme, Childhood Kitchen Memories Poetry, Slogans.

पहली रोटी

याद है मुझे अपनी पहली रोटी!
आधी कच्ची, आधी पक्की
और थी छोटी-मोटी
हाँ, याद है मुझे अपनी पहली रोटी।

छोटे से हाथों में छोटी सी लोई
लेकर चली मैं बनाने रसोई
बड़ा सा बेलन और बड़ा सा चकला
मेरे नन्हें हाथों से बार-बार फिसला।

बेलन ने गिरकर पाँव मेरा तोड़ा
पर मैंने अपना उत्साह न छोड़ा
बनाया था मैंने आस्ट्रेलिया का नक्शा
सिकने तक कर दे ईश्वर इसकी रक्षा।

कहीं से थी पतली, कहीं से थी मोटी
तवे पे रखकर हाथ से पलटी
तवे ने जलाया मेरा नन्हा हाथ
पर मैंने छोड़ा न रोटी का साथ।

चिमटे से पकड़ी और नीचे उतारी
कच्ची-जली रोटी थी बड़ी प्यारी।

Monika Jain 'पंछी'
(22/01/2013)

Feel free to add your memories regarding making and baking of your first roti. :)

Saturday, April 15, 2017

Life Thoughts in Hindi

ज़िन्दगी पर विचार, जीवन सुविचार. Philosophy Based Life Thoughts in Hindi. Attitude Status, Comments, Quotes of The Day, Proverbs, Lines, Slogans, Sms, Messages.


Life Thoughts
  • 13/04/2017 - जीवन को जितना समझती हूँ, मृत्यु भी उतनी ही समझ आ जाती है। आश्चर्य! कि इस टकराव को हम जीना कहते हैं। जीना तो उस दिन ही होगा जब कोई टकराव रहेगा ही नहीं और जीवन होगा नदी की अविरल धारा सा। ~ Monika Jain ‘पंछी’
  • 22/02/2017 - जब आप किसी वस्तु, व्यक्ति या किसी से भी से रूबरू होते हैं और अक्सर ही आपके विचार इस दिशा में हो कि इससे क्या फायदा हो सकता है, या यह क्या काम आ सकता है, या इसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं, या प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से किसी भी तरह की कोई उम्मीद या अपेक्षा रहती है तो यह बहुत अधिक व्यापारी मस्तिष्क को इंगित करता है। इतनी सौदागिरी जीवन से बहुत दूर ले जाती है। ~ Monika Jain ‘पंछी’
  • 16/12/2016 - अब तो जीना सीख लें हम, कब तक कभी इसके और कभी उसके लिए मरते रहेंगे। एक दिन तो वैसे ही मरना है। ~ Monika Jain ‘पंछी’
  • 16/12/2016 - हर मृत्यु एक सन्देश है और यह सन्देश है जीवन का। जो मृत्यु को स्वीकार करके चल सकता है वास्तव में वही तो जी सकता है। ~ Monika Jain ‘पंछी’
  • 05/01/2017 - मनुष्य जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम मनुष्य होने के भाव से ऊपर उठ सकें। उससे पहले स्त्री स्त्री होने के भाव से और पुरुष पुरुष होने के भाव से...लेकिन यहाँ तो अभी तक कपड़ा पुराण ही चल रहा है। ~ Monika Jain ‘पंछी’
  • 20/01/2016 - जीते जी कोई पूछता तक नहीं...मरने के बाद भगवान बना देते हैं लोग। ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • 20/01/2017 - हमने सदा लहरों को जीवन समझा और गहरे सागर को भूल गए। ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • 07/10/2016 - मरने से पहले...जी लेना चाहिए। ~ Monika Jain ‘पंछी’
  • जीवन हमारे लिए क्या लेकर आएगा...यह भले ही हम तय न कर सकें, लेकिन उसका स्वागत हम कैसे करेंगे यह तय करना हमारे हाथ में है। ~ Monika Jain ‘पंछी’
  • असंतुष्टि और सुस्मृति भूत की, संचय और भय भविष्य के, वर्तमान कहीं नदारद है। जो वर्तमान में जीना आ जाता तो सही मायनों में जीना आ जाता। ~ Monika Jain ‘पंछी’
  • कभी-कभी जीने के लिए अपने भीतर बहुत कुछ मारना होता है। क्यों ऐसे गुनाहों की सजा भी मिलती है जो हमने किये ही नहीं होते? ~ Monika Jain ‘पंछी’
  • 20/07/2015 - दुनिया नहीं जीने देती। अगर संघर्षों, मुश्किलों, ग़मों, तकलीफों, दर्द और तन्हाईयों के विशाल सागर से घिरे होते हुए भी आपको मुस्कुराना, चहकना और खिलखिलाना आ जाता है, तो बहुत सम्भावना है कि आपकी तकलीफों को नाटक करार दे दिया जाएगा। ~ Monika Jain ‘पंछी’
  • 15/03/2015 - ज़िन्दगी तो बार-बार आवाज़ देती है - यह तुम्हारे लिए नहीं है, नहीं है, नहीं है...बिल्कुल भी नहीं है। पर हम बाहरी दुनिया के शोर में ज़िन्दगी की आवाज़ को अनसुना कर बैठते हैं। ~ Monika Jain ‘पंछी’
  • 05/06/2016 - जीवन का उद्देश्य ही यह जान लेना है कि जीवन का कोई उद्देश्य नहीं, वह सिर्फ जीवन है। ~ Monika Jain ‘पंछी’
  • 15/06/2016 - ज़िन्दगी की दाल में मीठे नीम सी वह...अलग होना उसकी नियति थी। ~ Monika Jain ‘पंछी’
  • 17/06/2016 - जरा सी दुनिया और जीवन के प्रति आसक्ति बढ़ी नहीं कि एक तमाचा इंतजार कर रहा होता है...और फिर? फिर क्या...मोह भंग! ~ Monika Jain ‘पंछी’
  • कभी-कभी जिंदगी में सबसे आसान सवाल ही जवाब देने में सबसे मुश्किल लगने लगते हैं. ~ Monika Jain ‘पंछी’
Feel free to add your views about these thoughts on life.

Thursday, April 6, 2017

Meditation Quotes in Hindi

ध्यान, होश, जागरूकता, भक्ति, समर्पण, एकाग्रता विचार. Meditation Quotes in Hindi. Awareness Sayings, Devotion Status, Dedication Slogans, Concentration Sms.

Meditation Quotes
  • 22/02/2017 -...कि जब उसे घास लाने को कहा गया और वह देर तक नहीं लौटा तो उसकी खोज शुरू हुई। वह घास के मैदान में मिला। उससे जब कारण पूछा गया तो उसने कहा, 'मैं घास हो गया था।'...मतलब कितने निर्दोष से किस्से हैं...आँखें भीग जाती हैं...मुस्कुराहट दौड़ कर होठों पर तैरने लगती है। कुछ बेहद जरुरी...नहीं बेहद नहीं...सबसे जरुरी याद आ जाता है। उस दिन मैंने जिक्र किया था न?...कि कृष्णमूर्ति पूछते हैं - क्या आपने कभी किसी पेड़ को देखा है? पेड़ को देखने के लिए पेड़ हो जाना पड़ता है...हाँ, पेड़ ही हो जाना पड़ता है...और कोई उपाय ही नहीं। :) ~ Monika Jain ‘पंछी’
  • 18/01/2017 - अपरिचित में भी चिर परिचित का दर्शन यही तो प्रेम (सुमिरन) है। ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • 21/01/2017 - कृत्य चाहे कोई भी हो उससे कुछ हिंसा तो होगी ही। मुख्य बात यह है कि वह कृत्य हमारे अहंकार से उपजा है या फिर हमारे होश, समर्पण और ध्यान से। ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • 18/12/2016 - सामान्यत: हर चीज का कारण तो होता है लेकिन उस कारण का भी कारण खोजते-खोजते-खोजते-खोजते ...वह हमेशा अकारण तक ही पहुँचता है। ईश्वर उस अकारण से भिन्न और क्या है? जिसमें सारे कारण विलय हो जाते हैं। और भक्ति, प्रेम, ध्यान? वह बस उस अकारण के प्रति समर्पण और अपने ईश्वरत्व को उपलब्ध हो जाने का मार्ग है। ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • 15/11/2016 - भक्ति तो सहज ध्यान है, लेकिन जो सबसे सहज है उसके लिए ही हम सहज नहीं। इस समूचे अस्तित्व के प्रति समर्पण ही भक्ति है लेकिन हमारा अहंकार समर्पण नहीं करना चाहता। 'भक्त' शब्द व्यंग्य के रूप में बहुत प्रचलित है यहाँ।...पर सच यह भी तो है कि हमारे सारे प्रयास अनजाने में ही सही उस आनंद की खोज में ही है जो 'भक्त' को प्राप्त है। बात बस इतनी सी है कि जब तक प्रयास है भक्त हो जाना मयस्सर ही नहीं। ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • 23/02/2017 - I don’t want god to be always with me, rather I want to be always with god. ईश्वर (परम तत्व) को अपने अनुकूल बनाने से कई बेहतर है...परम तत्व के अनुकूल बन जाना। हम परम तत्व को निर्देश न दें, बल्कि उससे निर्देश लें। यही तो भक्ति है, यही तो प्रार्थना है...और यही तो है ध्यान। ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • 11/09/2016 - सहज भक्ति/प्रेम/ध्यान को उपलब्ध हो जाना...इससे बड़ी उपलब्धि और क्या हो सकती है? ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • 10/09/2015 - सारी समस्यायों का कारण ध्यान (एकाग्रता) है। सारी समस्यायों का समाधान भी ध्यान (होश) ही है। निर्भर करता है ध्यान कहाँ लगाया जा रहा है। ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • 22/10/2015 - जब हम किसी कार्य को पूरी तरह समर्पित होकर करते हैं (खुद को पूरी तरह भुलाकर) तो जो परिणाम आता है वह इतना अप्रत्याशित होता है कि कर्ता को विश्वास ही नहीं होता कि यह काम उसने किया है। मनुष्य की क्षमताओं के रास्ते का सबसे बड़ा बाधक उसका 'मैं' ही होता है। इसलिए सफलता हो, प्रेम हो, चाहे मुक्ति...समर्पण पहली शर्त है। ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • 16/10/2016 - कुछ लोग कहते हैं दिल (करुणा) को सुनना चाहिए।
    और कुछ कहते हैं दिमाग (प्रज्ञा) को सुनना चाहिए।
    समस्या किसे सुनना चाहिए यह नहीं है। समस्या दिल और दिमाग के अलग-अलग (द्वंद्व) होने की है। जैसे-जैसे प्रज्ञा और करुणा एक होते जायेंगे, हम जो भी सुनेंगे सही सुनेंगे। :) ~ Monika Jain ‘पंछी’ 
  • चाहे आप में कितनी ही योग्यता क्यों ना हो, केवल एकाग्र चित्त होकर ही आप महान कार्य कर सकते हैं। ~ बिल गेट्स / Bill Gates 
  • पार्श्व गायन केवल आवाज़ का मामला नहीं है, एक अर्थपूर्ण और सफल गीत के लिए हमें दिमाग, शरीर, दिल और आत्मा से काम करना पड़ता है। ~ मुकेश, प्रसिद्ध गायक / Mukesh
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