Monday, January 30, 2017

Mind Quotes in Hindi

मन पर विचार, बुद्धि, चित्त वृत्ति, मस्तिष्क, विवेक, बोध. Mind Conditioning Quotes in Hindi. Idea, Brain Power Status, Thinking, Opinion, Intellect, Thoughts. 
Mind Quotes in Hindi
Mind Quotes

  • हमें कोई विचार, उसके लिखने की शैली पसंद आती है, सो हमने उसे शेयर कर दिया इसमें कोई समस्या नहीं है। बहुत सारे विरोधी विचारों को पढ़कर ही तो समझ आता है कि विचार सिर्फ विचार है। लेकिन बात यहाँ उनके लिए है जो हावी होने की कोशिश करते हैं। जिन्हें लगता है कि दुनिया में एकमात्र सही सिर्फ वे ही हैं और बाकी सबको उनका अनुसरण करना चाहिए और ऐसा करवाकर वे सारी दुनिया को बदल देंगे। समस्या कट्टरता और तानाशाही में है। ~ Monika Jain ‘पंछी (15/01/2017) 
  • धारणा का कुचक्र ऐसा है कि यह भी एक धारणा बन जाती है कि कोई कितनी धारणा बनाता है। ~ Monika Jain ‘पंछी (21/01/2017) 
  • ज्ञान जो खाली करे वह प्रेम तक पहुंचता है और ज्ञान जो भरे वह अहंकार तक। ~ Monika Jain ‘पंछी (26/01/2017) 
  • न आस्तिक कहलाने की जरुरत है...न नास्तिक कहलाने की। जरुरत बस खुले दिमाग की है। किसी श्रेणी से बंध जाना अक्सर उन असीम क्षमताओं से दूर कर देता है जो हमारे भीतर विद्यमान है। कम से कम जो विज्ञान प्रेमी है उसे तो ऐसा नहीं ही करना चाहिए। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (04/01/2016) 
  • प्रेम के मार्ग का बस एक ही काँटा है : वृत्तियाँ। सामान्य और सरल से सरलतम को भी मानव मन की ग्रंथियां कितना जटिल और जटिलतम बना देती है। ~ Monika Jain ‘पंछी (08/01/2017) 
  • अतीत के चलचित्र वर्तमान के चलचित्रों से मिल बैठते हैं और फिल्म बिगड़ जाती है। (मन तू होजा कोरा कागज।) ~ Monika Jain ‘पंछी’ (02/06/2016) 
  • फ्रॉक पहनकर कितनी छोटी हो जाती हूँ मैं...फिर खेलने का मन करने लगता है... ^_^ (तितली मन!) ~ Monika Jain ‘पंछी’ (05/06/2016) 
  • जरुरत से अधिक सक्रिय दिमाग और जाग्रत मन में अंतर है। एक जहाँ राय कायम करने और निष्कर्षों की जल्दबाजी में सोये हुए जड़ मन की तरह ही पूर्वाग्रहों, धारणाओं, अंधविश्वासों और रूढ़ियों की गठरी बन सकता है, वहीँ दूसरा इन सबसे मुक्त हो सकता है। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (17/03/2016) 
  • तुम्हारा मुझे इतने दिनों बाद अचानक कुछ लिख भेजना अनायास ही न था। कुछ ही देर पहले मन की गहराईयों ने तुम्हें याद किया था। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (17/04/2016) 
  • दिल (रक्त परिसंचरण वाला) कभी कुछ नहीं कहता...जो भी कहता है दिमाग (मन) ही कहता है। जब तक बोध न हो तब तक तो मन में विरोधाभासी विचार ही उठते हैं। जहाँ भी चयन का सवाल है वहां हमें बस यह देखना है कि जिस बात को हम सुनने जा रहे हैं उसका व्यापक हित कितना है...और सही निर्णय भावनाओं में बहकर तो कभी नहीं हो सकते। यह तो सिर्फ सजग रहकर ही हो सकते हैं। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (22/01/2016) 
  • शब्दों के मनमाने अर्थ और व्याख्याएं नहीं बदल सकते सच्चाईयाँ। जिसे जानना हो सच उसे मन के धरातल पर उतरना पड़ता है। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (26/09/2015) 
  • स्वयं का अच्छापन बुरापन दूसरों की दृष्टि से मत नापो। यह मन की दुर्बलता दिखाना है। ~ स्वामी विवेकानंद / Swami Vivekananda  
  • मन रूपी राजा की मृत्यु पर इन्द्रियां रुपी सेना स्वत: ही मर जाती है। ~ आराधना सार 
  • मनुष्य का मन यदि किसी चीज की कल्पना या उसमें विश्वास कर सकता है तो वह उसे प्राप्त भी कर सकता है। ~ Napoleon Hill / नेपोलियन हिल 
  • इंसान जितना अपने मन को मना सके उतना ख़ुश रह सकता है। ~ अब्राहम लिंकन / Abraham Lincoln  
  • जो मनुष्य अपने मन का गुलाम बना रहता है वह कभी नेता और प्रभावशाली पुरुष नहीं हो सकता। ~ वाल्तेयर / Voltaire

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Thursday, January 26, 2017

Moral Thoughts in Hindi

नैतिक विचार, नैतिकता उद्धरण. Moral Thoughts in Hindi for Students. Ethical Education Status, Morality Quotes, Slogans, Messages, Sms, Sayings, Lines, Proverbs. 
Moral Thoughts in Hindi
Moral Thoughts

  • अगर निर्दोषिता के चरम पर पहुँचे सिद्ध जनों और मासूमियत के चरम पर विद्यमान प्रकृति जैसे पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, बच्चों...आदि के समक्ष भी हमारा अहंकार छोटा नहीं पड़ता तो समझो समस्या बहुत बड़ी है...बहुत बड़ी है। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (17/01/2017) 
  • जो प्रेममय होंगे वे दुनिया के किसी भी कोने में हों, वे एक ही बात सोचते हैं, एक ही बात कहते हैं और एक ही बात लिखते हैं। और यह देख और समझ पाने के लिए भी कुछ-कुछ प्रेममय होना जरुरी है। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (26/01/2017)  
  • जो स्वार्थ के सच्चे अर्थ तक पहुँचा, समझो वह परमार्थ को पहुँच गया। क्योंकि स्व और पर तो कभी जुदा थे ही नहीं। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (20/01/2017)  
  • आप मात्र शब्दों की पोटली लेकर घूमेंगे और चाहेंगे कि विमर्श हो...नहीं हो पायेगा। दरअसल वहां चाहत विमर्श की होती भी नहीं, अहंकार बस येन-केन-प्रकारेण जीतना चाहता है। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (24/12/2016) 
  • मुझे आज तक ये नहीं समझ आया कि कर्म, ज्ञान, भक्ति, क्रिया...जितने भी मार्ग हैं इनके समर्थक एक दूसरे का विरोध क्यों करते हैं? किसी भी रास्ते से जाने वाला क्या दूसरे से बच पायेगा कभी? मुख्य बात है खुद से खुद के बीच की दूरी मिटा देने की। अगर वह हुआ और हम प्रेम/परम में अवस्थित हो पायें तो जो भी होगा वह शुभ ही होगा। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (01/01/2017) 
  • अपनी मृत्यु की तैयारी खुद करनी हो, अपने क्रियाकर्म का सामान खुद जुटाना हो और अपनी समस्त धारणाओं को ध्वस्त होते देखने का साहस हो तो मुक्ति हमारे लिये है। लेकिन यह मृत्यु सांसारिक मृत्यु से भिन्न होगी। मुक्ति मृत्यु है उन सब पहचानों की जो हमने दुनिया से इकट्ठा की है। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (16/12/2016) 
  • वास्तव में परमार्थ क्या है, इसे समझने के लिए और इसके होने के लिए बेहद सूक्ष्म दृष्टि चाहिए...बेहद सूक्ष्म। महावीर, बुद्ध, जीसस, नानक, मीरा...जो भी मुक्त हुए उनके पास यही दृष्टि थी। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (14/01/2017) 
  • ज्ञान की सीमा है अपने असीम अज्ञान को जान लेना। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (14/01/2017) 
  • प्रेम तो कुछ ऐसा है कि मेरा बस चले तो मैं आँगन में चलने वाले नन्हें से कीड़े को भी लव लैटर लिख दूँ। :p कित्ता तो प्यारा होता है। <3 ~ Monika Jain ‘पंछी’ (14/01/2017)  
  • कुछ ख़बरों, कुछ घटनाओं और कुछ लोगों पर कुछ नहीं लिखा जाता...शब्द नहीं बनते। बस इतना ही - हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई....न बनों, न बनाओ। इस दुनिया को इंसानों की बेहद जरूरत है। बेहद! ~ Monika Jain ‘पंछी’ (18/12/2014) 
  • सब कुछ इतना सतत और सम्बंधित है कि शब्द और श्रेणियां सब मिथ्या लगने लगते हैं। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (09/01/2016) 
  • कुछ लोग बिना मांगे मदद करने आते हैं और फिर मदद करने की कुछ अप्रत्यक्ष शर्तें भी बताते हैं, और खुद को मददगार भी कहते हैं। भई, चाहे जो हो पर शर्तों वाली मदद तो बिल्कुल भी नहीं चाहिए और ना ही ऐसे मददगार। दुनिया की कोई भी समस्या इतना कमजोर कभी नहीं बना सकती कि दूसरों की उन शर्तों पर मदद लेनी पड़े, जिन्हें मानने को दिल नहीं कहता। फिर चाहे शर्त टिन्नी-मिन्नी सी ही क्यों ना हो। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (02/10/2012)

Anger Quotes in Hindi

क्रोध पर विचार, गुस्सा नियंत्रण. Anger Management Quotes in Hindi. Krodh Niyantran, Gussa, Angry Sms, Temper Messages, Annoyed Status, Annoying Sayings, Lines.
Anger Quotes in Hindi
Anger Quotes

  • कुछ लोग किस बात का खार (खुन्नस) खाए बैठे रहते हैं समझ ही नहीं आता। अच्छी बात यह है कि आजकल गुस्सा कम आता है, मुस्कुराहट ज्यादा। :) ~ Monika Jain ‘पंछी’ (14/01/2017) 
  • आवेश क्षीण होकर गुम हो जाते हैं, बस हम उन्हें सहयोग न दें तो। आवेश में उठने के इच्छुक कदम को हरसंभव निरस्त करते जाना चाहिए। अक्सर ही आवेश के खत्म हो जाने पर यह अहसास होता है कि अगर वह कदम उठ जाता तो कितना गलत होता। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (28/06/2016)  
  • नाराज हो जाओ कभी तो बस इतने से फासले पर होना जो एक कदम, एक स्पर्श, एक मुस्कुराहट, एक आंसू, एक शब्द या प्रेम की एक नजर भर से भरा जा सके।...और भरावन हो ऐसी कि कभी नाराज हुए थे, ये याद भी न रह सके। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (17/04/2016)  
  • जिससे प्यार करते हैं, कभी-कभी उसी पर ढेर सारा गुस्सा निकालने का मन होता है। वह झेल लेगा न, शायद इसलिए। :p ~ Monika Jain ‘पंछी’ (10/05/2016)  
  • ...क्योंकि असल वाली कट्टी कहकर नहीं होते। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (25/06/2016)  
  • क्रोध और बैर का भेद केवल कालकृत है। दुःख पहुँचने के साथ ही दुखदाता को पीड़ित करने की प्रेरणा करने वाला मनोविकार क्रोध है और कुछ काल बीत जाने पर प्रेरणा करने वाला भाव बैर है। ~ आचार्य रामचंद्र शुक्ल  
  • क्रोध को जीतने में मौन सबसे अधिक सहायक है। ~ महात्मा गाँधी / Mahatma Gandhi  
  • मुर्ख मनुष्य क्रोध को जोर-शोर से प्रकट करता है, किन्तु बुद्धिमान शांति से उसे वश में करता है। ~ बाइबिल / Bible  
  • क्रोध मुर्खता से प्रारंभ और पश्चाताप पर खत्म होता है। ~ पाईथागोरस / Pythagoras  
  • जो मन की पीड़ा को स्पष्ट रूप में नहीं कह सकता, उसी को क्रोध अधिक आता है। ~ रवीन्द्रनाथ ठाकुर / Rabindranath Thakur  
  • क्रोध मस्तिष्क के दीपक को बुझा देता है। अतः हमें सदैव शांत व स्थिरचित्त रहना चाहिए। ~ इंगरसोल / Ingersoll  
  • सुबह से शाम तक काम करके आदमी उतना नहीं थकता जितना क्रोध या चिंता से पल भर में थक जाता है। ~ जेम्स एलन / James Allen  
  • हमारा क्षणिक आवेश संसार के लिए कितना अहितकर है, जो दूसरों की जान तक ले लेता है। ~ चन्द्रप्रभ / Chandra Prabh  
  • उस मनुष्य के पास कौन बैठना चाहेगा, उस मनुष्य को कौन अपने पास बिठाना चाहेगा जो हमेशा बारूद का ढेर बने घूमता है और जिसका पता नहीं कि वह कब फट पड़े। ~ जेम्स एलन / James Allen
  • जिस मनुष्य को अन्याय पर क्रोध आता है, जो अपमान को सह नहीं सकता, वही पुरुष कहलाता है। जिस मनुष्य में क्रोध या चिढ़ नहीं है, वह नपुंसक ही है। ~ लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक / Bal Gangadhar Tilak  
  • क्रोधित होना आसान है लेकिन सही व्यक्ति से सही सीमा में, सही समय पर और सही उद्देश्य के साथ क्रोधित होना, सभी के बस की बात नहीं है और यह आसान नहीं है। ~ अरस्तु / Arastu 
  • क्रोध को पाले रखना गर्म कोयले को किसी और पर फेंकने की नीयत से पकड़े रहने के समान है, इसमें आप ही जलते हैं। ~ गौतम बुद्ध / Gautam Buddha  
  • वह आदमी वास्तव में बुद्धिमान है जो क्रोध में भी गलत बात मुंह से नहीं निकालता। ~ शेख सादी / Sheikh Saadi

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Wednesday, January 25, 2017

Poem on Mehangai in Hindi

बढ़ती महंगाई की मार समस्या पर कविता, आर्थिक असमानता शायरी. Poem on Inflation in Hindi. Dearness Poetry Lines, Economic Development Inequality Slogans, Rhymes. 
Poem on Mehangai in Hindi

हाय! मार गयी महंगाई

जाड़े में ठिठुरता बदन
सड़कों पर अधनंगा तन
बरसात में टपकता छप्पर
बर्तन बिछे हुए फर्श पर।

सब्जी के है भाव चढ़े
पेट्रोल के भी दाम बढ़े
सुरसा सी बढ़ती महंगाई
कौन हनुमान करेगा लड़ाई?

विकास की दर बढ़ाने की बात
गरीब के पेट पर मारकर लात
विश्व के नक़्शे पर चमकने की चाह
आर्थिक असमानता की नहीं परवाह।

ये कैसा झूठा विकास?
तोड़ कर आम जनता की आस
नेताओं की ये बेवफाई
हाय! मार गयी महंगाई।

By Monika Jain 'पंछी'

(22/01/2013)
 
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Tuesday, January 24, 2017

Essay on Spirituality in Hindi

अध्यात्म ज्ञान, आध्यात्मिक रहस्य लेख. Essay on Spirituality in Hindi. Spiritual Life Science Article, Meditation Power Speech, Spiritualism, Knowledge World.
Essay on Spirituality in Hindi
अध्यात्म : भ्रम व निवारण

1. भ्रम : दुनिया में बदलाव की सोच छोड़कर मुक्ति की इच्छा एक बेहद स्वार्थी विचार है।

निवारण : अक्सर हम लोग दुनिया को बदलने की बात करते हैं। लेकिन दुनिया में परिवर्तन और सुधार के लिए कुछ कर गुजरने की भावना जितनी गहरी होगी वह उतना ही बड़ा अहंकार होगा। आतंकवादी ऐसे ही तो होते हैं न? अपने नजरिये से तो वे भी दुनिया को सुधारने में ही लगे हैं। माया सिर्फ बिगाड़ने के नाम पर हम पर हावी नहीं होती, यह सुधारने के नाम पर भी हम पर हावी हो सकती है। बाकी यह ब्रह्माण्ड और इसका बोध इतना गहरा और विशाल है कि न तो हमारे किये कुछ होता है और न ही हमारे न करने से कुछ होता है। सम्पूर्ण तंत्र है यहाँ और जब सम्पूर्ण तंत्र काम करता है तो कोई जीव विशेष कर्ता रह ही नहीं जाता क्योंकि कार्य-कारण की एक अनन्त श्रृंखला चलती है। समष्टि को छोड़कर केवल व्यष्टि को भी स्थूल रूप से हम देखें तो हमारे शरीर के जो सबसे महत्वपूर्ण कार्य हैं उन पर हमारा कोई भी नियंत्रण नहीं। सूक्ष्म रूप से देखेंगे तब तो और भी बहुत कुछ नज़र आ जाएगा। ऐसे में ‘मेरे करने से ही होगा’ और ‘मेरे न करने से ही होगा’ दोनों में ही कर्ता भाव है। अकर्ता न ‘करता है’ और न ही ‘नहीं करता है’। अकर्मण्यता (आलस) और अकर्ता हो जाने (परम/सम्पूर्ण के प्रति समर्पण) में जमीन-आसमान का अंतर है। आध्यात्मिक प्रक्रिया चेतना को ब्रह्मांडीय चेतना के साथ एकाकार करती जाती है ऐसे में बस होता है : सहज, सरल, प्रवाहमय! और जो भी होता है वह उस बोध के अनुपात में सही होता है। इसलिए सबसे बड़ी सेवा मुक्त होना ही है या सबसे बड़ा सुधार आत्म सुधार ही है। हाँ, समाज सुधार इसका परिणाम अवश्य होगा। यह तो हम सबका अनुभव होता ही है। बचपन से ही अपनी क्षमता और परिस्थितियों के अनुरूप परिचित-अपरिचित सभी की जितनी और जिस भी तरह से मदद करने में सक्षम हूँ मदद करने को तत्पर रही हूँ। कई व्यक्ति जो जीवन में जुड़ते हैं, वे कहकर भी जाते हैं कि आपसे जुड़कर जीवन में बहुत सकारात्मक परिवर्तन हुए हैं या जीवन में हमेशा याद रहोगी। हाँ, बंधने और बाँधने में कभी अधिक रूचि रही नहीं। जिसके कारण अक्सर वह मदद लोगों द्वारा विस्मृत हो जाती है। लेकिन जहाँ-जहाँ मोह वश मैंने रूचि ली, वहां भी कभी अच्छे परिणाम मिले नहीं तो एक स्वतंत्र मैत्री भावना सबसे बेहतर लगती है। जिसकी खासियत यह है कि यह सारे प्राणियों से स्थापित की जा सकती है। जितना किसी भी प्राणी के लिए कुछ कर सको उतना करो (स्वयं और उसे मोह से मुक्त रखते हुए) और अब तो यह भी समझने लगी हूँ कि हमारा किया कुछ भी हमारा कहाँ होता है? जो भी हमें मिला है वह इसी संसार से मिला है। हाँ, अहंकार के क्षणों में हम यह बात विस्मृत कर जाते हैं। और अफ़सोस यह है कि हमारा अधिकांश जीवन इन्हीं क्षणों (मैं, मेरा) में ही बीतता है। बाकी जिस क्षण किसी को परम मिलना शुरू होता है, उस क्षण से ही उसका बांटना शुरू हो जाता है। वह नहीं बांटेगा तो परम से भी दूर ही रहेगा। हाँ, एक जाग्रत व्यक्ति दुनिया को क्या और किस तरह बाँटता है इसे भौतिक दृष्टि वाले व्यक्ति नहीं समझ सकते। हाँ, उस मदद में जितनी मात्रा में वस्तुएं और पैसे होंगे वह तो उन्हें नजर आ जाएगा, बाकी नहीं नज़र आएगा। यहाँ एक बात और कि अधिकांश व्यक्ति जब भी पढ़ते हैं तो पूर्ण आदर्श बातों को किताबी बातें मानकर उपेक्षित कर देते हैं। लेकिन कोई भी आदर्श सिर्फ इतना बताता है कि अभी आपके पास आत्मिक विकास के लिए बहुत-बहुत लम्बा रास्ता है। कम से कम हम चलना तो शुरू करें

2. भ्रम : मुक्ति पलायन है।

निवारण : मुक्ति क्या है...इसे बस वही समझ सकता है जिसने कभी निर्दोषिता के आनंद को चखा हो। यह पलायन नहीं! पलायन तो संसार है, बंधन है। अपने मूल स्वभाव की ओर लौटना पलायन नहीं होता। हाँ, उससे दूर जाना और भटकना जरुर होता है। महावीर, बुद्ध जैसे कई महात्माओं के वन या हिमालय गमन को पलायन कहा जाता है। लेकिन किसी बीमारी से स्वास्थ्य की अवस्था तक पहुँचने के लिए जैसे कुछ परहेजों की जरुरत होती है। इसी तरह कषायों (मन के संस्कारों) से निर्दोषिता तक पहुँचने के लिए भी परहेज की जरुरत है। साधना को सुरक्षित रखने के लिए कुछ बचाव जरुरी होते हैं। जिसे आत्मबोध हो चुका है उसे तो कुछ भी प्रभावित नहीं कर सकता, लेकिन उससे पूर्व तो प्रभावों से ऊपर उठने के लिए प्रभावों से बचना भी होगा। यह केवल व्यक्तिगत हित की बात नहीं है, यह व्यापक हित की ही बात है। क्योंकि किसी के प्रभाव में आप अपने गुण-स्थान (अपनी चेतना के स्तर) से एक कदम भी नीचे सरके तो यह सिर्फ आपके लिए नुकसानदायक नहीं होगा, यह जीव मात्र के लिए नुकसानदायक है। सुसंगति और कुसंगति के असर की बातें इसलिए ही कही जाती है। बाकी हर महावीर और हर बुद्ध आत्मबोध के बाद अगर उनकी आयु शेष हो तो संसार के उद्धार के लिए वापस आते ही हैं। महावीर और बुद्ध ने तो 40 वर्षों तक यही काम किया। कोई न भी आये तब भी उससे इस प्रक्रिया तक बहुत कुछ हो चुका होता है।

हाँ, मुक्त होने के रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं। अगर आपको पता चले कि जिस व्यक्ति/प्राणी से आप लड़ने वाले हो वह आप ही हैं तो तो या तो आप नहीं लड़ोगे जो कि बुद्ध और महावीर का मार्ग (अहिंसा) है, या फिर लड़ोगे लेकिन जीत और हार (फल) के प्रश्न को बिल्कुल दरकिनार रखकर बस उस क्षण की जरुरत को समझकर...जो कि कृष्ण का मार्ग है (कर्मयोग)। कहने को तो कृष्ण को भी रणछोर कहा जाता है। तो क्या करना है और क्या नहीं यह उस व्यक्ति के उस क्षण की जागरूकता, परिस्थितियों और समझ पर निर्भर करता है। एक मार्ग भक्ति भी है। कर्म-कर्म करने वालों को (जो कि निष्काम कर्म या कर्मयोग के जरा भी आसपास नहीं फटकते, क्योंकि जो फटकेगा वो तो चिड़ सकता ही नहीं) उन्हें भक्ति, ध्यान और ज्ञान में रत साधकों जैसे मीरा, महावीर, बुद्ध आदि से बेहद चिड़ होती है। लेकिन, जो बहुत आलसी हों उनसे वास्तविक भक्ति, ध्यान और साक्षी की साधना भी नहीं हो सकती। अध्यात्म में भिक्षु बन जाना (भिखारी नहीं) कोई छोटी बात नहीं। कोई आजीवन ध्यानमग्न बैठा हो वो भी एक असंभव के निकट सी बात है। सामान्यत: जो सबसे सरल और सबसे सहज होते हैं वहीँ भक्तिमय हो पाते हैं। अर्थात् भक्ति सबसे सरल प्राणियों का मार्ग है। (यह भक्ति वह वाली भक्ति नहीं जो फेसबुक पर कटाक्ष करने के लिए प्रचलित है। उससे इसका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं। और वह भी नहीं जिसमें दिन-रात गाड़ी, बंगला, कार, पैसे, नौकरी...आदि मांगी जाती रहती है।) भक्ति के बाद ज्ञान थोड़े जटिल (जिज्ञासुओं) का मार्ग है और कर्मयोग (सेवा) थोड़े और जटिल व्यक्तियों का मार्ग है। इसके बाद बचे दुनिया के 99.99 % लोग जो सबसे अधिक जटिल होते हैं। जिन्हें अपने बंधनों का पता ही नहीं होता और ताउम्र उनकी अंधी दौड़ पद, सम्मान, पैसे, प्रतिष्ठा, शोहरत, मनोरंजन आदि के नाम पर बस बाहर की ओर होती है। उन्हें खुद तो कभी कुछ नहीं मिलता (मिलता होता तो दौड़ थम चुकी होती) लेकिन दूसरों को भी इसी दौड़ में शामिल कर लेना चाहते हैं। यहाँ यह समझना जरुरी है कि ज्ञान, भक्ति और कर्म के मार्ग में बहुत कुछ ओवरलैप भी करता रहता है। मतलब किसी भी व्यक्ति का मार्ग इन सभी के मिश्रण से ही बनता है, बात बस प्रधानता की हो जाती है। जो व्यक्ति आजीवन ध्यानमग्न है उस व्यक्ति ने तो इस सृष्टि के जीवमात्र को प्रेम, मुक्ति और अहिंसा दी है (बिल्कुल जैसे परमात्मा द्वारा हमें प्राप्त है।) वह तो परम तत्व के बहुत निकट है। शब्द, कार्य, उपदेश ये सब तो बहुत स्थूल चीजें हैं। जो सबसे मूल तत्व है (प्रेम या अहिंसा) वह तो बहुत सूक्ष्म बल्कि अदृश्य है। मुख्य कार्य तो वही करती है। इसलिए ही यह होता है कि बहुत से योगियों के पास हिंसक से हिंसक पशु-पक्षी भी अपनी हिंसा छोड़ देते हैं (अभी भी कई उदाहरण हम देखते ही हैं)। उनकी ऊर्जा का प्रभाव है। जैसे महावीर जिस रास्ते चलते थे वहां सामान्यत: बहुत लम्बी दूरी तक तक कोई हिंसक घटना नहीं होती थी। अजगर भी एकदम शांत और आनंदित होकर बैठ जाता था। इस दुनिया में जितना भी मोह रहित निस्वार्थ प्रेम है वह उन्हीं व्यक्तियों का परिणाम है जो-जो जिस-जिस मात्रा में मुक्त हुए हैं या परम के निकट हैं। यहाँ एक चीज बता देना आवश्यक है कि बाहरी आडम्बरों और क्रियाकलापों से यह आवश्यक नहीं है कि किसी के भीतर को भी पहचाना जा सके। कोई संसारी नज़र आते हुए भी भीतर मुक्त (अनछुआ) हो सकता है और कोई बहुत ज्यादा धार्मिक/आध्यात्मिक नज़र आते हुए भी गहरे बंधन में हो सकता है। बेहतर है आत्मनिरीक्षण की एक प्रणाली हम विकसित करें। जिस भी व्यक्ति (कुछ और भी हो सकता है) की निकटता में हममें निर्मलता, निच्छलता, शांति और सुकून बढ़े, वह फिर बाहर से कैसा भी नजर आये कोई फर्क नहीं पड़ता, उसे अपना गुरु/मित्र जानिये

3. भ्रम : अध्यात्म कामचोरों का काम है।

निवारण : कामचोरों के लिए नहीं है अध्यात्म। वास्तव में जो क्षमता होते हुए भी बहुत अधिक आलसी और अकर्मण्य हों, वह तो आध्यात्मिक हो ही नहीं सकता। हाँ, अध्यात्म हमें पसंद और नापसंद (सभी तरह के भेदों) से ऊपर उठाता है। लेकिन इसका मतलब यह जरुरी नहीं कि आप सारे ही तरह का काम करें। क्या करना है और क्या नहीं यह हमारे बोध और परिस्थितियों पर निर्भर करता है और उसी अनुरूप हमारे श्रम की दिशा और रूप तय होता है। फिर चाहे आप झाड़ू लगा रहे हों या किसी अन्तराष्ट्रीय संस्था में भाषण दे रहे हों या बैठकर ध्यान कर रहे हों अगर समर्पण है (कार्य के दौरान फल और अहंकार की विस्मृति) तो सभी क्रियाएं आध्यात्मिक हो जाती है। समस्या दुनिया के साथ यह है कि यहाँ कर्म का मतलब ही बस यही है कि उससे कितना पैसा, कितनी इज्जत, कितना सम्मान मिलेगा या फिर अहंकार को कितनी तृप्ति मिलेगी। हमारे घर में सामान्यत: सभी घरेलु कार्य खुद ही किये जाते हैं। किसी सहायक को रखना कम ही होता है। बचपन से ही पढ़ाई के साथ-साथ ढेर सारी अतिरिक्त गतिविधियाँ जीवन में समय-समय पर जुड़ती चली गयी। हाँ, जहाँ तक घरेलु कामों की बात है तो कुकिंग को छोड़कर बाकी कामों में रूचि नहीं थी। आते सभी थे। बहुत जरुरत होने पर किये भी जाते रहे। लेकिन फिर भी तुलना तो थी ही। लेकिन पिछले कुछ समय में मैंने जो अंतर महसूस किया है वह यह है कि कई बार ऐसा हुआ है जब मुझे चाहे लेखन से सम्बंधित कोई काम करना हो, पढ़ना हो, पढ़ाना हो, कोई असाइनमेंट, कोई भी अन्य रचनात्मक कार्य, झाड़ू लगाना हो, बर्तन साफ़ करने हो, कपड़े धोने हो, खाना बनाना हो, कोई अनाज साफ़ करना हो, खेलना हो या कोई भी अन्य काम...इन्हें करने के दौरान मैंने कोई विशेष अंतर महसूस नहीं किया। बल्कि कभी-कभी तो तिल, सौंफ साफ़ करते समय या झाड़ू लगाते समय भी बहुत सुकून दायक लगा है। हालाँकि मैं बहुत आध्यात्मिक नहीं हूँ ( बहुत शुरूआती स्तर समझ सकते हैं) लेकिन कुछ इतनी विलक्षण अनुभूतियाँ हैं कि यह स्वत: ही अपनी ओर खींचता है। उत्कृष्टता किसी कृत्य की मोहताज नहीं। और अध्यात्म कामचोरों का नहीं हरफनमौलाओं का क्षेत्र है। 


4. भ्रम : भूख, गरीबी, बेरोजगारी जैसी समस्यायों के रहते अध्यात्म एक मजाक जैसा है।

निवारण : भूखे पेट को समस्या किसने बनाया? भूखे मन ने। वरना क्या संसार में कुछ कमी थी खाने-पीने की? कुछ लोगों के मन की भूख ने बाकियों के पेट को भी न भरने दिया। और मन की यह भूख सिर्फ जरुरत लायक कुछ पैसों, घर, कपड़ों तक सीमित नहीं...बात नाम, शोहरत, इज्जत, देशों-प्रदेशों के नाम पर धरती और संसाधनों पर अधिकार... न जाने कहाँ-कहाँ तक पहुँचती है। और यह भूख ऐसी है कि मिटने का नाम लेती ही नहीं। इंसान मिट जाता है लेकिन यह भूख नहीं मिटती। मुझे बड़ा ताज्जुब होता है जब पेट की इस भूख का नाम लेकर अध्यात्म पर व्यंग्य किया जाता है। भई! अध्यात्म मन की भूख मिटाने का ही साधन है। यह आपके पेट के खिलाफ कहीं से भी और किसी भी तरह नहीं है। यह बात अलग है मन की भूख मिटने पर कुछ लोगों (अपवाद) के पेट की भूख भी गायब हो जाती है। बड़े भयंकर भ्रम है अध्यात्म को लेकर। पूर्वाग्रही मत बनिए, जिज्ञासु बनिए। भारत जिज्ञासुओं और खोजियों की भूमि के लिए ही जाना जाता रहा है। बाकी वास्तव में आध्यात्मिक जो भी होगा उसके द्वारा किसी न किसी न रूप में, कहीं न कहीं स्वत: ही समष्टि का कल्याण हो ही रहा होगा। वह हर सूचना आप तक पहुंचाए यह जरुरी नहीं। सच तो यह है कि वह अगर आजीवन एक जगह मौन बैठा हो तब भी यह कल्याण होगा। आप कितने भी बड़े जासूस हों तब भी नहीं समझ पायेंगे कि कैसे? समझने के लिए आपको इस तल पर उतरना ही होगा और अपनी दृष्टि को व्यापक भी करना होगा।  


By Monika Jain 'पंछी'

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Monday, January 23, 2017

Poem on Fear in Hindi

प्यार में डर कविता, भय शायरी, उलझन, अविश्वास, प्रेम, भरोसा. Poem on Fear in Hindi. Confusion in Love Poetry, Lack of Self Trust Rhymes, Relationship Phobia.
Poem on Fear in Hindi
उलझन

कितनी अजीब बात है न!
तुम कहते हो, तुम्हें डर लगता है
कि क्या तुम मुझे खुश रख पाओगे।
और मैं कहती हूँ, मुझे डर लगता है
कि क्या मैं तुम्हें खुश रख पाऊँगी।

हमारा ऐसा सोचना क्या दर्शाता है?
यह कि हमें एक दुसरे पर ज्यादा भरोसा है
या यह कि हमें खुद पर विश्वास नहीं।
यह कि हमें एक दूसरे की ज्यादा परवाह है
या यह कि हमें अपने प्यार पर एतबार नहीं।

एक अजीब सी उलझन में हूँ -
सुना है जहाँ प्यार होता है वहाँ डर नहीं होता
और जहाँ डर है वहाँ प्यार नहीं
इसलिए डरती हूँ हमारे इस डर से
कि कहीं यह हमारे प्यार पर हावी न हो जाये।

By Monika Jain 'पंछी'
(22/01/2013)

Saturday, January 21, 2017

He She Conversation in Hindi

दो दोस्तों के बीच बातचीत, लड़का लड़की संवाद. He She Conversation in Hindi. Talks Between Girl & Boy, Two Friends Cute Funny Discussion, Lovely Convos, Chit Chat.
He She Conversation in Hindi
(1)

He : किसी के इश्क में होना रूई के फाहों के बीच होने जैसा है।

She : और खुद इश्क होना रूई का फाहा होना है। :)

 
(2)

He : तुम नदी हो।

She : डूब जाओगे। नाव का इंतजार करो।

He : तुम नदी और नाव दोनों हो।

She (मन ही मन में) : अब क्या बोलूं? :p

 
(3)

He : तुम्हारी बातें बहुत हाई लेवल की होती है। ज्यादा नहीं पच पाती।

She : इसलिए तो तुम्हें बोलने को कहती हूँ। तुम अपने लेवल की बात करो।

He : क्या बात करूँ, तुम ही बताओ।

She : मैं तो अपने लेवल की ही बताऊंगी न? अच्छा, तुम तो मुझे हमेशा बच्ची कहते हो। तो पहले तुम ये डीसाइड करो कि मैं हाई लेवल की हूँ या बच्चों के लेवल की।

He : तुम हाई लेवल की बच्ची हो। :p :D

 
(4)

He : दुनिया और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को छोड़कर मुक्ति की इच्छा एक बेहद स्वार्थी और अश्लील विचार है।

She : जितना मेरे नन्हें से दिमाग ने अब तक जाना है, आप दुनिया और अपने लिए इससे बेहतर कुछ भी नहीं कर सकते कि आप अपनी ओर से दुनिया में उत्पन्न प्रतिरोध (शारीरिक-मानसिक, प्रकट-अप्रकट) को न्यूनतम कर दें। अपनी जरूरतों और आवश्यकताओं को सीमित से सीमित कर दें। कुछ लोग आत्महत्या (जो कि आवेश में की जाती है) की सलाह देंगे। पर अफसोसजनक बात यह है कि वह प्रतिरोध को कम नहीं करता, वह तो बढ़े हुए प्रतिरोध का सूचक है।) क्योंकि इस दुनिया में कुछ भी खत्म नहीं होता। वह सिर्फ रूप बदलता है। बाकी किसी के मुक्त होने और मुक्त होने तक की प्रक्रिया स्वत: ही दुनिया के लिए बहुत कुछ कर जाती है।

 
(5)

कुछ आरोप इतने मासूम होते हैं कि उन्हें पढ़ते ही सबसे पहले सहज मुस्कुराहट आती है। :)

He : आपका कोई पोस्ट हटाना उस पोस्ट पर आये विचारों की हत्या है।

She : भई...हो सकता है मैं तो किसी दिन अकाउंट भी डिलीट कर दूँ। तब तो मैं बहुत बड़ी हत्यारण बन जाऊँगी। :)

 
(6)

He : कैसी हो?

She : अच्छी हूँ।

He : जब देखो तब बस अपनी तारीफ़ करवा लो।
:p :D

 
(7)

He : सलमान खान बाइज्जत बरी हो गया।

She : Who is Salman Khan?

Moral of the Story : इज्जत (जिन चीजों को दुनिया मुख्य रूप से देती है), उतनी ही दो जितनी बरी होते देखी जा सके और अफ़सोस न हो। बड़े और छोटे के भेद जितने गहरे होंगे परिणाम वैसे न होंगे तो और कैसे होंगे?

Thursday, January 19, 2017

Poem on Home in Hindi

घर की याद पर कविता, मेरा मकान शायरी. Poem on Home in Hindi for Kids. Missing My Sweet House Poetry, Homesickness Nursery Rhymes, Household Lines, Residence.
Poem on Home in Hindi

अपना घर है सबसे प्यारा

घर से निकली पंख पसार
देख लिया सारा संसार
उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम
कर आई चहुँ ओर भ्रमण।

सुन्दर था जग का हर कोना
फिर भी मुझको पड़ा लौटना
सुन्दरता जग की ना भायी
घर की मुझको याद सताई।

नैना मेरे थे बेचैन
घर लौटी तब आया चैन
माना मेरे दिल ने यारा
अपना घर है सबसे प्यारा।

By Monika Jain 'पंछी'

 
Watch/Listen the video of this poem about home : 


Monday, January 16, 2017

Funny Quotes in Hindi

चुटकुले, हास्य उद्धरण. Funny Quotes in Hindi. Comic Dialogues, Laughing Status, One Liners Jokes, Comedy Lines, Laughter Messages, Sayings, Comments, Sentences.
Funny Quotes in Hindi
Funny Quotes

  • 'स्टेप हेयर कट' के लिए माँ कहती है - चूहों ने बाल कुतर दिए हो जैसे। :p ~ Monika Jain ‘पंछी’ (11/01/2016) 
  • बच्चे के रूप में करीब-करीब ईश्वर ही जन्म लेता है। फिर माता-पिता और समाज उसे बिगाड़ने का कार्य करते हैं। :p ~ Monika Jain ‘पंछी’ (29/12/2016) 
  • कुछ लोगों को आपकी पोस्ट्स इतनी पसंद आती है, इतनी पसंद आती है, इतनी पसंद आती है कि वे उसे अपनी ही बना लेते हैं। उनके लिए यह स्वीकार करना संभव ही नहीं होता कि यह उन्होंने नहीं लिखी है। :) ~ Monika Jain ‘पंछी’ (21/12/2016) 
  • एक ज़माने में मैं इतनी बुद्धू थी (अभी भी कम नहीं :p ) कि एक दोस्त ने मेरे मजे लेने के लिए मुझसे कहा, 'हमारे यहाँ पर बेस्ट फ्रेंड को मुर्गीचोर कहा जाता है।' मैंने थोड़ा संदेह जताया तो उसने कहा, 'चाहो तो किसी और से पूछ लो!' और मैं आराम से वहीँ पर रहने वाले एक कॉमन फ्रेंड से पूछ भी आई कि क्या आपके यहाँ बेस्ट फ्रेंड को मुर्गीचोर कहते हैं? ~ Monika Jain ‘पंछी’ (27/09/2016) 
  • अपने घर में मैं नास्तिक समझी जाती हूँ। मेरी जन्मकुंडली में लिखा है मैं बहुत बड़ी धर्मात्मा बनूँगी और यहाँ फेसबुक पर शायद आध्यात्मिक समझते हैं मित्र। और फिर मैंने इनमें से कुछ भी बनना कैंसिल कर दिया। :p :) ~ Monika Jain ‘पंछी’ (30/08/2016)  
  • मित्र के सालों पुराने नंबर पर कॉल करने...जो कुछ सालों तक बंद रहकर अब किसी ख़तरनाक लड़की :p का नंबर हो चुका हो। जहाँ सामने वाली आपको कोई और लड़की (रिमझिम) समझ रही है (जिससे उसका 36 का आँकड़ा है शायद) और आप उसे मित्र की वाइफ समझ कर बहुत सहजता से बात कर रहे हैं। तब इस ख़तरनाक ग़लतफ़हमी के बीच कुछ अज़ब वार्तालाप के साथ-साथ उसका कहना, 'देखो! तुम इतनी ज्यादा स्वीट मत बनो।'...मुझे रह-रहकर अभी तक हंसी आ रही है। :D अच्छी-खासी आवाज़ का इस तरह से कचरा भी हो सकता है। :'( मन कर रहा था उसे कह दूँ, मैं स्वीट बन नहीं रही...आलरेडी स्वीट हूँ। :p ;) ~ Monika Jain ‘पंछी’ (21/08/2016) 
  • हमारी शिक्षा प्रणाली इतनी बोरिंग है कि बच्चे यह तक कहते पाए जाते हैं कि काश! बाढ़ आ जाए तो स्कूल ही नहीं जाना पड़ेगा। :D ~ Monika Jain ‘पंछी’ (04/09/2016)  
  • बच्चों का स्वागत और बच्चों द्वारा स्वागत आज भी दरवाजे के पीछे छिपकर 'हो' से ही होता है। :p :) ~ Monika Jain ‘पंछी’ (18/08/2016)  
  • जिन्हें शब्दों से अति प्रेम हो या फिर जिनके लिए चर्चा सिर्फ हार या जीत का प्रश्न हो उनके साथ चर्चा में पड़ना मतलब ’आ बैल मुझे मार!’ :p ~ Monika Jain ‘पंछी’ (01/12/2015)  
  • किचन एक्सपेरिमेंट के नाम पर किसी ने कहा, 'आप आलू-मुर्गा बना लो।' हमने कहा, 'आलू हम बना लेंगे, आप मुर्गा बन जाना।' :o :p ~ Monika Jain ‘पंछी’ (07/12/2015)  
  • काहें का 'फ्रीडम 251'! सबको तो गुलाम बना छोड़ा है। इत्ते तो अभी शक्ल भी नहीं देखी ढंग से। अफवाहों का बाज़ार भी गर्म है। वैसे टेंशन न लो कोई। कुछ ठीक न रहा तब भी बच्चों के खेलने के काम तो आ ही जाएगा। :p ~ Monika Jain ‘पंछी’ (19/02/2016) 
  • न सोयेंगे और न सोने देंगे वाले प्राणियों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है। :’( ~ Monika Jain ‘पंछी’ (07/11/2016)

Thursday, January 12, 2017

Small Story in Hindi with Moral

व्यक्तित्व पर कहानी, दान की महिमा कथा, मनुष्यता, मानवता, चरित्र. Small Story in Hindi with Moral for Kids. Donation, Personality, Character, Humanity Tales.
Small Story in Hindi with Moral
 (1)

दान की महिमा

वैशाख महीने की भीषण गर्मी में एक बार महाकवि कालिदास किसी कार्यवश भयानक जंगल में पहुँचे। उन्होंने वहां एक रुग्ण व्यक्ति को देखा। वह फटेहाल था। वह चल रहा था किन्तु भूमि इतनी तपी हुई थी कि उससे चला नहीं जा रहा था। मुंह से आह निकल रही थी। इसे देखकर महाकवि पसीज गए। उसे उठाकर एक वृक्ष के नीचे रख दिया और अपने पदत्राण भी उसे दे दिए और वे औषधि लाने चल पड़े। वे कुछ चले ही थे कि एक महावत हाथी लेकर आ रहा था। महाकवि को देखकर उसने उन्हें हाथी पर बिठा लिया। राजा भोज ने कालिदास को हाथी पर आरूढ़ देखा तो पूछा- हाथी पर कैसे बैठे हो? कवि ने कहा - ‘जो व्यक्ति नहीं देते, उनकी संपत्ति नष्ट हो जाती है’।


Source : स्वाध्याय सन्देश

(2)

व्यक्तित्व

जब विवेकानंद जी विश्व शिकागो धर्म सम्मलेन में भाग लेने के लिए शिकागो (अमेरिका) गए तो उनके साफे और भगवा वेशभूषा को देखकर एक महिला ने खिल्ली उड़ाई और पूछा - यह क्या है? स्वामी जी हाजिर जवाब थे। उन्होंने तुरंत कहा, ‘मैडम! यह आपका देश है जहाँ दर्जी व्यक्तित्व का निर्माण करता है पर हमारे देश में चरित्र व्यक्तित्व का निर्माण करता है।’


Source : Unknown

(3)

मनुष्यता का रिश्ता

रूस में सड़क के किनारे एक मेजर खड़े-खड़े शराब पी रहा था। तभी वहां एक आदमी आया जो अपने कपड़ों से ग्रामीण लग रहा था। उसने मेजर से किसी स्थान का पता पूछा। मेजर के अहंकार को ठेस लगी। उसने सोचा, ‘एक साधारण से आदमी की हिम्मत कैसे हुई कि उससे बात करे।’

मेजर कुछ बोला नहीं, बस उंगली के इशारे से उस जगह का पता बता दिया। पर वह व्यक्ति वहीँ का वहीँ खड़ा रहा। इससे मेजर को गुस्सा आ गया। वह बोला, ‘अब जाते क्यों नहीं?’

व्यक्ति ने कहा, ‘जा रहा हूँ। बस ये जानना चाहता था कि आप किस पद पर कार्यरत हैं?’

मेजर अहंकार से हँसते हुए बोला, ‘तुम खुद ही अनुमान लगाओ।’

ग्रामीण व्यक्ति ने कहा, ‘आप जरुर केप्टन होंगे?’ मेजर ने ना में सिर हिलाया। ‘तो आप लेफ्टिनेंट होंगे?’ ग्रामीण ने कहा। मेजर ने फिर से इनकार में सिर हिलाया। ग्रामीण बोला, ‘तब तो आप मेजर होंगे?’ मेजर ने खुश होकर कहा, ‘हाँ, तुमने सही पहचाना।’

ग्रामीण व्यक्ति ने मेजर को सलाम किया तो मेजर को संतोष हुआ। ग्रामीण व्यक्ति बोला, ‘आप बता सकते हैं कि मैं कौन हूँ?’

मेजर ने उसे हिकारत भरी नजर से देखते हुए कहा, ‘तुम गाँव के चोकीदार वगैरह होंगे।’ ग्रामीण ने ना में सर हिलाया। मेजर ने पूछा ‘सिपाही?’ ग्रामीण ने कहा, ‘उससे ऊपर।’ मेजर ने आश्चर्य से पूछा ‘कैप्टन?’ ग्रामीण ने कहा, ‘उससे भी ऊपर।’ इस तरह बात जनरल तक पहुँच गयी। ग्रामीण ने कहा, ‘मैं जनरल से भी ऊपर यहाँ का राजा हूँ।’

मेजर का नशा टूटा। उसने राजा को सलाम किया।

राजा ने कहा, ‘मेजर बनकर तुम यह भूल गए कि सबसे पहले तुम एक मनुष्य हो। मैं भी एक मनुष्य हूँ। कोई चाहे किसी भी पद पर कार्यरत हो पर मनुष्यता का रिश्ता सबसे बड़ा है।’

मेजर को अपने व्यवहार पर पछतावा हुआ। उसने राजा से माफ़ी मांगी।


Source : Unknown

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Wednesday, January 11, 2017

Poem on Basant Ritu in Hindi for Kids

बसंत पंचमी पर कविता, ऋतुराज वसंत गीत, मधुमास शायरी. Poem on Basant Ritu in Hindi for Kids. Spring Season Rhymes Lines, Vasant Panchami Festival Slogans, Poetry.
 Poem on Basant Ritu in Hindi for Kids

ऋतुओं की रानी है आई

ऋतुओं की रानी है आई
धानी चुनर अपने संग लायी
जिसे ओढ़ धरती मुस्काई
कण-कण में उमंग है छायी।

डाल-डाल नव पल्लव आया
जैसे बचपन फिर खिल आया
रंग-बिरंगे फूलों पर
देखो! भँवरा फिर मंडराया।

तितली भी मुस्काती है
बहती हवा बासंती है
नील गगन में उड़ते पंछी
के मन को हर्षाती है।

रंग-बिरंगे फूल खिले हैं
पीले, लाल, गुलाबी, हरे हैं
कोयल की कूंकूं के संग
स्वर गीतों के भी बिखरे हैं
स्वर गीतों के भी बिखरे हैं।

By Monika Jain 'पंछी'

(19/03/2013)

Watch/Listen the video of this poem about Spring Season (Basant Ritu) in my voice :


Friday, January 6, 2017

Essay on Happy New Year Resolution in English

Essay on Happy New Year Celebration in English. How to Celebrate Ideas, Resolution Goals, Making a Difference Speech, Change The World Article, Paragraph.
Essay on Happy New Year Resolution in English

Ushering in New Year…

Every year goes by with its own share of highlights, problems, solutions and events. Most of us get so caught up in our daily lives, in our regular routines, that we do not realize how similar each year becomes to the other. Be it our education, our families, our friends or our jobs, we often end up ignoring the bigger things in life. We often forget to make a difference, and we are almost always too busy to do so.

This year, however, we can make it a different year by going out and making a difference by ourselves. Issues such as poverty, climate change and pollution are not really beyond our control. We can all make small changes, and each person’s contribution is very valuable. Every person taking initiative will be changing a small part of the life as we know it.

We often feel the need to feed the street children and to distribute clothes and other necessities to them, only on special occasions. Instead, saving up a little bit of money being spent on luxury buys can be given to a particular needy person out on the streets, or the contribution can go to a good NGO which is trustworthy.

We can start trying to be conscious about littering the streets by always making sure that we throw our trash into the dustbins. We can also start trying to convince other people to do the same. Even convincing family members and close friends will make a huge difference.

We can start teaching the under-privileged children. Teaching even one child can make a huge difference in his/her life. That child will be able to read and write in basic english, which will give him/her a job which can keep her off the streets.

There are so many such things which do not take much effort to do, but which can create change. These changes might look very small initially, but every large place is large only because it has many small places contained within it, and these small changes will slowly spread if one is persistent enough.

There are a lot of issues which need to be rectified in our country. Apart from the inequality between genders, there is also widespread poverty, immense pollution, and a lot of political disturbance. It is the initiative of courageous individuals which can help remove these issues from our society today. It requires a lot of courage, it requires a lot of dedication, and it also requires the willpower to help others. Even if we cannot change the world altogether, starting off this year with baby-steps such as keeping your neighborhood clean, or teaching basic english to a single underprivileged street-urchin can have an impact. And as these changes start bearing fruit, more changes will follow. All that we really need to have is hope, and the dedication to make a difference in this world. This is a far better way of starting off the New Year, than by sitting and complaining about the problems all around us.

Guest post from www.glad2bawoman.com
(01/01/2013)

Glad2bawoman is an online media company with a growing community of over 75,000 members. For women and about women, the articles on the site encompass a variety of topics including Health, Empowerment, Leisure, Fashion and Relationships. Wish you all a very Happy New Year :)

Thursday, January 5, 2017

Illusion Quotes in Hindi

मिथ्या भ्रम, मोह माया. Life is an Illusion Quotes in Hindi. Moh Maya, Bharam, Illusionist, Illusioned, False Sayings, Delusion Status, Hallucination Quotations.
 Illusion Quotes in Hindi
 Illusion Quotes

  • समस्या हमारी कट्टर धारणाएं व भ्रम होते हैं। नाम कुछ भी दिया जाए उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। दृष्टि में अगर भेद न हो तो शब्द क्या कर सकते हैं? हाँ, किसी शब्द के साथ बहुत ज्यादा नकारात्मक भाव जुड़ गए हो तो उससे बचा जा सकता है, पर शब्द मिटा देने मात्र से दृष्टि का भेद मिट नहीं सकता। उसके लिए किसी और ही रूपांतरण की जरूरत होती है। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (29/12/2016) 
  • हम हर चीज को वर्गीकृत कर लेना चाहते हैं और यह नहीं देख पाते कि वर्गीकरण कितना बड़ा भ्रम है। भाषा और मन द्वैत में ही जीते हैं, यह सही है लेकिन मन की इस प्रकृति को समझ लेना भी तो जरुरी है। ~ Monika Jain ‘पंछी’  
  • भ्रम के बीज बोये जाते हैं और बोये जाते रहेंगे। बात बस इतनी है कि इनसे फैली कंटीली झाड़ियों की खरोंचों से हम अपने प्रेम और विश्वास को कैसे बचा पाते हैं। क्योंकि किसी एक के भी विश्वास पर आई खरोंचों की कीमत कहीं ना कहीं पूरी मानवता को चुकानी पड़ती है। काश! कुछ लोग ये समझ पाते। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (10/02/2015) 
  • अच्छी खासी 'वर्ड पोस्ट' पर जब कोई 'नाइस पिक', 'लवली पिक', 'ब्यूटीफुल पिक' लिख जाता है तो बहुत बेइज्जती टाइप फील होता है। और जब कोई लेख और कहानी को बिना पढ़े ओवरकांफिडेंस में 'अच्छी कविता' बता देता है तो फिर मन करता है एक कविता उसी पे लिख डालूं 'अच्छी वाली'! कभी-कभी कुछ पढ़ भी लिया करो प्यारों! लेखक होने का जो भ्रम पाल लिया है उसे यूँ निर्दयता से तो न तोड़ो। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (01/12/2015) 
  • अपनी कमजोरियों को तर्कसंगत बताने के स्टेटमेंट खोजे जा सकते हैं।
    दूसरों के गुणों को कमी करार देने के तर्क भी गढ़े जा सकते हैं।
    लगभग हर बात के लिए तर्क तैयार किये जा सकते हैं।
    बस सापेक्षता को समझना...फिर देखना कितने तर्क तर्काभास के ढेर में जा बैठते हैं। :) ~ Monika Jain ‘पंछी’ (29/05/2016) 
  • सब चीजें सापेक्ष लगती हैं। क्रिकेट को समझने के बाद से पहली बार मैंने वर्ल्ड कप क्रिकेट नहीं देखा। हर बार जब देखती थी तो जीत और हार को महसूस करती थी। रोती थी, हँसती थी। इस बार बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया तो कुछ महसूस भी नहीं हुआ। मतलब हमारे आवेग और आवेश प्रेरित होते हैं। क्षणिक होते हैं। क्षण भर के लिए हम अपने आप में सबसे बड़े देशभक्त को जीने लगते हैं, जबकि होता सब कुछ भ्रम ही है। ये जीत और हार भी तो कितना बड़ा भ्रम है।...और इसके साइड इफेक्ट्स! इन्हें यहाँ फेसबुक पर देख-देखकर यह विश्वास पक्का हुआ जाता है। भ्रम जितने जल्दी टूट जाएँ अच्छा है। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (27/03/2015) 
  • हरेक अपनी व्यक्तिगत इकाई को सत्य सिद्ध करने का भ्रमपूर्ण प्रयास करता है। उसे इस भ्रम का ज्ञान अवश्य रहता है, क्योंकि हिंसा की भावना उत्पन्न होने से मनुष्य को कभी आनंद प्राप्त नहीं होता। ~ अमृत लाल नागर / Amrit Lal Nagar

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Wednesday, January 4, 2017

Happy New Year Poem in Hindi

नए साल की शुभकामनाएं कविता, नूतन नववर्ष मुबारक शायरी. Happy New Year Wishes Poem in Hindi. Resolution Poetry Lines, Greetings, Slogans, Rhymes, Sms, Messages. 
 Happy New Year Poem in Hindi
काश! लिखूँ कुछ ऐसा कि...

नये वर्ष की नयी सुबह
नयी कलम और नयी डायरी
काश! लिखूँ कुछ ऐसा कि
मुग्ध हो जाए दुनिया सारी।

खामोश जुबां के शब्द बनूं
टूटे सपनों के टुकड़े चुनूं
काश! लिखूँ कुछ ऐसा कि
भटके अपनों की राह बुनूं।

दीन-दु:खी जन की पीड़ा
हर दिल तक पहुँचा पाऊँ
काश! लिखूँ कुछ ऐसा कि
सबके दिल को छू जाऊँ।

निर्बल का मान बचा पाऊँ
निर्धन की जान बचा पाऊँ
काश! लिखूँ कुछ ऐसा कि
हर दिल को रोशन कर जाऊँ।

जंग लगे दिल के दरवाजों
के तालों को तोड़ सकूँ
काश! लिखूँ कुछ ऐसा कि
सबके दिलों को जोड़ सकूँ

झूठ का पर्दाफाश करूँ
और सच का मैं आगाज़ करूँ
काश! लिखूँ कुछ ऐसा कि
सबके दिलों पे राज करूँ।

प्रकाश की सविता बन जाऊँ
आस की सरिता बन आऊँ
काश! लिखूँ कुछ ऐसा कि
खुद ही कविता बन जाऊँ।

By Monika Jain 'पंछी'
(01/01/2012)

Wish you all a very Happy New Year. Watch/ Listen the video of this poem about new year in my voice :

Sunday, January 1, 2017

Articles on Life in Hindi

जीवन रहस्य निबंध, ज़िन्दगी लेख, रहस्यमयी दुनिया, संसार. Articles on What is Life in Hindi. World Mystery Essay, Universe Mysterious Facts, Speech, Paragraph.
Articles on Life in Hindi

जीवन है बड़ा गहरा

(1)

एक चींटी जिसके कान और आँखें नहीं होती उसके लिए संसार कैसा होगा? उसके लिए तो दृश्य और ध्वनि जैसा कुछ है ही नहीं। एक जानवर जिसके सुनने और देखने की क्षमता हमसे अलग हो उसके लिए यह संसार कैसा होगा? एक पत्थर, पेड़, नदी, चट्टान, सूरज, चन्द्रमा...इन सबके लिए यह संसार कैसा होगा? इन सबका संसार अलग-अलग है जो उनके ही मन और इन्द्रियों के अधीन चल रहा है। ऐसे ही जितनी भी जीव श्रेणियां हैं उनका देखना, सुनना, समझना सब अलग है और यह विभेद बढ़ते-बढ़ते जीवमात्र पर भी लागू हो जाता है। यह संसार तो किन्हीं दो मनुष्यों के लिए भी एक सा नहीं होता। चेतना और दृष्टिकोण के हर स्तर पर संसार का स्वरुप बदल जाता है। इसलिए हम कहते हैं जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि या यूँ कहें कि एक ही संसार में असंख्य संसार है। इन्द्रियों और मन से जो नज़र आ रहा है वह तो मात्र प्रक्षेपण है। मतलब इसी दुनिया में ऐसे कई संसार हो सकते हैं जो न हमें दिखाई दे रहे हों, न सुनाई दे रहे हों और न ही हम स्पर्श कर सकते हों। लेकिन जीवन सिर्फ वह नहीं जो किसी को भी अपने मन और इन्द्रियों से नज़र आता है। जीवन इससे परे भी बहुत कुछ है या यूँ कहूँ कि सब कुछ है। जीवन तो बड़ी गहरी चीज है। (16/12/2016)

By Monika Jain ‘पंछी’

(2)

सामान्यतया मैं मंदिर नहीं जाती, पूजा-पाठ नहीं करती, कोई इष्ट देव भी नहीं। किन्हीं संत-महात्माओं के यहाँ भी नहीं जाती, कोई गुरु विशेष भी नहीं। ईश्वर जैसा साकार रूप में अलग से कुछ है, जिसने इस सृष्टि को बनाया है, ऐसा भी नहीं सोच पाती। पर मैं इन सबको सिरे से झुठला भी नहीं सकती। हाँ, समय की मांग के अनुरूप और व्यापक हित में अपने नजरिये से किन बातों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए और किन्हें नहीं, इस पर विमर्श कर सकती हूँ...समर्थन और विरोध कर सकती हूँ। लेकिन आस्तिक-नास्तिक, वाम-दक्षिण, हिन्दू-गैर हिन्दू जैसी श्रेणियों में अपना विभाजन नहीं कर पाऊँगी।

जो परिभाषाएं यहाँ आस्तिकता और नास्तिकता की चलती है उनके अनुसार मैं नास्तिक नहीं हूँ क्योंकि यह समूचा ब्रह्माण्ड, उसकी व्यवस्था, सृष्टि, उस पर जीवन के विविध रंग और रूप, हमारा अपने जन्म और मृत्यु के साथ-साथ कई चीजों पर नियंत्रण का न होना...ऐसी असंख्य बातें हैं जो समर्पण कर देने के लिए पर्याप्त से अधिक है। यह हमारा अहंकार है जो समर्पण कर नहीं पाता। मैं आस्तिक नहीं हूँ क्योंकि ईश्वर को मैं अलग से किसी सृजक या सृष्टा इकाई के रूप में नहीं मान पाती। इसलिए ही किसी रूप या आकार विशेष की पूजा भी नहीं कर पाती। अगर अपने परम तत्व में अवस्थित हो जाने का मार्ग अकर्ता हो जाना है तो अवश्य ही परम तत्व भी अकर्ता ही होगा। 

बाकी मेरे दृष्टिकोण में आस्तिकता और नास्तिकता में कोई अंतर है ही कहाँ? नास्तिक ब्रह्माण्ड को जो स्रोत अकारण और स्वत: मान लेते हैं उसे ही आस्तिक ईश्वर का नाम दे देते हैं। नास्तिक जिन्हें प्रकृति की शक्तियां या ऊर्जा कह देते हैं, उसे ही आस्तिक दैवीय शक्तियां कह देते हैं। अब उसी ऊर्जा को जब हम मानव कह देते हैं, पशु-पक्षी कह देते हैं, गाजर-मूली-टमाटर कह देते हैं तो इंद्र देवता, अग्नि देवता, पवन देवता कह देने भी कोई विशेष समस्या वाली बात है नहीं। (पर हाँ, प्रकृति का यह दैवीकरण भी जागरूकता के एक विशेष स्तर के बाद ही हो सकता है उससे पहले तो यह अज्ञान और अन्धविश्वास ही होगा।) हमारे सुख-दुःख, भावनाएं, किसी की हत्या, किसी का जन्म...सब कुछ भी तो उसी ऊर्जा का रूप है। लेकिन अपनी भावनाओं के प्रति हम कितने संवेदनशील होते हैं। मरने-मारने, लड़ने-झगड़ने सबके लिए उतारू हो जाते हैं। पर गहराई में देखें तो विचार और भावनाएं भी उसी ऊर्जा का रूप है। तो फिर यह सारे संघर्ष भी कितनी बड़ी बेवकूफी है? (मुक्ति की यात्रा भी बस इसी चिंतन से शुरू होती है।)

सुविधा के तौर पर ठीक है पर जीवन को इस रूप में आप कैसे देख लेते हैं कि इसे इतनी आसानी और कट्टरता से खांचों में बाँटा जा सके? संभावनाओं में मेरा विश्वास है और धर्म मेरे लिए जड़ता नहीं बल्कि गति है - चेतना की आगामी संभावनाओं के स्तर पर बढ़ते जाना या यूँ कहूँ कि अपने ही मूल स्वभाव की ओर वापस लौटना। जीवन बस सोने-उठने, खाने-पीने, प्रजनन, सफलता और विकास के नाम पर होने वाली कई ऊटपटांग चीजों और फिर मर जाने जितना सीमित नहीं हो सकता। सब कुछ इतना सम्बंधित है कि न जाने कितने रास्ते एक ही जगह पर पहुँचते हैं। जीवन बहुत रहस्यमयी और जटिल है। कुछ समझना भी हो तो आसान बस हमें ही होना होता है। (12/06/2016)

By Monika Jain ‘पंछी’

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