Friday, February 24, 2017

Meditation Quotes in Hindi

ध्यान, होश, जागरूकता, भक्ति, समर्पण, एकाग्रता विचार. Meditation Quotes in Hindi. Awareness Sayings, Devotion Status, Dedication Slogans, Concentration Sms.
Meditation Quotes in Hindi
Meditation Quotes

  • ...कि जब उसे घास लाने को कहा गया और वह देर तक नहीं लौटा तो उसकी खोज शुरू हुई। वह घास के मैदान में मिला। उससे जब कारण पूछा गया तो उसने कहा, 'मैं घास हो गया था।'...मतलब कितने निर्दोष से किस्से हैं...आँखें भीग जाती हैं...मुस्कुराहट दौड़ कर होठों पर तैरने लगती है...कुछ बेहद जरुरी...नहीं बेहद नहीं...सबसे जरुरी याद आ जाता है। उस दिन मैंने जिक्र किया था न?...कि कृष्णमूर्ति पूछते हैं - क्या आपने कभी किसी पेड़ को देखा है? पेड़ को देखने के लिए पेड़ हो जाना पड़ता है...हाँ, पेड़ ही हो जाना पड़ता है।...और कोई उपाय ही नहीं। :) ~ Monika Jain ‘पंछी’ (22/02/2017) 
  • अपरिचित में भी चिर परिचित का दर्शन यही तो प्रेम (सुमिरन) है। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (18/01/2017) 
  • कृत्य चाहे कोई भी हो उससे कुछ हिंसा तो होगी ही। मुख्य बात यह है कि वह कृत्य हमारे अहंकार से उपजा है या फिर हमारे होश, समर्पण और ध्यान से। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (21/01/2017)   
  • सामान्यत: हर चीज का कारण तो होता है लेकिन उस कारण का भी कारण खोजते-खोजते-खोजते-खोजते ...वह हमेशा अकारण तक ही पहुँचता है। ईश्वर उस अकारण से भिन्न और क्या है? जिसमें सारे कारण विलय हो जाते हैं। और भक्ति, प्रेम, ध्यान? वह बस उस अकारण के प्रति समर्पण और अपने ईश्वरत्व को उपलब्ध हो जाने का मार्ग है। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (18/12/2016) 
  • भक्ति तो सहज ध्यान है, लेकिन जो सबसे सहज है उसके लिए ही हम सहज नहीं। इस समूचे अस्तित्व के प्रति समर्पण ही भक्ति है लेकिन हमारा अहंकार समर्पण नहीं करना चाहता। 'भक्त' शब्द व्यंग्य के रूप में बहुत प्रचलित है यहाँ।...पर सच यह भी तो है कि हमारे सारे प्रयास अनजाने में ही सही उस आनंद की खोज में ही है जो 'भक्त' को प्राप्त है। बात बस इतनी सी है कि जब तक प्रयास है भक्त हो जाना मयस्सर ही नहीं। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (15/11/2016) 
  • I don’t want god to be always with me, rather I want to be always with god. ईश्वर (परम तत्व) को अपने अनुकूल बनाने से कई बेहतर है...परम तत्व के अनुकूल बन जाना। हम परम तत्व को निर्देश न दें, बल्कि उससे निर्देश लें। यही तो भक्ति है, यही तो प्रार्थना है...और यही तो है ध्यान। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (23/02/2017)  
  • सहज भक्ति/प्रेम/ध्यान को उपलब्ध हो जाना...इससे बड़ी उपलब्धि और क्या हो सकती है? ~ Monika Jain ‘पंछी’ (11/09/2016) 
  • सारी समस्यायों का कारण ध्यान (एकाग्रता) है। सारी समस्यायों का समाधान भी ध्यान (होश) ही है। निर्भर करता है ध्यान कहाँ लगाया जा रहा है। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (10/09/2015)  
  • जब हम किसी कार्य को पूरी तरह समर्पित होकर करते हैं (खुद को पूरी तरह भुलाकर) तो जो परिणाम आता है वह इतना अप्रत्याशित होता है कि कर्ता को विश्वास ही नहीं होता कि यह काम उसने किया है। मनुष्य की क्षमताओं के रास्ते का सबसे बड़ा बाधक उसका 'मैं' ही होता है। इसलिए सफलता हो, प्रेम हो, चाहे मुक्ति...समर्पण पहली शर्त है। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (22/10/2015) 
  • कुछ लोग कहते हैं दिल (करुणा) को सुनना चाहिए।
    और कुछ कहते हैं दिमाग (प्रज्ञा) को सुनना चाहिए।
    समस्या किसे सुनना चाहिए यह नहीं है। समस्या दिल और दिमाग के अलग-अलग (द्वंद्व) होने की है। जैसे-जैसे प्रज्ञा और करुणा एक होते जायेंगे, हम जो भी सुनेंगे सही सुनेंगे। :) ~ Monika Jain ‘पंछी’ (16/10/2016)  
  • चाहे आप में कितनी ही योग्यता क्यों ना हो, केवल एकाग्र चित्त होकर ही आप महान कार्य कर सकते हैं ~ बिल गेट्स / Bill Gates 
  • पार्श्व गायन केवल आवाज़ का मामला नहीं है, एक अर्थपूर्ण और सफल गीत के लिए हमें दिमाग, शरीर, दिल और आत्मा से काम करना पड़ता है। ~ मुकेश, प्रसिद्ध गायक
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Tuesday, February 21, 2017

Poem on Smile in Hindi

मुस्कुराहट पर कविता, मुस्कान शायरी. Poem on Smile in Hindi. Falling in Love with a Book Writer Poetry, Smiling while Reading Rhymes, Infatuation Lines, Picture.
Poem on Smile in Hindi
तुम और मुस्कुराहट

किताब के पन्ने पलटते
तुम्हारे शब्दों को पढ़ते
तुम्हारी भावनाओं को महसूस करते
और तुम्हारी संवेदनाओं को जीते…
एक दिन कब अचानक नज़र
किताब के पीछे बने
तुम्हारे अक्स पर जा टिकी
पता ही न चला।

कि आसान होता है
तस्वीरों को देर तक निहारना।
कि आसान होता है
तस्वीरों को अपना
हाल-ए-दिल सुना देना।
कि आसान होता है
तस्वीरों को चूम लेना भी...
और आसान होता है
उन्हें सीने से लगा लेना।

पर मेरे लिए इनमें से कुछ भी
आसान कहाँ था?
आसान था कुछ तो वो था
बस मुस्कुरा देना
और मुस्कुराते-मुस्कुराते
तुम्हारी किताब के कुछ पन्ने
और पलट देना।

By Monika Jain ‘पंछी’
(20/02/2017)

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Saturday, February 18, 2017

Inspirational Story in Hindi

प्रेरणादायक कहानी, प्रेरक प्रसंग, जिम्मेदारी. Inspirational Story in Hindi. Sardar Vallabhbhai Patel Life Incident. Responsibility, Duty, Will Power Tales.
Inspirational Story in Hindi

(1)

फर्ज

वकालत के दौरान सरदार पटेल के पास हत्या का एक बेहद उलझा हुआ केस आया। मुकदमे को अपने हाथ में लेने से पहले सरदार पटेल ने बहुत सोचा और जब उन्हें यह भरोसा हो गया कि आरोपी बेगुनाह है तो उन्होंने मुकदमा अपने हाथ में ले लिया। पैरवी में हुई छोटी सी भूल भी आरोपी को फांसी दिला सकती थी इसलिए उन्होंने आरोपी को बचाने के लिए दिन-रात एक कर दिए।

एक दिन जब इस विषय पर महत्वपूर्ण बहस चल रही थी और फैसला इसी बहस पर टिका था और सरदार पटेल बहस में व्यस्त थे, तभी उनके नाम से एक तार आया। सरदार पटेल ने तार पढ़ा तो उनके चेहरे पर दुःख के भाव साफ-साफ नजर आने लगे। उन्होंने तार को वापस अपनी जेब में रख लिया और फिर बहस करने लगे।

जब मुक़दमे की बहस खत्म हो गयी तो उनके एक साथी ने उनसे उस तार के बारे में पूछा। सरदार पटेल ने बताया कि उनकी पत्नी की मृत्यु हो गयी है और इसी का समाचार उस तार में था। सरदार पटेल का जवाब सुनकर सब हैरान रह गए। उनके करीबी मित्र ने उनसे पूछा, ‘तुमने बहस जारी क्यों रखी?’ सरदार पटेल ने कहा, ‘वह दुनिया छोड़ चुकी थी, मैं अगर बहस छोड़ देता तो एक बेगुनाह को फांसी हो जाती। मुझे बहस जारी रखना ही सही लगा। यही मेरा फर्ज था।’

Source - Unknown

(2)

सच्ची लगन

नॉर्वे में एक रईस रहता था जिसका नाम फलेरा था। उसके यहाँ एंटोनियो नाम का एक नौकर काम करता था। पास ही में एक मूर्तिकार की दूकान थी। एंटोनियो को जब भी खाली समय मिलता वह मूर्तिकार की दूकान के पास खड़ा होकर मूर्तियाँ बनते हुए देखता था। उसे मूर्तियों की काफी कुछ समझ आ गयी थी और वह कभी-कभी वहां कार्य कर रहे कारीगरों की मदद भी कर देता था।

एक दिन दुकानदार ने कहा, ‘यहाँ आकर तुम अपना समय क्यों नष्ट करते हो?’ एंटोनियों बोला, ‘मुझे यहाँ आकर मूर्तियाँ बनते देखना अच्छा लगता है।’ इस तरह उसका आना निरंतर जारी रहा।

एक बार मालिक फलेरा के यहाँ दावत थी। भोजन स्थल की सजावट का कार्य मुख्य बैरे को सौंपा गया था लेकिन उससे सजावट का कार्य सही ढंग से नहीं हो पा रहा था। वह परेशान हो गया। उसे परेशान देखकर एंटोनियो ने कहा, ‘अगर तुम चाहो तो मै तुम्हारी मदद कर सकता हूँ।’ बैरे ने हामी भर दी।

एंटोनियों ने सबसे पहले बाज़ार से मक्खन मंगवाया। जमे हुए मक्खन से उसने चीते की एक आकर्षक मूर्ति बनायीं और उसे दावत स्थल के बीचोंबीच मेज पर सजा दिया। सभी मेहमानों ने मूर्ति की बहुत तारीफ की। उन्हीं मेहमानों में से एक व्यक्ति मूर्तिकला विशेषज्ञ था। उसे जब यह मालूम चला कि यह मूर्ति एक सामान्य से नौकर ने बनायी है तो उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। उसने हैरान होकर एंटोनियो से पूछा, ‘तुमने मूर्तिकला का प्रशिक्षण कहाँ से लिया?’ एंटोनियो ने जवाब दिया, ‘पास की ही दूकान पर वह रोज मूर्तियाँ बनते हुए देखता है। बस वहीँ से उसे प्रेरणा मिली।’

Moral : लगन, निष्ठा, समर्पण और इच्छाशक्ति हमें कुछ भी सिखा सकती है और हर कार्य में सफलता दिला सकती है।

Source - Unknown

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Thursday, February 16, 2017

Laghu Kahani in Hindi

जीवनदान लघु कहानी, डरावना सपना. Save Animals Story in Hindi. Giving Boon of Life to Birds, Insects. Horrible Dream, Reality, Mask, Double Standard Tales.
Laghu Kahani in Hindi

(1)

प्रेम की कमी...

आजकल आसपास चल रहे व्यक्ति को दूर से ही आगाह कर देती हूँ कि यहाँ एक कीड़ा चल रहा है, इस पर पाँव नहीं रख देना। क्योंकि कभी-कभी ऐसा होता है कि कुछ काम करते समय या पढ़ते समय किसी कीड़े को आसपास चलता हुआ देखती हूँ और कोई भी व्यक्ति आसपास चल रहा होता है तो मन में एक अंदेशा हो जाता है उस पर आये ख़तरे को लेकर। जब निश्चिन्त हो जाती हूँ कि चल रहा व्यक्ति इधर नहीं आ रहा है तो फिर अपने काम में लग जाती हूँ। लेकिन कुछ ही देर बाद मेरी आशंका सच सिद्ध हो जाती है। एकदम वह व्यक्ति वहां से गुजर जाता है और अनजाने में उस कीड़े को कुचलकर चला जाता है।

कुछ दिनों पहले भी तो ऐसा ही हुआ था। वह दिवाली की सफाई में व्यस्त थी। छत पर बने कमरे से बाहर वाश बेसिन के ऊपर वाली ताक में चिड़िया कई दिनों से घोंसला डालने में जुटी थी। आज जब वह सफाई करने को आई तो उस घोंसले को उठाकर बाहर डालने लगी। चिड़िया आसपास कहीं नहीं थी लेकिन अचानक मुझे ख़याल आया - क्या पता इसमें अंडे हों तो मैं भीतर से टेबल ले लायी। उसने टेबल पर चढ़कर देखा तो उसे कोई अंडा नजर नहीं आया। पर घोंसला लगभग पूरा तैयार था तो मैंने कहा, ‘हम अगर इसे फेंक देंगे तो चिड़िया फिर अंडा कहाँ देगी? और इतनी जल्दी घोंसला कैसे बनाएगी? और फिर थोड़े ही दिनों की तो बात है।’ यूँ वह जीवों के प्रति संवेदनशील है, लेकिन कचरे की समस्या तो सफाई करने वाला ही जानता है, इसलिए हमेशा संवेदना को बरक़रार भी नहीं रखा जा सकता। उसने एक पल सोचा और फिर कहा, ‘और भी तो बहुत सी जगह हैं बनाने के लिए।’ और ऐसा कहकर उसने घोंसला उठा लिया।

कुछ ही देर बाद एक छोटा सा अंडा लुढ़ककर नीचे आ गिरा और फूट गया। वह अचंभित हुई। अंडा उसे दिखा नहीं था और किसी छेद से निकलकर शायद फर्श पर पहले से पड़ा था या उठाने के दौरान चला गया था। उसे इस जीव हत्या पर बहुत पछतावा हो रहा था। पता नहीं क्यों उस दिन मुझे उस फूटे हुए अंडे को देखकर तो कोई विचलन या दुःख नहीं हुआ। मुझे उसकी मृत्यु स्वीकार्य थी पर भीतर आकर बस यही ख़याल आया कि अभी मेरे भीतर का प्रेम बहुत कम है, वरना वह उस जीवन को बचा पाने में जरुर सफल होता।

By Monika Jain ‘पंछी’
(01/10/2016)

(2)

सपने की हकीकत

कल रात मैंने एक अजीब सा सपना देखा - मैं एक शांत, सुव्यवस्थित और बड़े ही मनोहर से शहर के बीचों-बीच खड़ी थी। कई सभ्य, शालीन और सुसंस्कृत से दिखाई पड़ने वाले लोगों की बैठके जगह-जगह चल रही थी। उनमें से एक समूह अहिंसावादियों का था, जहाँ अहिंसा के महत्व को समझाया जा रहा था। एक समूह नारीवादियों का था, जो नारी स्वतंत्रता, सम्मान और सुरक्षा पर चर्चा कर रहा था। एक समूह धार्मिक साधु, संतों और सन्यासियों का था जो धर्म, त्याग, मोक्ष, तप और ब्रह्मचर्य आदि विषयों पर चिंतन-मनन कर रहा था और एक समूह भ्रष्टाचार के उन्मूलन के उपायों पर विमर्श कर रहा था। ऐसे ही कई समूह थे जिनमें कई अच्छे-अच्छे विषयों पर चर्चाएँ चल रही थी।

मैं बहुत खुश थी। क्योंकि दुनिया एक बेहतर जगह बन रही थी। धीरे-धीरे शाम होने लगी, अँधेरा गिरने लगा। मुझे टक-टक सी कुछ गिरने की आवाजें आने लगी। ध्यान से देखा तो मालूम चला बहुत सारे मुखौटे जमीन पर गिर रहे थे। ये सब मुखौटे उन सभ्य और शालीन लोगों के चेहरों से मिल रहे थे जिन्हें मैंने दिन में देखा था। चारों ओर नज़र दौड़ाई तो देखा वह शहर एक भयानक जंगल में तब्दील हो चुका था और वे सभ्य और शालीन से दिखने वाले लोग खूंखार भेड़ियों में।

एक तरफ एक अहिंसावादी किसी की निर्मम हत्या करके उसका खून पी रहा था। दूसरी ओर एक नारीवादी एक औरत को बेरहमी से पीट कर उसका बलात्कार कर रहा था। पास ही में एक भ्रष्टाचार विरोधी पैसों से भरा एक सूटकेस छिपाने के लिए जमीन में एक गड्डा खोद रहा था, जो अभी-अभी उसे कोई देकर गया था। और एक धर्म गुरु शराब और अफीम के नशे में धुत होकर कई लड़कियों के साथ अय्याशी कर रहा था।

अचानक मेरी आँख खुली। मैं पसीने से लथपथ और बहुत घबराई हुई थी। मेरे जीवन का यह सबसे भयानक सपना था जो दुर्भाग्य से इस दुनिया की हकीकत भी है।

By Monika Jain ‘पंछी’
(12/10/2013)

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Wednesday, February 15, 2017

Question Answer in Hindi

सवाल जवाब, प्रश्न उत्तर. Question Answer Conversation between Girl and Boy in Hindi. Friends Query Sms, Problem Solution Status, Doubt Messages, Quotes.
Question Answer in Hindi

(1)

Question : आप जीवों से बहुत प्रेम करती हैं। प्रेम में एक नॉन वेजीटेरियन से शादी के बारे में क्या ख़याल हैं आपका?

Answer : शादी खुद ही एक बहुत बुरा ख़याल है :p...बड़ी वाली हिंसा...सो कैंसिल। :D बाकी जब प्यार करते समय वेज-नॉनवेज नहीं देखते, दोस्ती करते समय नहीं देखते, तो फिर शादी कौनसे खेत की मूली है? बस दोनों ओर से थोड़ी अधिक अंडरस्टैंडिंग की जरुरत है। वैसे एक दोस्त था जिससे बाद में मैंने शादी के बारे में भी सोचा था। वह एक बंगाली, परिवर्तित क्रिश्चियन व नॉन वेजीटेरियन ही था। यह बात अलग है कि वह नॉनवेज खाता है इस बात का पता मुझे तब चला जब किसी ने उसे खाने को साथ चलने को कहा तो वह नहीं गया और उसने बताया कि कुछ महीनों से उसने खाना छोड़ दिया है। मैंने कारण पूछा तो उसने कहा, ‘क्योंकि तुम नहीं खाती हो।’ उस समय तो मैंने उसे यही कहा कि जो तुम्हारा दिल कहे सिर्फ वो करना, किसी भी बेवजह के दबाव में नहीं। लेकिन आज भी यही लगता है कि अगर कोई बचपन से संस्कारित है तो उससे जबरदस्ती नहीं छुड़वाया जा सकता। वह किसी दबाव में छोड़ भी दे लेकिन अगर उसके मन में इच्छा शेष है तो यह संस्कार किसी और रूप में निकलेगा, लेकिन निकलेगा जरुर। सिर्फ प्रेम ही काम कर सकता है और कुछ नहीं। वह भी प्रेमी या प्रेमिका के लिए छोड़ने (यह भी अच्छा ही है) से अधिक बेहतर है कि पशु-पक्षियों और खुद के प्रेम में छोड़ा जाए। 

(2)

Question : जब सब बुद्ध हो जायेंगे तो क्या होगा?

Answer : यह सवाल नहीं होगा और क्या? :) 

(3)

Question : आप टीवी नहीं देखती, गाने नहीं सुनती, मूवीज नहीं देखती, न्यूज़ पेपर नहीं पढ़ती...etc...etc...तो आप करती क्या हैं?

Answer : मैं दिन में भी तारे देखती हूँ। (जोक्स अपार्ट) मुझे अपने साथ रहना अच्छा लगता है। मैं अपने साथ बोर नहीं होती। :p बाकी तो और भी लाखों काम है ज़माने में टीवी, मूवी के सिवा। :)

(4)

Question : What’s the aim of your life?

Answer : To be aimless. :)

(5)

Question : तुम इतनी प्यारी क्यों हों?

Answer : क्या कोई और विकल्प होता है?

(6)

Question : आप एक लड़की हैं, आपको कई अजीबोगरीब मैसेज आते होंगे। कोई परेशानी नहीं होती?

Answer : व्यक्ति को अगर यह समझ आ जाए कि उसे कब और क्या पढ़ना है-नहीं पढ़ना है, सुनना है-नहीं सुनना है, देखना है-नहीं देखना है, बोलना है-नहीं बोलना है, महसूस करना है-नहीं करना है, कुछ करना है-नहीं करना है...और इन सबसे आगे बढ़कर उसे सिर्फ साक्षी या दृष्टा बनना आ जाए तो उसे दुनिया में कुछ भी परेशान नहीं कर सकता। उसकी गर्दन काटी जा रही हो यह भी नहीं। मैं हूँ तो नहीं ऐसी। लेकिन बहरहाल अजीबोगरीब मैसेजेज के लिए समझ आ गया कि वे न अजीब हैं और न ही गरीब हैं, वे सिर्फ मैसेजेज हैं। हाँ, कभी-कभी कोई कार्यवाही करना जरुरी हो तो की जानी चाहिए।

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Thursday, February 9, 2017

Essay on Social Evils in Hindi

समाज सुधार पर निबंध, सामाजिक समस्या लेख. Hindi Essay on Social Evils in Our Society. Reforms Article, Movement Speech, Problems of India Paragraph, Issues. 
Essay on Social Evils in Hindi

सुधार बनाम मानसिकता

(1)

यहाँ हम घर में कुल तीन सदस्य हैं। जब कभी भी घर में किसी को बर्तन साफ़ करने के लिए रखा जाता है तब भी मम्मी और मेरा ख़याल हमेशा यही रहता है कि बर्तन कम से कम हो। अभी जो आती हैं, वे बुजुर्ग हैं तो थोड़ा एक्स्ट्रा ख़याल रहता है। उनका मेहनताना, समय-समय पर दी जाने वाली खाने-पीने की चीजें और पहनने के कपड़े देना ये सब तो बहुत आम सी बातें हैं। मुझे जो चीज अच्छी लगती है वो है मम्मा द्वारा बराबर उनका हालचाल और परेशानियाँ पूछते रहना। उनका हल बताते रहना। एक दिन बर्तन साफ़ करते समय उनके हाथों में हल्की सी खरोंच आ गयी तो मम्मा अपने हाथों से उनको दवाई लगा रही थी और पट्टी बाँध रही थी। मैं सीढ़ियों से नीचे आ रही थी। बात तो यह भी मामूली सी थी लेकिन पता नहीं क्यों उस दृश्य में अद्भुत सा सम्मोहन था। दोनों के एक्सप्रेशन्स देखते ही बनते थे। जैसे माँ-बेटी हों। मेरी आँखें ऐसे दृश्यों के लिए कैमरे का काम करती है। :) कभी-कभी सोचती हूँ : क्रांति और सुधार के हौव्वे से इतर सभी को कितनी छोटी-छोटी सी चीजों को समझ लेने की जरुरत भर है।

By Monika Jain ‘पंछी’
(23/01/2017)

(2)

एक बात जो अक्सर सोचती हूँ कि अच्छे लोग भी हैं, समाज सुधारक भी हैं, फिर भी सुधार हमेशा इतना ज्यादा वक्त क्यों लेते हैं? कुछ अच्छा जल्दी से नज़र क्यों नहीं आता? आदर्श स्थायी क्यों नहीं होते? परिवर्तन इतना बलिदान क्यों चाहता है?

अपने अनुभव से बस इतना ही जान पायी हूँ कि बुराई में प्राय: मतभेद नहीं होते, बुराई की ओर ज्यादातर लोगों का आकर्षण होता है और वो आसानी से विस्तार भी पा लेती है। जो बहुत लालची है, उसके चोर बनने की गुंजाईश हमेशा रहती है। जो क्रूर है, उसके हत्यारा बनने का रास्ता भी खुला है। जिसके मन में नारी के लिए सम्मान नहीं, कल को वो बलात्कारी बन जाए तो आश्चर्य नहीं।

लेकिन अच्छाई का आकर्षण कम है। उसका विस्तार भी कुछ अपवादों को छोड़कर नहीं हो पाता। फिर हर व्यक्ति के लिए इसकी अलग-अलग परिभाषाएं हैं, भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण है। जो सुधार चाहते हैं उनमें मतभेद भी बहुत ज्यादा मिलते हैं। वे कब मनभेद बनकर उन्हें एक दूसरे के ही विरुद्ध खड़ा कर दे पता नहीं चलता। सुधार की इच्छा रखने वालों में अहंकार भी कम नहीं होता। अपना नाम उन्हें बड़ा प्रिय होता है। किसी भी सुधार को हमेशा सुधार चाहने वालों का ही विरोध सबसे पहले झेलना पड़ता है। ये मनभेद, ये अहंकार ही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है। मतभेदों का तो कोई विकल्प है ही नहीं, पर मनभेद, अहंकार और यश की चाह पर विजय पाना बहुत जरुरी है। सुधार के रास्ते में ये ही हमारे सबसे बड़े दुश्मन है और हमेशा रहेंगे।

By Monika Jain 'पंछी'
(01/03/2013)

(3)

मौत दामिनी की नहीं हुई है, मौत हुई है इंसानियत की। वह इंसानियत जो आज हर गली, हर चौराहे, हर नुक्कड़, हर घर और हर दिल में दम तोड़ती नज़र आ रही है। मैंने कई बार पढ़ा है कि मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी है और मानव जीवन बहुत दुर्लभ है जो 84 हजार योनियों में भटकने के बाद मिलता है। लेकिन यदि यह तथाकथित सभ्य मानव समाज ऐसा है तो नहीं चाहिए ऐसा दुर्लभ मानव जन्म!

दामिनी के साथ जो हुआ वह सम्पूर्ण मानव जाति को शर्मसार करता है...लेकिन मेरी सोच और समझ से बाहर है वे बलात्कार की घटनायें जो अभी भी बदस्तूर जारी है। पिता का बेटी के साथ दुष्कर्म, पड़ोसी का पड़ोसी के साथ दुष्कर्म, 6 महीने की बच्ची का बलात्कार ...क्या हो गया है लोगों को? दो पल की भूख के लिए किसी की जिंदगी नर्क से भी बद्दतर बना देने में नहीं हिचकते।

एक छोटी मासूम सी बच्ची जिसे देखकर सिर्फ ममता उमड़नी चाहिए उसे भी अपनी दरिंदगी का शिकार बना देने वाले लोग कौनसी दुनिया के हैं? और वो लोग जो ईश्वर को सर्वशक्तिमान मानते हैं उनका ईश्वर कहाँ छिपा है?

कई लोगों से बहस होती है मेरी इस बात को लेकर कि दुनिया ईश्वर ने बनाई है और जो भी होता है ईश्वर की मर्जी से होता है...उन सभी लोगों से पूछना है मुझे ...क्या वो ईश्वर कहलाने लायक है जिसकी मर्जी से ये सब हो रहा है? लोगों के कुतर्कों की फिर भी कमी नहीं...कहेंगे कि पापों का फल भुगतना पड़ता है। मगर मुझे कोई ये समझाए कि अगर ईश्वर में इतनी ताकत है कि वह किसी के पापों का फल दे सकते हैं तो फिर उनमें क्या इतनी शक्ति नहीं कि वह पाप होने ही न दे? ईश्वर ऐसा कभी हो ही नहीं सकता। सच तो यह है कि हम इंसान कहें जाने वाले लोग अपनी करतूतों को छिपाने के लिए ऐसे ही घटिया तर्कों का इस्तेमाल करते हैं और जब तक हमारी मानसिकता ऐसे ही संकीर्ण विचारों के इर्द गिर्द घूमेगी तब तक कुछ भी नहीं बदल सकता...कुछ भी नहीं।
 
By Monika Jain 'पंछी'
(29/12/2012)

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Monday, February 6, 2017

Life Thoughts in Hindi

ज़िन्दगी पर विचार, जीवन सुविचार. Philosophy Based Life Thoughts in Hindi. Attitude Status, Comments, Quotes of The Day, Proverbs, Lines, Slogans, Sms, Messages.
Life Thoughts in Hindi
Life Thoughts
  • सिर्फ अधूरी इच्छाएं (अच्छी-बुरी) ही जन्म लेती है। प्रेम तो सदैव अजन्मा और अमर होता है। अपने अहंकार को खाद-पानी देते हम किसी दूसरे अहंकार से नफरत कर सकते हैं, लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि वह दूसरा अहंकार भी हमारी ही किसी अतीत की इच्छा का जन्म है। जिस क्षण हम अखंडित होंगे तभी हमें पता चलेगा कि दूसरा तो कोई होता ही नहीं। हर कदम पर हमारा सामना सिर्फ खुद से ही है। इसलिए समानुभूति के उस स्तर तक पहुँचने के लिए अक्सर मैं ’हम’ या ‘मैं’ शैली में लिखती हूँ। अहंकार के शमन के लिए 'मैं' को 'हम' और 'हम' को 'मैं' बना लेना एक अच्छा तरीका है और दोनों में ही यह जरुरी नहीं कि बात मेरे ही सन्दर्भ में हो। उस समय मन में यह ख़याल नहीं होता कि मूल मुद्दे पर ध्यान नहीं दिया जाएगा बल्कि व्यक्तिगत आंकलन किये जायेंगे, निष्कर्ष निकाले जायेंगे, पूर्वाग्रह पाले जायेंगे। लेकिन समानुभूति से बाहर निकलते ही पता चलता है कि हमारा खंड-खंड जीवन इसी के लिए अभिशप्त है। जितने ज्यादा हम खंडित उतने ही हमारे निष्कर्ष। जब-जब हमारा मन खंडित नहीं होगा, संस्कारों के प्रभाव में नहीं होगा...तब-तब वह सिर्फ प्रेम के बारे में ही सोचेगा। बल्कि सोचेगा क्या ‘प्रेम’ ही होगा। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (03/02/2017) 
  • हमने सदा लहरों को जीवन समझा और गहरे सागर को भूल गए। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (20/01/2017) 
  • जीते जी कोई पूछता तक नहीं...मरने के बाद भगवान बना देते हैं लोग। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (20/01/2016)  
  • मनुष्य जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम मनुष्य होने के भाव से ऊपर उठ सकें। उससे पहले स्त्री स्त्री होने के भाव से और पुरुष पुरुष होने के भाव से...लेकिन यहाँ तो अभी तक कपड़ा पुराण ही चल रहा है। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (05/01/2017) 
  • जीजिविषा को बहुत ज्यादा महत्व दिया जाता है। इसे एक प्रेरणास्पद गुण की तरह देखा जाता है। लेकिन जब भी मैं सोचती हूँ कि मेरी जीवेषणा न जाने कितनी मृत्युओं पर खड़ी है तो इस शब्द का आकर्षण एकदम छू हो जाता है। देखा जाए तो यह जीवेषणा सबको मारकर भी खुद को नहीं बचा सकती। पर इसका मतलब यह नहीं कि मैं मृत्यु-एषणा का समर्थन कर रही हूँ। सूक्ष्म रूप में मृत्यु-एषणा सिर्फ वहीं हो सकती है जहाँ सशर्त जीवेषणा है - शर्तें पूरी नहीं हुई इसलिए हमें नहीं जीना।
    यह जानते हुए कि एक समष्टि दृष्टिकोण से पृथ्वी पर जीवन का कोई उद्देश्य नहीं है...यह एक चक्र के सिवा और कुछ भी नहीं...जीने की जद्दोजहद और प्रतिस्पर्धा को इतना अधिक महत्व देना एक भ्रम में जीना लगता है। जीवन एक खेल से ज्यादा कुछ भी तो नहीं। काश! हम इसे बस एक खेल की तरह खेलना सीख पाते। पूर्ण सजगता और भागीदारी से शामिल होते हुए भी अनछुए और गंभीरता से मुक्त। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (22/06/2016)  
  • हर मृत्यु एक सन्देश है और यह सन्देश है जीवन का। जो मृत्यु को स्वीकार करके चल सकता है वास्तव में वही तो जी सकता है। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (16/12/2016)  
  • अब तो जीना सीख लें हम, कब तक कभी इसके और कभी उसके लिए मरते रहेंगे। एक दिन तो वैसे ही मरना है। ~ Monika Jain ‘पंछी’ (16/12/2016)  
  • वैसे तो जीवन जैसे-तैसे बीत जाता है, पर वास्तविक जीवन तो उनका है जो किसी मकसद के लिए जीते हैं। ~ शेख सादी / Sheikh Saadi  
  • जिसे उचित-अनुचित का विचार है, वही वास्तव में जीवित है, पर जो योग्य-अयोग्य का विचार नहीं रखता, उसकी गणना तो मृतकों में ही की जाएगी। ~ Saint Thiruvalluvar / तिरुवल्लुवर  
  • आपको यह चुनने का अवसर नहीं मिलेगा कि आप कब और कैसे मरेंगे, आप केवल इतना ही निर्णय कर सकते हैं कि आप किस प्रकार से ज़िन्दगी जीने जा रहे हैं। ~ वाल्तेयर / Voltaire
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Poem on Roti in Hindi

पहली रोटी पर कविता, चपाती शायरी, ऑस्ट्रेलिया का नक्शा. Poem on Roti in Hindi for Kids. First Bread Nursery Rhyme, Childhood Kitchen Memories Poetry, Slogans.
Poem on Roti in Hindi
पहली रोटी

याद है मुझे अपनी पहली रोटी!
आधी कच्ची, आधी पक्की
और थी छोटी-मोटी
हाँ, याद है मुझे अपनी पहली रोटी।

छोटे से हाथों में छोटी सी लोई
लेकर चली मैं बनाने रसोई
बड़ा सा बेलन और बड़ा सा चकला
मेरे नन्हें हाथों से बार-बार फिसला।

बेलन ने गिरकर पाँव मेरा तोड़ा
पर मैंने अपना उत्साह न छोड़ा
बनाया था मैंने आस्ट्रेलिया का नक्शा
सिकने तक कर दे ईश्वर इसकी रक्षा।

कहीं से थी पतली, कहीं से थी मोटी
तवे पे रखकर हाथ से पलटी
तवे ने जलाया मेरा नन्हा हाथ
पर मैंने छोड़ा न रोटी का साथ।

चिमटे से पकड़ी और नीचे उतारी
कच्ची-जली रोटी थी बड़ी प्यारी।

By Monika Jain 'पंछी'


Feel free to add your memories regarding making and baking of your first roti.

Watch/Listen the video of this poem in my voice :


Wednesday, February 1, 2017

Vasant Panchami Essay in Hindi

बसंत पंचमी पर निबंध, ऋतुराज वसंत लेख, प्रेम पत्र. Vasant Ritu Panchami Essay in Hindi. Spring Season Wishes Article, Love Letter to Friends, Speech, Messages.
Vasant Panchami Essay in Hindi

क्या और कोई विकल्प होता है?

प्यारे दोस्तों,

ऋतुराज बसंत के आगमन की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। मधुमास कई रूपों में प्रेम से जुड़ा है और आज का दिन भी कई लोगों द्वारा भारतीय संस्कृति का प्रेम दिवस कहा जाता है तो फिर आज बात प्रेम पर ही करते हैं। वैसे प्रेम पर बात हर रोज होनी चाहिए। बल्कि हर रोज, हर क्षण प्रेम ही होना चाहिए। इससे सहज और इससे सरल कुछ है ही नहीं पर हमने अपनी कारस्तानियों से इसे सबसे मुश्किल और जटिल बना दिया है।

एक बार एक दोस्त ने कई सम्बंधित प्रतिकूलताओं पर निजी स्वार्थ से परे मेरे सहर्ष स्वीकार भाव को देखते हुए कहा था, ‘तुम इतनी प्यारी क्यों हों?’ उस समय तो मैं बस मुस्कुरा दी थी। लेकिन मन में एक ख़याल उठा कि काश! मैं इस सवाल का जवाब दे पाती। विविध सापेक्षताओं को छोड़ दूँ तो इस प्रश्न के पूर्ण योग्य तो मैं बिल्कुल नहीं। पर सोचिये! इस प्रश्न का सबसे बेहतर जवाब क्या हो सकता है? ‘तुम इतनी प्यारी या तुम इतने प्यारे क्यों हों?’ इस प्रश्न का सबसे बेहतर जवाब हो सकता है - ‘क्या कोई और विकल्प होता है?’ सच! क्या प्रेम के अलावा कोई और विकल्प होता है? बस...बस इसी जवाब तक पहुँचना है हमें कि क्या प्रेम के अलावा कोई और भी विकल्प होता है?

अस्तित्व के पास प्रेम के अलावा कोई और विकल्प था ही नहीं इसलिए उसने हमें सब विकल्प दे डाले। प्रेम को छोड़कर हमने सब विकल्प चुने - हमने ईर्ष्या चुनी, हमने घृणा चुनी, हमने आसक्ति को चुना, लालच, लोभ, तृष्णा...सब कुछ चुना...हमने मित्र चुने, हमने शत्रु चुने, हमने अच्छा और बुरा चुना, सुख और दुःख चुना, ऊंच-नीच चुनी, सम्मान-अपमान चुना...हर कदम पर हमने द्वैत को चुना, तुलना को चुना...बस नहीं चुना तो प्रेम को।

क्यों चुन रहे हैं हम इतना सारा प्रतिरोध? क्यों चुन रहे हैं हम इतना मुश्किल रास्ता? क्यों चुन रहे हैं हम तमाम दुश्वारियां? इस आशा में ही न कि एक दिन सब ठीक होगा? सब ठीक होने के लिए क्या यह सब चुनना पड़ता है?

सब ठीक तो बस इस और इसी क्षण होता है। दरअसल हम सब ठीक को अक्सर चुनते ही नहीं। हाँ, उसकी आशा में सब गलत जरुर चुनते जाते हैं। खैर! बहुत ज्यादा दार्शनिक बातें तो नहीं करुँगी पर हाँ क्या ऐसा नहीं हो सकता कि कुछ भी लिखने से पहले, कुछ भी बोलने से पहले या कुछ भी करने से पहले हम इस बात को अच्छी तरह से देखें कि इसमें प्रेम कितना है और बाकी मिलावट कितनी? मेरे कहने का आशय यह नहीं है कि हमेशा बस रसगुल्ले सी मिठास ही टपकनी चाहिए। कभी सख्ती या तल्खी की जरुरत लगती है तो वो भी ठीक है, लेकिन यह देखना जरुरी है कि क्या इसका आधार वाकई प्रेम है? बात प्रेम, होश और समझ से उठ रही है या आधार कोई कुंठा, ईर्ष्या, भय, अहंकार...आदि वृत्तियाँ हैं?

मुझे लगता है हर रोज कम से कम एक प्रेमपत्र लिखा ही जाना चाहिए। कहाँ, कैसे, किस तरह...मुखर या मौन...प्रकट या अप्रकट...यह हमारा चुनाव! यह पत्र मैंने अपने और आप सबके लिए लिखा है। क्योंकि प्रेम से बहुत दूर आ चुके हैं हम तो चलो! वापस अपने घर लौटते हैं। <3

सप्रेम
पंछी